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'परवरिश'

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मां -बाप के लिये बच्चों की परवरिश एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है लेकिन आज कल लोग इसे बहुत हल्के में लेते हैं। माँ-बाप की इस लापरवाही वृत्ति से ही अक्सर उनके बच्चे पथभ्रष्ट हो जाते हैं .उनका आचरण बिगड़ जाता है.वो  मनमानी करने लगते हैं.सही ग़लत की समझ न होने से कुछ भी ग़लत करने से नहीं डरते हैं. कई बार तो माँ बाप खुद ही इतने विवेकशून्य होते हैं कि वो बच्चों को सही और ग़लत का फर्क ही नहीं समझा पाते  हैं क्योंकि उन्हे खुद ही नैतिकता का ग्यान नहीं होता है या आधुनिक या दबंग बनाने की होड़ में वो अपनी संतान  को एकदम संस्कारहीन या बेहुदा बना डालते हैं. उनकी ये लापरवाही बाद में उनके लिये तो हानिकारक सिद्ध होती ही है साथ ही पूरे समाज के लिए भी घातक हो  जाती है.समाज में मूर्ख और अपराधी वर्ग ऐसे ही लोग तैयार कर देते हैं जो बच्चों की सही परवरिश नहीं करते. बच्चों को डॉक्टर ,इंजीनियर बना देना इतनी बड़ी बात नहीं होती जितना कि उन्हे संस्कारवान और मर्यादित  आचरण वाला बनाना.अच्छे संस्कार नहीं दिये जायें तो पीढ़ी दर पीढ़ी बेकार फसल ही तैयार होती  है.कुंठाग्रस्त,बिगढ़ैल मानसिकता का व्यक्त...

वास्तविक सुख

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ईश्वर का ज़िंदगी में आगमन एक उत्सव की तरह होता है।जैसे एक नवयुवती या नवयुवक जिनका विवाह तय होता  है वह अपनी होने वाली ससुराल  को लेकर जितने  उत्सुक और हर्षित होते  हैं  ठीक वैसे ही एक भक्ति में आने  वाला व्यक्ति अपने प्रभु या उस आध्यात्मिक लोक के प्रति दीवाना होता है।बस बड़ा अंतर ये होता है कि सांसारिक  रिश्तेदारी या ससुराल   में सुख मिलेगा या दुःख इसकी कोई गारण्टी नहीं होती पर प्रभु से रिश्तेदारी में परम सुख  और विश्वास ज़रूर मिलता है।एक ऐसा सुख जिसे पाकर फिर कुछ पाने की चाह नहीं रहती।  जिसके बाद सब तलाश खत्म हो जाती है। जिसको पाकर सब तृष्णाएं मिट जाती हैं।   एक संपूर्णता का अहसास होने लगता है। बस यही होता है वो सुख तो जो तुम्हें पाना था। यही थी जिंदगी की प्रथम  और अंतिम खोज,जिसकी शुरुआत जीवन के आरंभ से ही की जानी चाहिए थी पर नहीं की गई कोई कोशिश.  'कोरोना' मे पूरी दुनिया ने जिस प्रभु को भरपूर  याद किया था मगर फिर सब सामान्य होते ही सहजता से भुला  दिया। उस समय तो हर व्यक्ति बड़ी बड़ी बातें कर रहा था अध्यात्...

'लक्ष्य से भटकाव'

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 इंसान की तीन मूलभूत आवश्यकताएँ हैं रोटी ,कपड़ा और मकान। इन तीनो आवश्यकताओं  का पूरा होना बेशक  बहुत ज़रूरी है लेकिन आधुनिक युग ( कलयुग ) में इंसान ने इसे आवश्यकता नहीं अपने जीवन का मूल लक्ष्य या  उद्देश्य ही बना लिया है।उसके जीने का उद्देश्य अधिक से अधिक पैसा कमाकर अच्छे से अच्छे व्यंजन खाना ,महंगे से  महंगे कपड़े पहनना,बड़े से बड़ा मकान बनाना हो गया है.उनकी सोच  सिर्फ़ स्वादिष्ट व्यंजन ,मदिरा,डांस पार्टी  फैशनेबल ड्रेसेस,महंगी गाड़ी तक सीमित हो चुकी है।  ज़िंदगी का लक्ष्य सिर्फ कैसे भी कर के किसी उच्च पद को हासिल कर लेना और फिर किसी पैसे वाले  परिवार में सुन्दर लड़की या लड़के से शादी करना हो गया है और अंत में फिर अपने मनुष्य जन्म का उद्देश्य समझे  बिना भगवत भाव हीन संतान पैदा कर इस दुनिया से अलविदा कर जाना ।  इनका ये क्रम जाने कितने जन्मों तक चलता रहेगा।भगवान विवश हो कर बार-बार भेजते रहेंगे इस दुनिया में  इन्हें अपने द्वारा निर्धारित परीक्षा में असफल होने की वजह से. लेकिन इनकी बुद्धि में ये स्पष्ट नहीं हो पाएगा कि  आखिर कितने भी म...

