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'परस्पर निर्भरता '

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दुनिया का कोई भी इंसान कभी भी पूरी  तरह आत्म निर्भर नही हो सकता.यदि कोई ऐसा सोचता है तो  वह भ्रम  मे है.बचपन से लेकर बड़े होने तक किसी न किसी पर निर्भरता बनी ही रहती है.जब वह छोटा होता  हैँ तो माँ पर ,बड़ा  होता हैँ तो बाप  और दोस्तो पर.कोई व्यवसाय या जॉब  करता है तो अपने सहकर्मियो पर. यहाँ तक की अपनी कला ,प्रतिभा ,योग्यता के खरेपन(गुणबत्ता)की जांच के लिए भी अन्य के निर्णय पर निर्भर करता है. कितना अजीब है ना कि तुम किसी चीज मे योग्य हो इसका निर्धारण भी दूसरे करते  हैँ .तुम्हारा खुद का कुछ भी नही है.तुम्हारे मानने से नही बल्कि दूसरो की स्वीकृति से तुम स्थापित होते हो.दूसरों की अस्वीकृति तुम्हे असफल और स्वीकृति सफल बनाती है.दूसरो की रूचि ,उनका मत,उनका चुनाव ही तुम्हारी पहचान उजागर करता है. पूरी दुनिया ही परस्पर निर्भरता से चल रही है.चाहे कोई भी व्यवसाय या उद्योग सेवा हो.इसलिए आपकी पहचान ,शख्शियत आपकी नही बल्कि दूसरो के द्ववारा दी गयी है.किसी भी तरह का अहंम पालना . -अन्शु चौहान

"वो गौरवशाली देश लौटा दो '' .

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मै देश प्रेम की बात करूँगी , तुम विस्मृत संस्कृति लौटा दो मै वीर भूमि की बात करूँगी ,तुम वो पराक्रमी जन लौटा दो . अधर्म ,द्वेष,अनैतिकता के अनुचर, हुए यहाँ निवासी हैँ . मै नत्मस्तक हूँ तो बस अपनी धरती के उस शूरवीर पर जिसके हाथों मे सुरक्षा ,और देश की  थाती  है . स्वार्थ  रहित ,उत्सर्ग  जिनका पूरी  दुनिया  गाती  है तुम उन वीरों की वो, शहीद -स्थली लौटा  दो . मै  देश -गर्व की बात करूँगी, तुम वो खोया गौरव लौटा दो . जहाँ स्त्री -मान रक्षार्थ खड़ा हो ,पौरूष बल तल्वार लिए मै उस पुरूषत्व को  तिलक करूँगी ,तुम जन -मन मे वो प्रबल  नैतिक  स्वीकृति लौटा दो . मै  देश प्रेम की बात करूँगी तुम विस्मृत  संस्कृति लौटा दो -अंशु चौहान

''नव वर्ष "(poem)

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लिए  हाथ मे थाल तुम्हारा अभिनन्दन करती हूँ रहो श्रेष्ठ  गत वर्ष से  ज्यादा ये वन्दन करती हूँ बीते  साल  के  स्वप्न  अधूरे, तुमको  पूरे  करने  हैँ मेरी ख्वाबों की  दुनिया मे ,रंग हकीकत के भरने हैँ भूलूँ  साल पुराना पल मे  ,तुम उससे ज़्यादा दे जाना भूतकाल को विस्मृत कर दूँ ,तुम इतने सुख दे जाना . वर्तमान मे जीना हर पल ,ये ही तो समझदारी है तुम  संभालो अब अपनी सत्ता ,तुम्हारी ज़िम्मेवारी है . -अंशु  चौहान