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'अविरल बहती धारा हूँ'

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अविरल बहती धारा  हूँ  ना  मुझमें तुम रुक पाओगे जितना मुझमें डूबोगे ,उतना ही खोते जाओगे  स्पंदन प्रखर हो जाएंगे ,शब्द  शून्य -प्राण  हो जाएंगे  खोकर मेरी स्मृतियोँ में ,भाव प्रबल हो जाएँगे  फिर हो स्वीकृत ,आभार रहित,आना   इस मन के प्रांगण में, अतिथि सा सहज मन भाव लिए,   अवसाद रहित अहसास लिए, स्व मत से  विलग हो जाओगे|     अविरल बहती धारा हूँ ना मुझमें तुम रुक पाओगे -अंशु चौहान

'भक्ति रस'

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  'भक्ति' सांसारिक मोह-माया से ग्रसित लोगों के लिए हास्यास्पद  व उपयोगिता शून्य हो सकती है परंतु जिसने इस रस का पान कर लिया है वही जान सकता है इसकी मधुरता व सांसारिक चीजों की रस हीनता .ये ऐसा भाव है जो ईश्वर की विशेष कृपा प्राप्त व्यक्तियों को ही मिलता है.ये बखान करने का नहीं अनुभव  करने का विषय है. भक्ति किसी भी व्यक्ति पर थोपी नहीं जा सकती.इसे तो सरल, भावुक ह्रदय व प्रभु प्रेमी ही समझ सकते हैं.ये तो वो दुर्लभ उपहार है जिसके आगे महंगे -महंगे रत्न तुच्छ लगने लगते हैं.जिसके आगे संसार की कोई चीज़ मोहक नहीं लगती है.ये तो वो नशा है जो महलों की रानी को सम्पूर्ण ऐशवर्य को ठुकराकर जोगन बनने को मजबूर कर दे.जो एक मूर्ख को विद्वान व  महाकवि बना दे.इसे तो ऐसे ही  कुछ विशिष्ट जन  प्राप्त कर पाते हैं अन्यथा तो अधिकतर प्राणी महामाया के आदेशनुसार चलकर सांसारिक चीजों के मोहपाश में बंधे रहते हैं.आधुनिक (कलयुगी लोगों ) की नज़र में 'भक्ति' हास्य ,निराशावाद (depression)और पिछड़ेपन से ज़्यादा कुछ नहीं है.मगर ये समझपाना इन लोगों के लिए इतना आसान नहीं है कि वास्त्विक सफलता ,आशा ,उन्न...