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नैतिक मूल्य ही अपराध पर अंकुश

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अपराध और अपराधी किसी कोअच्छे नहीं लगते फिर भी अप्रत्यक्ष रूप से सब ख़ुद ही अपने घर में अपराधी तैयार  किये जा रहे हैं। न तो घरों में,न ही शिक्षालयों में इस बात पर ध्यान दिया जाता है कि एक बच्चे को भी अगर तुमने सही दिशा  निर्देशन से भटकने से बचा लिया ,उसे नैतिक मूल्यों का सही ज्ञान दे दिया तो तुम समाज में बढ़ते अपराधियों की  संख्या काफ़ी कम कर सकते हो. देखिये! संस्कृति को बचाने,अपराध के ग्राफ़ को कम करने में घर की और शिक्षण संस्था की  एक  महत्वपूर्ण  भूमिका होती है।घर में माँ -बाप और स्कूल में शिक्षक अगर ये भूमिका अच्छे से निभाएं तो बड़ा  परिवर्तन संभव है लेकिन आजकल न तो घर में माँ-बाप को समय है अपने बच्चों के लिए ,और न ही शिक्षकों  के पास समय है अपने शिष्यों के लिए। दरअसल आजकल सभी की मानसिकता बस पैसा कमाकर अमीर बनने की हो गई है। संस्कार,सभ्यता,नैतिकता तो आउट ऑफ़ स्लेबस हो गए हैं। ये शब्द तो रूढ़िवादी विचारों के द्योतक हो गए हैं, हास्यास्पद हो गए हैं।  इनकी सार्थकता और गहराई तो तब समझ आती है जब स्वं के ही घर का कोई सदस्य किसी अपराधी गतिविधि में ...

सफलता के सही मायने

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'सफलता ' (success)शब्द के मायने हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग हो सकते हैं। कोई व्यक्ति दौलत-शोहरत पा लेने  को सफलता मान लेता है,कोई आध्यात्मिक उन्नति को सफलता मानता है। भौतिक जगत के लोगों की दृष्टि में दौलत-शोहरत पा लेने वाला व्यक्ति श्रेष्ठ हो सकता है परन्तु वास्तविकता में  आध्यात्मिक दृष्टि से मज़बूत इंसान ही वास्तविक दृष्टि में सफल है।  इसका कारण है कि दौलत-शोहरत,आदि हर वक़्त बनी रहे ये ज़रूरी नहीं है ,सम्पन्नता और अनुकूल  परस्थिति सदैव बनी रहें ये बिलकुल ज़रूरी नहीं है अतः विपरीत परस्थिति आने पर इंसान का बिख़र जाना निश्चित  है। अतः आध्यात्मिक रूप से दृढ व्यक्ति विपरीत परस्थिति में भी खुद को संभाले रख सकता है।कारण बस इतना है   कि आध्यात्मिकता अस्थायी नहीं बल्कि स्थायी ख़ुशी और मज़बूती देती है।  अब विडम्बना ये है कि अधिकतर लोग आध्यात्मिकता के मायने ही ग़लत लगाते हैं दरअसल उन्हें स्पष्ट ही नहीं है  कि आध्यात्मिक होना क्या है।  अधिकतर लोगों की नज़रों में आध्यात्मिक होने का मतलब है कि वह व्यक्ति जो संसार  छोड़कर वैरागी बन जाये ,हर वक्त मंदिर में ब...

आध्यात्मिकता विज्ञान के लिए चुनौती

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आध्यात्मिकता और विज्ञान परस्पर विरोधी हैं अगर आध्यात्मिकता को सही से ना समझा जाए।  दोनों दृष्टिकोण एक साथ में लेकर चलना अच्छा है मगर बड़ा मुश्किल भी।काफी कुछ विरोधाभाषी है परस्पर,   क्योंकि आध्यात्मिकता जिन चीज़ों को स्वीकार करती है विज्ञान अक्सर उन्ही चीज़ों को अस्वीकार करता  है. हम चाहे कितना ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण रख लें मगर ईश्वर और अध्यात्म के स्वीकरण के बिना सब बेमानी है। विज्ञान ने चाहे कितनी ही तरक्की की हो,कितना ही सशक्त बन गया हो लेकिन सृष्टि के रचयिता की गढ़ी चीज़ों की  गणित कभी-कभी वह भी समझ नहीं पाता है।  विज्ञानं और वैज्ञानिक स्वं जिससे उत्पन्न हुए हों उससे  बराबरी आख़िर कैसे हो सकती है । ऐसी बहुत सी चीज़ें हैं जो ये सिद्ध करती हैं कि उस सृजनकर्ता के सामने हमारी सामर्थ्य कुछ नहीं है। कई ऐसी चमत्कारिक घटनाएँ हैं जो विज्ञान से कहीं ज़्यादा ईश्वर पर ,आध्यात्मिकता पर विश्वास करने को विवश करती हैं।   कुछ उदहारण यहाँ देखिये -1भगवान जगन्नाथ जी के मंदिर में लगा ध्वज हवा से विपरीत दिशा में ही क्यों उड़ता है।  2. जयपुर के गोपेश्वर नाथ जी मंद...

