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"उम्र का ढलना "

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उम्र का ढलना कोई त्रासदी तो नहीं  जो हर शख्स चिंता जताता है कि उम्र बढ़ रही है  बच्चे से बड़े  होने  का जश्न हो तो , बड़े से बूढ़े होने का कैसा गम  बुढ़ापा तो कितना संपन्न होता है  बचपन ,जवानी के अनुभव लिए  आसक्ति से विरक्ति की ओर , बंधन से मुक्ति की ओर . फिर उसका शोक नहीं जश्न होना चाहिए . जीवन भार नहीं आभार होना चाहिए .  यात्रा का अंतिम चरण प्रथम से अहम् होना चाहिए . मोह रहित ,व्यसन रहित,प्रभु भक्ति में लीन  मगर  मन होना चाहिए.  - अंशु चौहान      

'मोह के वशीभूत न हों '

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 भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है कि मोह सब दुखों कारण है .मोह के वशीभूत होकर ही इंसान कई तरह के अपराध कर बैठता है .मोह ही इंसान को स्वार्थी और विवेक शून्य बना देता है .इसलिए तुम्हे कोई कितना भी प्रिय क्यों न हो उसके प्रति मोह ग्रसित नहीं होना है .प्रेम हो पर मोह न हो .अब प्रेम और मोह में अंतर समझिये.जब आप किसी का ख़याल रखते हैं तो इसे प्रेम कहते है लेकिन जब आप उस व्यक्ति विशेष का ही खयाल रखते हुए उसके लिए किसी दूसरे को हानि पहुंचाने से भी नहीं चूकते तो इसको मोहान्ध होना कहते हैं . मोह जितना उसके लिए हानिकारक है जिसके प्रति कि आप ये रखते हैं उतना ही स्वं आप के लिए भी है क्योंकि ये सही और गलत की समझ खो देता है .मोह से ग्रसित व्यक्ति की सोच विवेक रहित होती है इसलिए ये कई बार तुम्हारे अज़ीज़ का भविष्य ही ख़राब कर डालती है. इसलिए किसी के प्रति प्रेम भाव तो रखिए लेकिन मोह मत रखिए .मोह से ग्रसित मन न तो दूरदर्शी होता है न हितकारी .ये प्रत्यक्ष रूप से दूसरों का व अप्रत्यक्ष रूप से अपनों का भी दुश्मन होता है .सच तो ये है कि आप जिससे अधिक मोह रखते हैं वो भी आपके इस अति मोह से परेशान हो जाता ...