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मई, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

चाँद ,बारिश ,और चाँदनी

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गर्मी से परेशान चाँद भी ,बाट जोह रहा बादल की  शीतलता  को तभी बढ़ाऊँ ,मेहर हो जब कुछ सावन की।  गौरी के सुन्दर मुखड़े को मेरी उपमा, देते  रहे हैं सभी कविगण  गढ़ न पाएँगे कोई कविता ,हुई जो सूरत काजल सी। कुछ बूंदों का करूँ आचमन,तन पर रख लूँ चादर ठंडे बादल की हो मतवाला खेलूँ लुकाछुपी ,ढूँढे चाँदनी मतवाली सी। मेरी चाँदनी में प्रेमी -गण ,गढ़ें कहानी ख़्वाबों की दो पल उनके साथ रहूँ फिर ,दूँ थोड़ी तन्हाई भी। अपनी चाँदनी को लेकर मै जाऊँ ,ले कुछ बूँदे बारिश की उसे भिगो दूँ ,कह भी दूँ ये ,तुम धुली -खिली सी रूपमती इस पागल की। -

फ़ोबिया

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हर इंसान ज़िंदगी में किसी न किसी भय से पीड़ित होता है। कितनी मुश्किल हो जाती है ज़िंदगी जब एक अज़ीब सा डर हर वक़्त इंसान के पीछे -पीछे चलता है। ये डर किसी भी तरह का हो सकता है। इस डर को दुर्भीति या (फ़ोबिया  )  कहा जाता है। सामान्य डर और फ़ोबिया  में ये अंतर होता है कि सामान्य डर को समझा कर या तर्क से  दूर किया जा सकता है जबकि फ़ोबिया  में इंसान का दिमाग़ किसी तर्क को ग्रहण करने की स्थिति में नहीं होता। फ़ोबिया में इंसान को किसी भी तरह का डर हो सकता है -जैसे मृत्यु का भय ,किसी के खो जाने का भय ,भीड़ का भय ,ऊँचाई का भय ,गहरे पानी का भय ,छोटी या बंद जगह का भय  , किसी विशेष जंतु से भय  आदि। ये सभी मानसिक विकार की श्रेणी में आते हैं। लेकिन शायद अधिकतर लोग  ही इन विकारों की चपेट में हैं।  फ़ोबिआ में व्यक्ति को विशेष क्रियाओं या वस्तुओं से भय लगने लगता है। व्यक्ति को उन काल्पनिक चीज़ों से भी भय पैदा होने लगता है जो होती ही नहीं हैं। या फिर ऐसी सामान्य सी परिस्थिति भी उसे असहज बना देती है जो दूसरों के लिए सामान्य होती है।...
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क़िस्मत अगर अच्छी हों तो किसी भी योनि में जीव सुख भोग सकता है। अन्यथा इंसान होकर भी कुछ सुख या सम्मान अर्जित नहीं कर सकता।  एक तरफ़ ग़रीबी की मार सहते, बीमारी से ग्रसित मनुष्य और दूसरी तरफ़  अपने मालिक की गाड़ियों में सैर-सपाटा करते ,मन -पसंद खाना खाने वाले वो कुत्ते। ये सब किस्मत का ही तो फ़र्क है। क़िस्मत अच्छी हो तो सड़क के आवारा कुत्ते भी  एक अपनत्व भरा नाम पाकर सम्मानित व स्थापित बन जाते हैं । जयपुर के इस  आवारा कुत्ते की क़िस्मत उन कई कंगाल ,बदहाल इंसानों से  बहुत ज़्यादा अच्छी थी जिन्हे सड़को पर ,रेल की पटरियों पर कोई भी गाड़ी कुचल कर चली जाती है। जो भूख से तड़प कर या किसी बीमारी से परेशान होकर अपने प्राण त्याग देते हैं। जिन्हे संभालने वाला या सहारा देने वाला कोई हाथ आगे नहीं बढ़ता।  फ़्रांस की रिसर्च स्कॉलर मरियम ने जयपुर के आवारा कुत्ते की किस्मत को कुछ इस तरह सँवारा कि दिमाग ये सोचने को मज़बूर हो जाता है  कि इंसान की योनि कुत्ते की योनि से श्रेष्ठ कैसे है? फ़्रांस की मरियम ने इस कुत्ते के ईलाज़ पर 7 लाख रूप...

'विरक्ति'

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 महलों में रहने वाला एक सुविधा संपन्न व्यक्ति क्यों अचानक विरक्त हो जाता है ये मै अब  अच्छे से जान गई हूँ। आप समझ ही गए होंगे मै किस के बारे में बात कर रही हूँ जी हाँ उन्ही  'महात्मा बुद्ध' के बारे में जो सारी सुख -सुविधाएँ व अपने परिवार का मोह छोड़ कर  ईश्वर - ज्ञान प्राप्ति  हेतु विरक्ति के मार्ग पर चल पड़े थे। सच कहूँ तो विरक्ति  एक ऐसा भाव है जो इंसान के भीतर उतर कर उसे ये आभास करा देता है कि चिर स्थाई जैसा इस दुनिया में कुछ भी नहीं है। मै ये नहीं कहती कि अपने दायित्वों को छोड़ कर उनकी तरह हमें भी विरक्ति के मार्ग को अपनाकर अपना घर- वार छोड़ देना चाहिए। हाँ परन्तु इस संसार में रहते हुए भी मन को सांसारिक बंधनों से विलग रखना चाहिए। किसी भी चीज़ में आसक्ति हमेशा दुःख का कारण बनती है। इसलिए हर कर्म आसक्ति रहित होना चाहिए।    सांसारिक बंधन ,भौतिक चीज़े ये सब क्षणिक सुख दे सकते  हैं। वास्तविक सुख तो उस अलौकिक जगत में व्याप्त उस शाश्वत सत्ता में है जिसे लोग ईश्वर कहते हैं।  वो एक ऐसा स्थाई ,सुखद सत्य है ...

'प्रकृति के आग़ोश में '

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ये तुम्हारे आगोश में आने की छटपटाहट है जिसने मेरा सुकूँ छीना है मै तुम्हारी हर शय के मोह पाश में बंधी हूँ तुम्हारे ये निर्मल जल-धार वाले झरने निःस्वार्थ भाव से बहती ये चंचल नदी दृढ़ -भाव से खड़े शक्ति -संपन्न ये पहाड़ मुझे इतना लुभाते हैं कि मै समग्र समर्पण कर इनके सानिध्य में ही बस जाना चाहती हूँ वाहनों के तीखे स्वर ,विषैले धुँए की घुटन मुझे अब व्याकुल करते हैं वो पक्षिओं का कलरव ,पेड़ -पौधों की शीतल छाया फूलों की मंद-मंद मुस्कान ,मुझे अपना गुलाम बना रहे हैं बस तुम्ही तो हो जिसके आगे मै झुककर स्वं को गौरवान्वित महसूस करती हूँ तुम मेरे अंदर जो ऊर्जा का संचार करती हो उससे मेरी उदासी दूर हो जाती है और मै खिल उठती हूँ तुम्हारी गोद में एक नन्हें बच्चे की तरह तृप्त होकर।।