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जनवरी, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

'निम्न से ही उच्च है "

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रुतवा और प्रतिष्ठा का अर्थ कभी भी व्यक्तिगत या सीमित मायनो में नहीं लिया जा सकता । ये व्यक्तिगत या एकात्मक तौर पर अर्थहीन हैं । इन्हें अपना अस्तित्व पाने के लिए पराश्रित होना पड़ता है । इस वाक्य का अर्थ ये है कि इंसान प्रसिद्ध होने के लिए, सम्मान पाने के लिए  किसी दूसरे व्यक्ति या समूह विशेष पर निर्भर करता है ।  इंसान अपने आप में कितना ही गुणी या प्रतिभावान क्यों न हो जब तक उसकी प्रतिभा की कद्र करने वाले ,उसके गुणों को पहचानने वाले या स्वीकार करने वाले लोग नहीं होंगे वह व्यक्ति प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं कर पाएगा । इसलिए इस सम्मान को पाने के लिए हमें अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन के  साथ-साथ दूसरों को प्रभावित करना ,उनके विचारों को समझना और उनकी प्रतिक्रियाओं को सकारात्मक आधार भी प्रदान करना होता है ।  हर  इंसान अपना रुतवा पाने के लिए ,अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए, उसे सिद्ध करने के लिए दूसरों पर निर्भर है । ये दूसरे की सोच है , उसका  अपना निर्णय है कि वह आपको प्रतिभावान मानता है या नहीं । वो आपमें सब कुछ होते हुए भी आपका सम्मान करता है या नहीं । यदि आपकी प्रतिभा...

लो आने वाली है गर्मी

लो आने वाली है गर्मी । सितम सर्दी के अब कम होंगे  लदे ये कपड़े अब कम होंगे  आइस- क्रीम ,कुल्फ़ी के ठेले  अब सड़कों पर हर दम  होंगे ।  लेकिन गर्मी भी क्या सयानी  याद दिला देगी वो नानी  लू के थपेड़े ,धूल वो आँधी दुपहरी पड़ जाएगी भारी सड़कों पर सन्नाटा होगा मुश्किल बाहर जाना होगा होगी धूप ये क़ातिल तब तो जो लगती थी बड़ी सुहानी   रात बनेगी भीगी बिल्ली  दिन की ही होगी मनमानी । 

जन्म -दिन पर मोमबत्ती जलाकर उसे बुझाना सही नहीं

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जन्म -दिन पर केक काटते वक़्त मोमबत्ती जलाकर उसे बुझाना मुझे  बिल्कुल  अच्छा  नहीं लगता । अपनी भारतीय -धामिर्क संस्कृति में' दिए' को जलाकर बुझाना शुभ नहीं माना जाता है । इसलिए इस शुभ दिन पर दिए को जलाकर बुझाना नहीं चाहिए । मेरी दृष्टि में तो जैसे  ही कैंडल जलाई जाए तभी' हैप्पी बर्थ डे 'विश किया जाए । अब  उस कैंडल को दिए की तरह उपयोग में लेते हुए किसी उपयुक्त स्थान पर रौशनी के लिए रख दिया जाना चाहिए । ये मेरी व्यक्तिगत राय या सोच है । किसी की  विचारधारा की आलोचना मेरा उद्देश्य नहीं है । शुभता और अशुभता को मानते हो तो करें।
इंसान में अगर संतोष का भाव आ जाए तो कोई भी मोटिवेशनल स्पीच उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित नहीं कर सकती  क्योंकि प्रतिस्पर्धा ,असंतोष और तृष्णा की भावना के बिना इंसान में आगे बढ़ने का साहस नहीं आ सकता। इसलिए  भौतिक जीवन में सफलता के लिए तो  असन्तोष या  तृष्णा ज़रूरी है आगे से आगे उन्नति के लिए लेकिन आध्यात्मिक उन्नति के लिए इन्ही वृत्ति पर नियंत्रण ज़रूरी है। 

वैलेंटाइन्स डे 'दर्शन'

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यदि तुम किसी से प्यार करते हो तो उसे स्वीकार करने की हिम्मत भी रखो । अगर तुम्हारे अंदर ये हिम्मत नहीं है तो या तो तुम में प्यार करने की काबिलियत ही नहीं है, या फिर तुम गलत हो ,तुम्हारा प्यार अनैतिक है । अनैतिक कार्य कभी सफल नहीं होता हैं । उसके परिणाम भी हानिकारक होते हैं ।नैतिकता का ध्यान रखना बेहद जरूरी है । प्यार कभी भी नैतिकता से उच्च नहीं हो सकता । नैतिकता सर्वोपरि है।  इसलिए नैतिकता के लिए प्यार की कुर्बानी दी जा सकती है ,प्यार के लिए नैतिकता की नहीं ।  प्यार में रिश्तों की मर्यादा का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए । सगी रिश्तेदारियों में किसी से प्रेम -संबंध रखना एक पाश्विक  वृत्ति है ,एक मानसिक कुंठा या मानसिक विकार है ।  जिस प्रेम को छुपाने की आवश्यकता पड़े वह प्रेम नहीं है वरन एक मानसिक विकृति है । उसे ख़त्म कर देना ही उचित है। उत्कृष्ट व मर्यादित प्यार को कभी भी  छुपाने की ज़रुरत नहीं होती । जिस प्यार में  नैतिकता का उल्लंघन न  हो वह प्यार इंसान को मानसिक रूप से दृढ ही बनाता है । उसकी उन्नति ही करता है । जिस प्यार को  किसी को भी हानि पंहुचा क...