वैरागी मन

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  दिल में रम जाये जो विधाता,जग में कुछ भी रास ना आता  भौतिकता मन की प्रीति है,आत्मा की तो अध्यात्म नीति है।  रति-रीति,अनुराग,मोह सब माया की ही तो प्रतिकृति हैं, वैरागी मन का ठौर प्रभु हैं,मन में तो बस ईश स्मृति है। रागी को न ज्ञान लुभाये,बंधन में उसकी स्वीकृति है  वैरागी सत्संग का लोभी,बंधन उसके लिए विकृति है।  रागी को जग सुखमय है वैरागी की वनवास रति है  रागी  को देह की चिंता वैरागी को तन राख गति है।     

'ज़रा सोचिये '

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आवश्यकता  आविष्कार  की जननी है ( Necessity is the mother of invention) ये बहुत पुरानी  कहावत है।  कहावत के मायने भी सही हैं। वास्तव में इंसान को जब भी किसी असुविधा का सामना करना पड़ता है तो उसके  दिमाग में उस असुविधा से बचने के लिए उससे सम्बंधित कई उपाय ,कई जुगाड़ वाले विचार उत्पन्न होने लगते हैं।  फिर जन्म लेता है कोई आविष्कार।उस आविष्कार के बाद सब कुछ सही लगने लगता है।हर चीज़ में  सहूलियत हो जाती है परन्तु अगर पता चले कि जिन चीज़ों के आप आदी हो गए हैं उनके आविष्कार में कही कुछ  गड़बड़ है और आपको उनकी आदत छोड़नी पड़े तो आपको निश्चित ही बड़ा झटका लगेगा।  अब आप इस चीज़ को ऐसे समझिये। देखिये!पहले हम खाना पकाने के लिए मिटटी के चूल्हे  का इस्तेमाल कर थे।  उस पर बना खाना  हमारे स्वास्थ्य के लिए अच्छा था लेकिन इस चूल्हे के धुएँ से परेशान इंसान ने फिर गैस चूल्हा  बना डाला। अब शोध हो रही  कि गैस वाले चूल्हे से निकली फ्लेम  पर सिकी चपाती स्वास्थ्य के लिए सही नहीं हैं। ऐसे ही पहले  हवा करने के लिए 'बीजना 'हुआ करता था। फिर टेबल ...

'विकास नहीं पतन है ये'

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कहने को तो अब हम विकसित सभ्यता के मनुष्य हैं।सारी  सुविधाएँ और साधन रखते हैं फिर भी यूँ लगता है कि  सोच का विकास सही से नहीं हो पाया है,या यूं कहें की सोच की दिशा गलत हो चुकी है। सब कुछ होते हुए भी  अभाव ग्रसित सी ज़िंदगी जीना ,संपन्न संस्कृति होते हुए भी  संस्कार हीन ,मूल्य विहीन सा जीवन जीना न जाने क्यों चुन रहे हैं इसे हम पैसे होते हुए,फैशन के नाम पर कटे - फटे कपड़ें पहनना ,कपड़ा होते हुए भी छोटे -छोटे कपड़ें पहनना ये हमारा विकास है या पिछड़ापन।   पहले किसी ग़रीब व्यक्ति के फटे हुए कपड़े देख कर उस पर दया की जाती थी या किसी भी अन्य व्यक्ति के फटे  कपड़े देखकर उसकी आर्थिक स्थिति का आँकलन किया जाता था परन्तु अब अपनी मर्ज़ी से साबुत कपड़ों को  फाड़ा जाता है और जगह-जगह कुतर कर हम अपने को स्टाइलिश और आधुनिक मानने लगते हैं।  ये आधुनिकता है तो आदिवासी  लोग तो हमसे ज़्यादा आधुनिक हैं। इधर-उधर से कुतरे कपड़ों को पहन कर हम पूरे आत्म विश्वास के साथ चलते  हैं और साबुत कपड़ों में हीनता का  भाव महसूस करते हैं। मानसिकता का इससे ज़्यादा गिरा हुआ स्तर और क्...

