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उद्देश्य हीन मनुष्य

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कहते हैं ये मनुष्य जन्म इतना दुर्लभ है कि देवता भी इसके लिए तरसते हैं पर मनुष्य इतना मूर्ख है कि इसका महत्व ही नहीं समझ पा रहा है.ईश्वर प्राप्ति के लिए ही प्रभु मनुष्य योनि प्रदान करता है और मनुष्य पर माया का ऐसा जादू चढ़ता है कि प्रभु के अलावा सारी चीजों में उसकी रुचि होती है, सारे काम उसे ज्यादा जरूरी होते हैं प्रभु के अलावा. कोई विवेकशील व्यक्ति ही समझ पाता है उद्देश्य  को, जीवन के महत्व को.यहां लोग ऐसी व्यवस्था करने में लगे हैं जैसे यहीं स्थाई ठिकाना रहने वाला है .जबकी सब जानते हैं कि जगत में कोई स्थायी नहीं है। फ़िर भी लगे हुए हैं सोना-चाँदी एकत्र करने में,मकान पे मकान बनाने में।इच्छाए इतनी ज्यादा है कि कोई भी इंसान प्रभु से प्रभु को नहीं मांगता बल्की धन दौलत ही मांगता रहता है।इच्छा पूरी होते ही फूला नी समाता और कुछ इच्छा के विरुद्ध हो जाए तो गालियां देना शुरू कर देता है।   जीवन के प्रति तो इतना मोह है कि बुढ़ापे के चरम पर पहुंच कर भी पैसे के हिसाब -किताब में लगा रहता है.बच्चे,फिर बच्चों के बच्चे, फिर उनके भी बच्चों को देखने की तमन्ना मे ईश्वर से और अधिक उम्र की कामन...