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जुलाई, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बारिश

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काले -काले बादल नभ में ,घनघोर घटाएँ छाई हैं सावन की मतवाली बारिश हमें नहलाने आई है। मन है उमंगित ,धीर -अधीर सा,   गर्मी की सब अलसाई दूर भगाने को ठंडी फुहारों की आँगन में, भीनी ख़ुशबू आई है। बच्चों की एक टोली ने, 'नाव' सुघढ़ बनाई है चंचल बाल -मनों  में अब तो, भारी मस्ती छाई है। मोर ,पपीहा ,कोयल, मेंढ़क, सब जैसे बौराए हैं तपती धरा को बदरी ये काली, नीर थमाने आई हैं।

एक सोच देश -हित में

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क्यों दबी सी है एक आवाज़ ,जिसे गूँजना चाहिए है ये मौन क्यों अज़ीब सा,  बूझना चाहिए। एक सैलाब सा उमड़ा और बहा ले गया, घरौंदे अमन -चैन के कोई तो इंतज़ाम, सूझना चाहिए। विरोध हो ग़लत का तो सराहना सही का विरोध, रोकना चाहिए। बढ़ रही है आग क्यों ,जाति -धर्म भेद की देश क्या और किनसे है , कुछ तो सोचना चाहिए। है देश का वज़ूद और नाम, साथ हैं जब हम सभी बिखर गए तो भारत नहीं,अलग जाति -धर्म के बस समूह कहलाऐंगे। फूँक रहे  देश की संपत्ति जो, विद्रोह  के नाम पर  मंसूबों  से उन्हें क्षुद्र स्वार्थ त्यागना चाहिए।  मिट जायेंगे द्वेष -भाव सभी दिल से मानवता को व्यवहार में अपनाना चाहिए। देश की अखंडता के लिए धर्म -जाति में नहीं एकता-सूत्र में बंधना चाहिए।

'ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर'

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ओ  सी डी (ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर ) यदि आप अपनी कुछ आदतों को तारीफ़ के क़ाबिल समझते हैं तो अपनी ये ग़लत फ़हमी दूर कर लीजिए। क्योंकि कुछ आदतें तारीफ़ की नहीं वरन उपचार  की ज़रूरत रखती हैं।जी हाँ !आपकी कुछ आदतें जिन पर-   आप को गर्व  है वो डॉक्टर की  नज़र में किसी बीमारी के लक्षण भी हो सकते हैं।  हमारी कुछ आदतें ऐसी होती हैं जिन्हें हम सहज मानकर चलते हैं। लेकिन जब ये आदतें हमारे निज़ी -जीवन को असहज बनाकर समस्याएँ पैदा करने लगती   हैं तो इनको क़ाबू में करना ज़रूरी हो जाता है अन्यथा ये बीमारी का रूप ले लेती हैं।ऐसी ही आदतों का का नाम है -'ओ सी डी' बीमारी। एक ही काम को बार -बार करना ,बार -बार देखना कि काम सही से हुआ है या नहीं , बार-बार साबुन से हाथ धोना,कोई चीज़ सही जगह न होने पर आक्रामक हो जाना, फ़ालतू  चीज़ों को घर में-जमा किए रखना जैसे -पुराने कपड़े आदि,कई बार नहाना या घर की दिन में कई बार सफाई करते रहना आदि ओ सी डी के लक्षण हैं। ओ सी डी के कारण  -मस्तिष्क में ख़ास क़िस्म के एक रसायन(सेरेटोनिन )...

उसके हाथों में हम

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सांसें मेरी हिसाब वो रखता है बातें मेरी क़िताब वो रखता है बख़्शी है ज़िंदगी की सौग़ात उसने सबको छीन लेने का हक़  लेकिन खुद रखता है बनाकर जमीं पर खिलौना सभी को तमाशबीन सा मिज़ाज़ वो रखता है न मौत हाथ में है न ज़िंदगी किसी के समय पर पहरेदारी वो रखता है कैसे कह दूँ इस ज़िंदगी पर हक़ मेरा है  अधिकार सारे जब वो रखता है। न मायूस होने देता है न ख़ुश कभी ज़्यादा नाप -तौल  कर  हिदायतें वो रखता है।