''स्वच्छ बनाये भारत''

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    ईश्वर  द्वारा प्रदत्त सबसे सुन्दर उपहार है 'प्रकृति'।हमारी पवित्र नदियाँ जिनका पवित्र जलआचमन कर हमारे ऋषि-  मुनि तृप्त हुआ करते हैं,जो पहाड़ हमारे ऋषि-मुनियों और संतों के आश्रय स्थल रहे हैं।  इन सबके प्रति हमें नतमस्तक होना चाहिए,सम्मान का भाव होना चाहिए और इनकी सुरक्षा के प्रति हमें सजग होना चाहिए। इन सब की सुरक्षा का ज़िम्मा हमारा है आध्यात्मिक और भौतिक दोनों ही प्रकार से। इसलिए हम जब भी कहीं घूमने जाएँ तो इनकी स्वच्छता का पूरा ध्यान रखें और इनकी महिमा,इनकी महत्ता से  सबको अवगत कराते रहें। बड़ा दुःख होता है कि हमारे अंदर अपनी इस धरोहर को सहेज कर रखने का भाव नहीं है। हम इनके प्रति अपना  कोई दायित्व नहीं समझते हैं। हम दावे तो करते हैं देश प्रेम के व इस पर मर मिटने के लेकिन देश को स्वच्छ और सुन्दर  बनाने के लिए कोई प्रयास नहीं करना चाहते। हम कहीं भी घूमने जाते हैं  वहाँ खाने-पीने की चीज़ो के खाली रैपर  छोड़ आते हैं। डस्टबिन होते हुए भी उसका उपयोग नहीं करते सिर्फ आलसी और लापरवाही  वृत्ति के कारण।  पवित्र नदियों में गन्दी चीज़े फेंक...

अंतिम सफ़र

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  मृत्यु जीवन का अटल सत्य है। ये एक ऐसा विषय है जिस पर ज़िन्दा रहते कोई भी बात करना पसंद नहीं करता है  और मृत्यु के बाद कोई भी बात करने लायक रहता नहीं है।मृत्यु के सम्बन्ध में  सबसे बड़ी समस्या  ये है कि इसका  कोई निश्चित समय नहीं है। ये कभी भी,कहीं भी आ सकती है।अन्य  सब सामानों की तरह इंसान की  एक्सपायरी  डेट नहीं होती है.इसी अनिश्चितता की वजह से ही इंसान हर वक़्त एक अनजाने भय से ग्रसित रहता है।   ये भय हर व्यक्ति  में नहीं होता है लेकिन कुछ जो ज़िंदगी से अत्यधिक मोह ग्रसित रहते हैं और जिन्होंने भविष्य के  लिए असीमित योजनाएँ व् तृष्णाएँ पाली होती हैं उनके लिए निश्चित ही आक्रांत करने वाली होती है।  वो लोग जो ईश्वर से ज़्यादा नहीं जुड़े हैं उनके लिए ये ज़्यादा ख़तरनाक़ हो सकती है। जो लोग ईश्वर से बहुत ज़्यादा जुड़े हैं,जो प्रभु को ही सच्चा रिश्तेदार मानते हैं उनके लिए तो वो दुनिया भीअपने घर  जैसी होने वाली है. इसलिए कुछ के लिए ये जश्न है अपने प्रीतम से मिलने का और कुछ के लिए भयंकर दुःख।  ये सच है कि माया से बचना हम सांसारिक ...

'कल्कि मंदिर '(जयपुर)

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भारत एक आध्यात्मिक देश है। यहाँ की सभ्यता संस्कृति में अध्यात्म रचा बसा है। ये भूमि ऋषि -मुनियों की तपस्या  स्थली रही है। यहाँ कई बड़े -बड़े संत महात्मा हुए हैं। इसलिए यहाँ का पूरा इतिहास संतों महात्माओं के आध्यात्मिक गुणगान व महिमा से भरा हुआ है।  अब चूंकि संतों-महात्मांओ की भूमि रही है तो अनेकानेक मंदिरों का होना भी लाज़मी है। भारत में लगभग 20 लाख  कुल मंदिर हैं.यहाँ हर राज्य में कई मंदिर मिलेंगे। कुछ मंदिर तो ऐसे हैं जिनसे लगभग सभी परिचित हैं और यहाँ  भ्रमण भी करते रहते हैं। लेकिन कुछ मंदिर ऐसे अज्ञात और रहस्यमयी हैं जिनके  बारे में स्वं वहाँ रह रहे लोगों को भी  पता नहीं है।ऐसा ही एक मंदिर है जयपुर के सिरह ड्योढी में स्थित भगवान कल्कि का मंदिर.हवामहल बाजार में स्थित ये मंदिर 3०० साल पुराना है।    ये दुनिया का एकमात्र ऐसा मंदिर है जिसे भगवान के भविष्य में होने वाले अवतार की कल्पना करके बनाया गया है और जहाँ भगवान विष्णु के भविष्य में  होने वाले इस अवतार की पहले से ही पूजा भी की जा रही है। ये अवतार है भगवान विष्णु का 10वा अवतार,कल्कि अवतार। ...

