संदेश

फ़रवरी, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मौन_अभिव्यक्ति

चित्र
मेरी मूक अभिव्यक्ति करती गूढ़ रहस्य उदघाटित भावों की शक्ति करती है मन को मेरे संचालित । प्रश्न -चिन्ह है मुखमुद्रा पर बोधगम्य है चिंतन श्वासों का क्रम उल्टा -सीधा अवसादित है तन-मन आशय खोजता है मन मेरा जिज्ञासा आच्छादित पर उलझा जाता है पल-पल उलझन में अबाधित किंचित भी उल्लास न मिलता हर्षित हो कर भी  मन न हँसता  अंतरमन  में जटिलताओं की लहरें होती प्रवाहित  रोकती हैं तृष्णाएँ असीमित होने से उल्लासित मैं प्रतिबद्ध हूँ मौन भंग कर,न शब्द करूँ उच्चारित आत्म-द्वन्द की इस क्रीड़ा  में , छल को करूँ पराजित॥   

कोई है जो बुलाता है

चित्र
            किसी अहसास को हरपल करीब पाती हूँ मै तन्हा जब भी होती हूँ ,उससे बतियाती हूँ मै कहीं कुछ अधूरा सा ,छूटा हुआ है दिल के कोने में कौनसी दुनिया है जिसे बड़ी हसरत से खोजना चाहती हूँ मै । पागल ना हो जाऊं इतना सताता है क्यों खुद को भूल जाती हूँ इतना याद आता है वो मेरे खयालों में ही बस चंद तस्वीरें हैं उसकी जमीं पर कहाँ हकीकत है ऐसी जिसे बेख़बर ढूँढना चाहती हूँ मै । 

उत्सर्ग

चित्र
ये ज़िन्दगी कुछ मोम सी  घट रही दुःख ताप से पिघल -पिघल है आरम्भ से अंत तक वेदना का सिलसिला  ये ख़याल बस एक त्याग का जल रही तूफान में संभल -संभल । फूँक से बुझा रहा था नादान बाल वो था कयास क्या उसे दृढ़ हो रही थी स्व से निकल -निकल । हुआ अँधेरा जब जंहा इसे वंहा सजा दिया जलती रही ,जलती रही रौशनी में बुझा दिया लेके पीर दिल में यूँही रही अंत तक विकल -विकल।