नारी की दुविधा

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एक नारी की दुविधा !पुरुष की किसी बात का उत्तर मुस्कुरा कर दे तो' लूज़ कैरेक्टर । 'जबाव देते वक़्त ना मुस्कुराए  तो ख़ड़ूस।' भाई 'संबोधित करे तो गवार  और संबोधन ना करे तो बदतमीज़। आख़िर पुरुष स्त्री के व्यवहार को सामान्य और सहज क्यों नहीं ले पाते । क्यों अपनी सोच पर निरर्थक जोर दे कर अनजाने आशय निकालते रहते हैं । क्यों सहज होकर संवाद नहीं करते।  Fb पर आई किसी भी फ्रेंड रिक्वेस्ट को सहज  और सीधे मन से  स्वीकार कर ले तो गलत ,ना करे तो महान घमंडी. कभी तो दृष्टिकोण देह से आत्मा की तरफ बदलो .कभी तो संकुचित से व्यापक की तरफ बढ़ो. पूर्वाग्रह, दुराग्रह और मलिन सोच क्या इन्ही के साथ ही संबंध निर्वहन होगा एक स्त्री -पुरुष का। क्या शरीर से ऊपर आत्म दृष्टि द्वारा दृष्टिपात नहीं हो सकता एक पुरुष का स्त्री पर.  
दरिया  को समंदर कर लें सपनों को अम्बर कर लें अब एक हो अपनी मंजिल कुछ हंसी वो मंज़र कर लें                                       बीते -रीते पल की हर फ़िजूल सी चिंता  आशाओं से खंजर कर लें  उम्मीद बंधीं जो दिल में जीवन का संबल कर लें।

तन्हा किशोर

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प्रकृति की मार देखो ,माँ-बाप के होते हुए भी वो अनाथ सा जीवन जीने को मज़बूर है  । १५ साल का ये किशोर बालक वक़्त के हाँथो की कठपुतली बना हुआ है । बचपन में ही इसकी माँ इसके पिता को छोड़ कर कहीं और चली गई । बालक का पिता भी बालक को छोड़ कर किसी दूसरे  शहर में रहने चला गया। बच्चा दादी-दादा ,चाची -चाचा के पास रहने लगा ।लाइफ ठीक-ठाक सी चल  रही थी।दादी -दादा के प्यार से वो थोड़ा संभल रहा था।कुछ साल बीते और बालक पर एक और मुसीबत आ पड़ी । इस बालक की दादी का निधन हो गया जो इसका बहुत ध्यान रखती थी । बालक  फिर से टूट गया क्योंकि दादा जी तो खुद ही सदमे में थे। बच्चा अब खुद को एकदम अकेला ,टूटा हुआ महसूस कर रहा था । चाचा का अपना परिवार है और वैसे भी ये तो सभी जानते हैं की अपने सगे  माँ-बाप जैसा प्यार और कोई रिश्ता कहाँ दे पाता है लेकिन ये बच्चा तो यहाँ भी अभागा ही रहा इसके खुद के माँ-बाप का प्यार ही इसे नहीं मिल रहा था. पूरी सच्चाई जाने क्या है लेकिन कोई भी माँ -बाप इतने क्रूर नहीं हो सकते कि उन्हें अपने बच्चे का दर्द ,उसके आँसू की कोई परवाह न हो । उनमे अपने...