कलंकित न हो संस्कृति

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  हमारी भारतीय संस्कृति का अलग ही  गौरव है,अपनी अलग विशेषता है।  विदेशी भी भारतीय संस्कृति का सम्मान  करते हैं।यहाँ की संस्कृति की कुछ ख़ास  विशेषताएं हैं जिसकी वजह से सभी  लोग इसकी ओर आकर्षित होते हैं।  इस संस्कृति का मूल स्वरूप खोना नहीं  चाहिए। किसी अन्य संस्कृति से प्रभावित  होकर हमें अपनी इस गरिमामय  संस्कृति को विसराना नहीं चाहिए।  लेकिन आज हम यही मूर्खता कर रहे हैं।  अपनी इस संस्कृति को छोड़कर हम  पाश्चात्य संस्कृति को पूरी तरह अपनाने  पर उतारू हो रहे हैं।  माना के समय के अनुसार चलना व  परिवर्तित होना ज़रूरी है लेकिन ये  परिवर्तन उन्नति और विकास के लिए  होना चाहिए मगर हम तो ऐसा परिवर्तन  पसंद कर रहे हैं जो हमारे पतन को  निमंत्रण देने वाला है।  पहले लिव इन रिलेशनशिप को कानूनी  सहमति देना और अब समलैंगिक विवाह  को अनुमति देने पर विचार  -विमर्श करना।आख़िर कितना नीचे  गिराएंगे हम अपनी संस्कृति को? कितना  और पतित होंगे हम? कुछ तो सोचिये!संभालिये देश को! वरना संस...

वर्ण व्यवस्था और लोकतंत्र

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  वर्णव्यवस्था भारतीय हिन्दू सामाजिक संगठन का प्रमुख आधार रही है।  धर्म -शास्त्रों के अनुसार समाज में प्रचलित प्रमुख  4 वर्ण का मूल आधार था  व्यक्ति के गुण ,कर्म अथवा व्यवसाय।  गुण कर्मों के आधार पर समाज में क्रमशः ये 4 वर्ण निर्धारित किये गए थे -ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य ,शूद्र। मनुस्मृति में  इन 4 वर्णों के लिए निम्नलिखित व्यवसाय बताये गए हैं -ब्राह्मण के लिए -पुजारी,विद्वान ,शिक्षक ,इंजीनियर और  डॉक्टर।  क्षत्रिय के लिए-शासक ,योद्धा,सैनिक(आधुनिक समय के  हिसाब से प्रशासनिक उच्च पद व आर्मी  आदि में), वैश्य के लिए-जमींदार,व्यापारी आदि व शूद्र के लिए सेवा प्रदाता का कर्म। इस सब का आध्यात्मिक महत्त्व ये था कि इनके माध्यम से व्यक्ति को कर्म-फल, पुनर्जन्म तथा मोक्ष आदि आध्यात्मिक  सत्यों में विश्वास दिलाया जाता था। वर्ण व्यवस्था के अनुसार हर व्यक्ति के द्वारा इन कर्तव्यों का पालन किया जाना अनिवार्य था। वर्ण व्यवस्था का प्रारंभिक रूप ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में मिलता है। उत्तर वैदिक काल के बाद वर्ण व्यवस्था कर्म आधारित न होकर जन्म पर आधारित...