भारतीय संस्कृति के प्रतिकूल है स्त्री-पुरुष दोस्ती

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  स्त्री-पुरूष की दोस्ती एक विदेशी  मानसिकता है .भारतीय संस्कृति में इसका कोई अर्थ नहीं है .यहाँ वेदों में स्त्री को पूजनीय माना गया है,तो यहाँ हर पुरूष को स्व पत्नी के अतिरिक्त, हर स्त्री को माँ ,बहन और बेटी के रुप में देखने को कहा है और दूसरी तरफ हर स्त्री को भी स्व पति के अतिरिक्त, अन्य सभी पुरुषों को पिता,बेटा या भाई के रुप में देखने को कहा गया है . फिर एक स्त्री या पुरूष की दोस्ती का अर्थ ही क्या है?अगर अपनत्व ही दिखाना है तो भाई-बहन के रूप में दिखायें.रिश्ता ही बनाना है तो मर्यादा और पवित्रता का बनायें। सच्चाई तो ये है कि भावों की अशुद्धता की वजह से ही ऐसा कर पाना मुश्किल होता है.अगर भाव पवित्र हैँ तो भाई -बहन के जैसे भाव रखकर निभायें ये रिश्ता.मगर कहाँ !अगर भाई-बहन जैसा सम्बंध हुआ तो मर्यादा बीच में आ जाएगी और मित्रवत व्यवहार हुआ तो उन्मुक्तता मिल ज़ाएगी हर प्रकार की.'दोस्ती' का ही रिश्ता रखना है तो भाई-बहन जैसी ही मर्यादा और पवित्रता होनी चाहिए उस में भी. देखिये वस्तु स्थिति ये है कि हर व्यक्ति को अनुशासन में ,मर्यादा में रहना मुश्किल लगता है.मनुष्य की यही दुर्बलता त...

'प्रदूषित सोच'

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  लिव इन रिलेशन-शिप,समलैंगिक विवाह जैसी बेहुदी धारणाओं को हम भारवर्ष के लोग आखिर इतनी आसानी से स्वीकार कैसे कर रहे हैं.क्या किसी को भी ये घ्रणित नहीं लगतीं ? क्यों और किसके दिमाग में पैदा हो रही है य़े गंदगी ?कहां से आ रही हैं ये धारणाएं. क्या अच्छे-बुरे का अंतर करने की क्षमता सभी की नष्ट हो चुकी है ? क्या पवित्र बुद्धि वाले, आध्यात्मिक लोग भी इन चीजों को सहजता से ले चुके हैं ,अगर नहीं तो क्यों इस तरह की चीजें खत्म नहीं हो रही बल्कि बढ़ती जा रही हैं.क्यों पहले से ही इनका विरोध नहीं किया जाता?क्यों नहीं अस्वीकार की जाती पहले से ही इस तरह की बाह्यात विचारधारायें? कितने अफ़सोस की बात है की 'लिट्रेचर फेस्टीवल' जैसी जगहों पर ऐसे हास्यास्पद विषयों की चर्चा बड़ी गंभीरता से और इस विषय के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हुये की जाती है. कितनी विचित्र बात है कि जो विषय भारत की संस्कृति में कभी स्वीकार्य ही नहीं होना चाहिए उसके पक्ष में चर्चा की जाती है.ये कल्युग का ही प्रभाव हो सकता है वरना इन विषयों का पक्षधर तो कोई होना ही नहीं चाहिये. कुछ तो पवित्र रहने दो इस सृष्टि में.घुटन मत पैदा करो...

मर्द

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'मर्द 'एक ऐसा शब्द जिसको सुनते ही अक्सर लोग दिमाग में एक मुश्टण्डे,बात-बात पर मार काट पे उतारू होने  वाले,गाली गलौच करने वाले ,स्त्रियोँ को कमज़ोर समझ कर उन पर चिल्लाने वाले किसी शख्स का चित्र अपने  दिमाग में ले आते हैं और ऐसा होना स्वाभाविक भी है क्योंकि पुरुष प्रधान समाज में पुरुष को आक्रामक  ,मुँहफट,और शक्ति प्रदर्शन करने वाला ही दिखाया गया है।  समाज की इसी सोच का नतीज़ा ये रहा है कि हर पुरुष प्रजाति का प्राणी स्वं को इसी छवि में देखने लगा है और  अपना व्यक्तित्व भी ऐसा ही बनाने का प्रयास करने लगा है लेकिन ऐसा कम बुद्धि वाले,विवेक शून्य लोगों द्वारा ही  किया जाता रहा है। जो वास्तविक अर्थ में पुरुष होते हैं वो समझते हैं पुरुष होने का मतलब। अगर हम संस्कृत भाषा की दृष्टि से इसके अर्थ को देंखे तो वेदों और सांख्य शास्त्र में  पुरुष का अर्थ परमात्मा या जीवात्मा से लिया गया है जो इस शब्द की पवित्रता को स्पष्ट करता है। लेकिन मर्द एक उर्दू शब्द है तो इसका अर्थ भी निश्चित ही अलग भाव लिए तो होगा ही.....|   हर आदमी स्वं के लिए 'मर्द' शब्द का ही अधिक प्रय...