'एकतरफ़ा प्यार '

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'एकतरफ़ा प्यार !'मैं समझती हूँ आप सभी ने ये शब्द कई बार और कई जगहों पर सुना होगा.मगर आज तक मैं ये समझ नहीं पाई कि प्यार एकतरफ़ा कैसे हो सकता है? इंसान प्यार के बदले ही प्यार दे सकता है. नफरत के बदले या किसी के उपेक्षित व्यवहार के बदले प्यार दे पाना किसी भी सामान्य व्यक्ति के वश की बात नहीं हो सकती । ऐसा करने वाला या तो कोई महान आत्मा हो सकता है या फिर पागल । प्यार से प्यार और नफ़रत से नफ़रत पनपती है। क्या कभी ऐसा हो सकता है कि आप किसी के गाल पर थप्पड़ मारें  और बदले में वो आकर आपको गले लगा ले कि आपने जो किया मुझे बहुत अच्छा लगा । नहीं ऐसा कभी नहीं होता है ,और यदि ऐसा कभी होता है तो वही दो बातें होती हैं कि या तो वह व्यक्ति पागल होता है या फिर एकदम महान आत्मा । किसी सामान्य व्यक्ति की नफ़रत के बदले प्यार देने की बात बिलकुल भी विश्वसनीय नहीं हो सकती । दूसरी बात ये कि हम यदि किसी को भी प्यार करते हैं तो हमे उसमें कुछ न कुछ पॉजिटिव ज़रूर दिखता है । कोई भी सकारात्मक गुण जो अपनी ओर आकर्षित करता है लेकिन वो स्वयं के प्रति उसका सकारात्मक व्यवहार ही होता है । उदाहरण के लिए, मजनू लैला के ...

