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भौतिकता के परे सुकून

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  कितना असंतोष था पहले ज़िंदगी में कि ये अचीव नहीं किया ,वो अचीव  नहीं किया ,कुछ करना है ज़िंदगी में. नाम शोहरत ,पैसा और ज़्यादा हो.... कितनी तृष्णा थी मगर न जाने कैसे और  कब ईश्वर ने अपनी तरफ़ मुझे खींच लिया। सारी भौतिक इच्छाएँ धीरे -धीरे ख़त्म होती जा रही हैं। जो चीज़ें पहले मुझे आकर्षित करती थीं अब मुझ पर कोई प्रभाव नहीं डालती। किसी भौतिक चीज़ में मेरा आकर्षण नहीं रहा है अब हालाँकि भौतिक चीज़ों में मेरा आकर्षण पहले से ही काफ़ी कम रहा है लेकिन अब तो नीरसता सी ही पैदा हो गई है। बस सांसारिकता को निभाना एक कर्त्तव्य ,प्रभु की आज्ञा पालन और उनकी इच्छा का सम्मान करना मात्र  है।  अब आकर्षण है तो प्रभु भक्ति में ,उनकी कथा  सुनने में ,उनसे सम्बंधित किसी भी चर्चा में। उनके स्वरुप दर्शन में. अब तो बाक़ी सब चीज़ें पागलपन ,अज्ञानता से उपजी भटकन लगती हैं। सच में ईश्वर से प्रेम ,तुम्हें ये सिखा देता है कि उससे सुखद ,उससे प्यारा  ,उससे श्रेष्ठ कोई अहसास इस सृष्टि में नहीं है। सब चीज़ें ,व्यर्थ हैं। सारी उपलब्धियां कोई मायने नहीं रखती। इतने सुखद अहसास ,इतनी प्यारी अनुभूति से इत...