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'बस खाक '(poem)

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चन्द हड्डियाँ,कुछ राख,ना रूत्वा,ना साख  इंसान  का वजूद खाक ,बस खाक  सम्बंध मात्र  मोह बस,प्रीत एक जाल  वीत राग सत्य बस ,ईश्वर अमर नाम . व्यर्थ की ये दौड़ सब ,शून्य सा आधार  ग्यानहीन मानता ,विलासिता महान  रुग्ण सा शरीर- मन,क्षीण आत्म ग्यान  अनासक्त प्रभु से मन ,ना पा सका आत्म भान . छोड़ के चला वो ,छोड़ा जिसके लिए जहान भूला उम्र भर जिसे ,निभा रहा अंत में वो साथ -अंशु चौहान