सफ़ेद बालों वाले बूढे

न जाने क्यों कुछ बूढ़े अपने सफ़ेद   बालों पर काला रंग चढ़ा लेते हैं।  मुझे तो सफ़ेद बालों वाले ,गालों पर झुर्रियाँ पड़े हुए और बोबली(बिना दाँत वाली)  हंसी वाले बुज़ुर्ग बड़े ही अच्छे लगते हैं । उम्र और अनुभव की परिपक्वता उनके व्यक्तित्व को और भी समृद्ध बना देती है । उनकी निश्छल ,बोबली मुस्कान बहुत ही आकर्षक लगने लगती है । लेकिन आजकल बुज़ुर्ग भी अपने को जवां दिखाए रखने के लिए सभी तरह के प्रयास करते हैं । वो बूढ़े होते हुए भी स्वयं को बूढ़ा कहलवाना पसंद नहीं करते है और कभी -कभी अपरिपक्व व्यक्ति जैसा व्यवहार कर बैठते हैं । सच्चाई तो ये है कि जब इंसान बूढ़ा होता है तो उसकी मानसिक परिपक्वता ही बच्चों को सुख और सुरक्षा का वातावरण प्रदान करती है । बच्चे बुज़ुर्गों के सानिद्धय में स्वयं को सुरक्षित महसूस करते हैं । वो बुजुर्ग जो बच्चों को प्यारी -प्यारी कहानी सुनाते हैं ,धार्मिक ज्ञानवर्धक कथाएँ सुनाते हैं । बच्चों को अच्छे संस्कार प्रदान करते हैं ऐसे बुज़ुर्गों के लिए दिल में स्वतः ही सम्मान पैदा हो जाता है । कुछ बुज़ुर्ग बस सम्मान पाने की ही इच्छा रखते हैं और बच्चों के...
आय दिन बढ़ती रेप की घटनाओं ने  मन को उद्द्वेलित  कर  दिया है  समझ नहीं आता कि इस तरह कि मानसिकता वाले लोग बढ़ते क्यों जा रहे हैं । ऐसी कुंठित मानसिकता के लिए आख़िर कौन से कारक उत्तरदायी हैं । या तो इस तरह की मानसिकता वाले लोगों की परवरिश में ही  कुछ कमी है या इन्हें सही संस्कार नहीं मिले हैं , मानसिक रूप से कुंठित हैं ,या फिर पारिवारिक माहौल ही अपराधिक वृत्तियां बढ़ाने वाला है । जो भी हो लेकिन यदि एक इंसान के रूप में तुम जन्मे हो तो सही गलत में फर्क करके सही निर्णय लेने की बुद्धि तो ईश्वर ने तुम्हें दी ही  है ।  विचारणीय तथ्य तो ये है  कि इस तरह के अपराध करने के बाद इन लोगों में कोई पश्चाताप या ग्लानि की भावना नहीं दिखाई देती  । ना ही कोई अपराध बोध होता है । बेरहमी से किसी की हत्या करना या अनुचित कृत्य करना ,ये सब पैशाचिक लक्षण हैं जो इस तरह के लोगो के मनुष्य होने पर प्रश्न- चिन्ह लगा देते हैं । क्या पुरुष होने का अर्थ औरत पर शक्ति -प्रदर्शन करना और उसे वासना-पूर्ण नज़रों से देखना ही होता है ,कदापि नहीं । हर  अन...
'सेल 'बड़ी ही बुरी बीमारी कुछ भी लेने की लाचारी  ना हो ज़रूरत तो भी रख लो  मनगड़ंत सपने तुम बुन  लो  आज नहीं तो कल भा  जायें  ये कपड़े इसको,उसको  आ  जायें  छोटू का ले लूँ ये पज़ामा  पहनेंगे टोपी ये नाना  अम्मा को  ये शॉल दिला दूँ  श्रग पहनेंगी दीदी ये मानूँ ।  मुन्ना थोड़ा बड़ा हो जायें  ये स्वेटर उसको आ जाये  कुछ अपने लिए भी ले लूँ   कब आए जाने ये ऑफर  बैग ये सारे पूरे भर लूँ  हो गई पूरी शॉपिंग सारी  पड़ गई मुझ पर 'सेल 'ये भारी।। 
एक निश्छ ल   मुस्कुराहट में कितनी ताक़त होती है ये हम सभी जानते हैं फिर भी इसका उपयोग इतना कम क्यों  किया जाता है । एक पवित्र , छल रहित मुस्कान सभी के लिए एक स्वास्थ्यवर्धक  टॉनिक की तरह होती है जो देने और ग्रहण करने वाले दोनों के मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य को ऊर्जा प्रदान करती है । दिलों की कड़वाहट मिटा देती है ,हर द्वेष मिटा देती है, एक निष्छल ,मुस्कान । इसके विपरीत एक कुटिल ,छल युक्त मुस्कान किसी के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं होती क्योंकि इसके पीछे दुर्भावना और द्वेष छुपा होता है । आइए इस नववर्ष हम ये कोशिश करें कि सभी को अपनी निश्छल मुस्कुराहट दे सकें ताकि आपसी मतभेद मिट सके और वैचारिक उदारता का वातावरण स्थापित हो सके । 
कितनी अज़ीब बात है कि कई बार हमें किसी सही चीज़ को अपनाने में शर्मिंदगी होती है और ग़लत में सहज महसूस करते हैं । ये बात आपको विचित्र लग रही होगी परन्तु ये पूर्ण रूपेण सत्य है ।मैं बात कर रही हूँ अपनी बोलचाल की । देखिए हमारी भाषा '-मैं नी जारी 'मतलब' मैं नहीं जा रही । लेकिन 'जारी' का  मतलब तो होता है लगातार या लागू करना । बारिश जारी है । नया नियम जारी किया है । लेकिन हम प्रथम वाले वाक्य में ही ज़्यादा कम्फ़र्टेबल महसूस करते है । ऐसे ही' मैं आ री हूँ 'यानि मैं आ रही हूँ ,लेकिन प्रथम वाले का अर्थ हुआ मैं आरी हूँ मतलब पेड़ काटने का एक हथियार । अब कुछ नाम लेते हैं जैसे धर्मेन्द्र सही शब्द है लेकिन इसका उच्चारण किया जाता है धरमेंदर ऐसे ही और भी कई नाम है जिन्हें हम ग़लत बोलने का अभ्यास कर चुके हैं जैसे  राजेन्द्र ,नरेन्द्र आदि प्रभात को परभात उज्ज्वल को उजबल। अब इन्ही नामों को शुद्ध रूप में बोलना मतलब स्वयं को हँसी का पात्र बनाना । तो छोडिए और अपना ग़लत अभ्यास जारी रखिए क्योंकि यहाँ सही में बड़े ख़तरे हैं । जारी रखें ... ....भैया ये आदत सुधार ली तो दुनिया जीने नहीं देगी । ...
कुछ अलग सा रोमांच है इस सर्दी के मौसम में  ।ये मौसम मुझे बहुत अच्छा लगता है और मेरा ये मानना है कि अधिकतर लोगों को ये सर्द मौसम बहुत अच्छा लगता होगा । सर्दी के मौसम में एक अजीब सी उमंग ,एक उत्साह सा दिल में आ जाता है । मन जैसे उड़ने सा लगता है । गुनगुनी धूप  में घंटों तक बिना किसी अवरोध के बैठे रहना एक सुखद अनुभव लगता है फिर चाहे शकल पर १२ बजे या १ , धूप सेकने का मोह कम नहीं होता । त्वचा की सुरक्षा के तौर पर संस्क्रीन लोशन लगा लिया जाता है बाकी सब  सूर्य देव जी  संभाल लेते हैं । मगर इस मौसम में सबसे कष्टदायक होता है रजाई छोड़कर बाहर आना ,जी करता हैं "कैटर पिलर ' बनकर ही पड़े रहे लेकिन इससे  कुछ हासिल नहीं होने वाला ये सोचकर तमाम मोटिवेशनल स्पीकर की स्पीच याद की जाती है । संस्कृत के श्लोक दोहराए जाते हैं मगर सब व्यर्थ । अब जैसे -तैसे करके बन्दा  उठ भी जाए तो अब उसको 'स्नान"जैसी प्रताड़ना को झेलने के लिए तैयार होना पड़ता है । वैसे इस मौसम का फायदा  उठाते हुए कई लोग सब को उल्लू भी बना देते हैं । कुछ लोग बाथरूम में घुस त...