'मै 'से परे ही ईश्वर हैं
'मैं' अपने आप में एक बहुत ही छली शब्द है.इसका कोई अर्थ है ही नहीं क्योंकि शरीर तो आत्मा से चल रहा है और आत्मा के शरीर से बाहर आते ही सम्पूर्ण शरीर का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है.तो आत्मा ही मूल हुई. आत्मा ही ईश्वर है. ईश्वर ही प्रमुख हुए। फिर व्यर्थ का अहम्, व्यर्थ का भ्रम नहीं पालना चाहिए की आप सब कर रहे हैं क्योंकि आप कुछ भी करने लायक रहेंगे या नहीं ये भी ईश्वर ही निश्चित करेंगे। आपकी हर सांस उसके हाथ में है। आपका प्रारब्ध व आपके आज के कर्म ही आपका वर्तमान और भविष्य निर्धारित करते हैं. कर्म अच्छे हैं तो आपकी बुद्धि पवित्र योजनाएं बनायेगी.अच्छे निर्णय करवाएगी वरना गलत कर्म,गलत योजना और निर्णय के लिए आपकी बुद्धि प्रेरणा देगी जो आपके भविष्य के लिए घातक होगी.धन, संपदा का आना या भौतिक इच्छा पूरी होना सुख नहीं है।पवित्र बुद्धि होना और हर कर्म पवित्र भाव लेकर करना भविष्य के लिए सुख की गारंटी हो सकती है।इसलिए 'मै' को नही भीतर बैठे प्रभु को ध्यान रख कर कर्म करें....