मेरे खयालातों से उसके ख़यालात नहीं मिलते वो जिद पर अड़ा है के तुम मेरा अक्स हो ।
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माँ तू दु आ सी लगती है
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Anshu chauhan
माँ! तू बीमारी में दवा लगती है मुश्किल में दुआ लगती है दिल को कोई गम नहीं छूता जब तू करीब हुआ करती है सिर पर तेरा हाथ रब का सा सुकूं देता है उस वक्त बहुत डरती हूँ जब तू दूर हुआ करती है तेरे आंचल की छाया में दर्द पिघल सा जाता है शक्ति सी हो जाती हूँ जब तू सिर को छुआ करती है । रचनाकार -अंशु चौहान तस्वीरसाभार -गूगल
भिखारी
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Anshu chauhan
हाँ मैंने देखा है एक शख्स को हाथ में कटोरा लिए , दो वक्त की रोटी का इंतजाम करते हुए । कचरा -पात्र से किसी की फेंकी हुई पाव -भाजी की प्लेट को , भूख से व्याकुल चाटते हुए । हाँ मैंने देखा है एक शख्स को किसी सफ़ेद -पोश अभिमानी से मूक-वधिर की तरह पिटते हुए । हाँ मैंने देखा है एक शख्स को , गरीबी से बेऔजार लड़ते हुए हाँ मैंने देखा है एक शख्स को तिरस्कार में भी मुस्कुराते हुए अपनी बेचारगी में भी माँ को सक्षमता का अहसास कराते हुए हाँ मैंने देखा है एक शख्स को झोपड़ी की ओट में ख़ुद के आंसू छुपाते हुए । रचनाकार -अंशु चौहान
प्रणय के उदगार
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Anshu chauhan
प्रणय के उदगार तुम्हारे मेरी स्मृतियों में बसने दो । कमसिन सी इस देह को अपने आलिंगन में बंधने दो । प्रेम -पुष्प की कोमल पंखुड़ियाँ चारों ओर बिखरने दो , मै स्वप्न -महल की राजकुमारी तनिक मुझे संवरने दो । स्पर्श-उमंगित मन की आतुरता विरह -नीर में मिलने दो , अश्रु -प्लावन होने से पहले रुको मुझे सँभलने दो । प्रियवर !अपनी चितवन की जंजीर में मुझको कसने दो , किंचित ,काश के शब्द -जाल से मुझे आप निकलने दो । आज समग्र समर्पण अपनी मुख -मुद्राओं पर करने दो , प्रणय के उदगार तुम्हारे मेरी स्मृतियों में बसने दो । रचनाकार -अंशु चौहान तस्वीर साभार - गूगल
गज़ल
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Anshu chauhan
ख़यालों से दिल को बहलाती रही हूँ मै उसने सुना न सुना मुझको ,आवाज उसको लगाती रही हूँ मै 1 .एक दर्द सा रह-रहकर उठता है ज़िगर में ,फिर भी उम्मीदों के टूटने की फ़िकर में ख़ुद को ख़ुशी से समझाती रही हूँ मै ख़यालों से ................................................................................................ 2 मायूसी का साया फैला है इस कदर से ,जोशे ज़िन्दगी भी मिट गया है जहन से बेचैनियों से दामन सजाती रही हूँ मै ख़यालों से .................................................................................................. 3 ये मुक़द्दर है जो पल-पल जीता है मुझसे ,कई बार मुझको रुलाया है इसने ख़ामोशी से ख़ुदा को बुलाती रही हूँ मै ख़यालों से ..................................................................................... तस्वीर साभार -गूगल रचनाकार -अंशु चौहान
बस एक बार कहदो
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Anshu chauhan
हालत यदि अपनी आपको बयां करूं तो, क्या तुम मुझको सुनोगे मै पास आकर आपके रो दूं तो ,क्या तुम मुझको चुप करोगे मै आपको अपनी हर बात बताना चाहती हूँ तन्हाइयों से दूर आपका साथ पाना चाहती हूँ मै दर्द भरी धड़कने अपनी आपको सुनाना चाहती हूँ ग़र मै आपको पसंद हूँ ,तो मै खुद से आपको जोड़ना चाहती हूँ कहदो के आपको मेरी हर शर्त पसंद है बस एक बार कह दो कि आपको मेरी चाहत का हर रंग पसंद है । -अंशु चौहान तस्वीर साभार -गूगल
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Anshu chauhan
मेरी ग़ैरत को तेरे सामने झुकना ग़वारा नहीं हो मशहूर कितना भी मग़र तू तो हमारा नहीं दीवाने देखे हैं बहुत फ़टेहाल चाहत में हमने दर व् दर ठोकरे 'मजनू' की सूरत में खाना मोहब्बत के सागर का ये किनारा नहीं । नाज़ दिल पे है ग़ैरों की जुबां सुनी नहीं जिसने जाए किसी के पास मकां की दहलीज़ पार कर वफ़ा ए दिल को मंजूर कोई ऐसा सहारा नहीं ।
बेबस
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Anshu chauhan
मायूस से चेहरे को व्यंग की वेदना न दो हंसी ही मिलती नहीं सबको, उन खामोश निगाहों को विवशता की आहट न दो डगमगाते क़दम कई बार संभाले हैं उसने अब होश में आने पर उपेक्षा के उसे धक्के न दो रूठी हुई ज़िन्दगी को मनाता रहा था वो आज ख़ुद से ही ख़फा है जब तो अश्कों को उसके श़क की चेष्टा न दो दर्द के भँवर में डूबी हैं उसकी सांसे मुमकिन हो ग़र तुमसे निर्दयता के उसे थपेड़े न दो ।