लड्डू गोपाल

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कलयुग में 'भक्ति' ही इंसान के उद्धार का एकमात्र साधन है। विशुद्ध (निष्काम )भक्ति से ईश्वर को सहज ही पाया  जा सकता है। भक्ति के प्रकार भी अलग-अलग हो सकते  हैं और सबके ईष्ट भी अलग -अलग। कुछ शिव जी को  मानते हैं ,कुछ राम जी को ,कुछ माँ दुर्गा को, कुछ कृष्णा जी को और कुछ इन सभी को। कृष्ण का स्वरूप   चंचल,नटखट ,और सर्वाकर्षक होने के कारण अधिकतर भक्त गण  कृष्ण जी के प्रति आकर्षित हो जाते है. कृष्णा जी का बालरूप( लड्डू गोपाल )रूप आज कलयुग में लोगों को अत्यधिक आकर्षित कर रहा है। इसलिए  आजकल एक होड़ सी मच  गयी है लड्डू गोपाल जी को घर मे लाने की।  ईश्वर भक्ति किसी भी रूप में की जाये ग़लत नहीं है लेकिन भक्ति का सम्बन्ध आत्मा से है इसलिए इसमें दिखावा  नहीं होना चाहिए।कई लोग आजकल देखा -देखी से या इस भावना से लड्डू गोपाल जी को घर पर लाते हैं कि  उनको  लाने से उनकी सारी मनोकामनायें पूरी हो जाएंगी, तो ऐसी भावना से नहीं बल्कि सेवा करने की भावना से  लाएं। साथ ही उनको उठाकर यहाँ -वहाँ न ले जायें क्योंकि अगर आप बाल रूप में मान रहे हो तो एक छोटे...

'मौन'

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कहते हैं कि मौन में बड़ी ताकत होती है। प्रायः देखा गया है कि साधु-संत भी मौन रहना ही पसंद करते हैं। ये भी  कहा जाता है कि असंतुष्ट और अज्ञानी व्यक्ति को ज़्यादा बोलने की आदत होती है क्योंकि एक संतुष्ट और ज्ञानी  व्यक्ति के पास अधिकतर प्रश्नों के उत्तर होते हैं और हर चीज़ से संतुष्ट रहने के कारण उसे बोलने की ज़रूरत नहीं  पड़ती है।वह सीमित वार्तालाप ही करता है।  ये भी कहा जाता है कि मौन रहने के इतने फायदे हैं कि इसको अपनाकर तमाम विवादों  से बचा जा सकता है  लेकिन ये बात थोड़ी अज़ीब लग सकती है सामान्य व्यक्तियों के सन्दर्भ में,क्योंकि अगर किसी व्यक्ति का किसी से  झगड़ा हो जाये तो क्या उस स्थिति में किसी एक पक्ष के मौन धारण कर लेने पर झगड़ा शांत हो जाएगा या और  बढ़ेगा। क्योंकि क्रोध में पागल व्यक्ति की बात का उत्तर न दिया जाये तो वो इतना आक्रामक हो जाता है कि वो  आपका सिर भी फोड़ सकता है, आपकी मौनावस्था से क्षुब्ध होकर।तो उस स्थिति में आपका मौन आपकी ज़िंदगी  को ही सदैव के लिए मौन कर सकता है।  ठीक इसी तरह अगर कहीं अपराध या अन्याय हो रहा है और आप ये स...

ये चिड़ियाघर नहीं है भाई

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  मैंने एक बार घर में एक बिल्ली पाली थी। पाली क्या थी गले पड़ गई थी भाई साहब । बिल्ली ही नहीं उसका परिवार भी।   बिल्ली के २ बच्चे ,उसका पति सब  का नाश्ता पानी मेरे ही सर आ गया था। पशु-पक्षी के प्रति प्रेम भाव के  कारण हमने  ये पंगा  लिया था । ख़ैर जैसे -तैसे करके हमने २-३ महीने इस परिवार की सेवा की।  जैसे-तैसे इसलिए नहीं कि इन्हे खिलाने में असमर्थ थे बल्कि इसलिए कि किसी भी पक्षी या पशु को पालकर उसकी  स्वतंत्रता ,उसका स्वच्छंद  वातावरण नहीं छीनना चाहते थे । साथ ही इनकी कुछ वृत्तियाँ और हमारी कुछ  विवशताएँ  थीं जिनके रहते ये सब कर पाना मुश्किल था।अतः मेरी इच्छा की सुनवाई हुई और कुछ समय बाद ये  स्वं ही अपने -अपने  चयनित स्थान की तरफ़ गमन कर गए और फिर कभी इनके दर्शन नहीं हुए। एक लम्बे अंतराल के बाद कुछ बिल्लियां  और उनके बच्चे आस -पास ,फिर से  दिखाई दिए। ये कोई अन्य परिवार  था । हमारे मन में भय उत्पन्न हुआ कि ये लोग फिर से कहीं गले ना  पड़ जाएं इसलिए हमने तुरंत एक कुत्ते की  व्यवस्था कर ली। अरे भई ! इ...

सुंदरता

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'सुंदरता 'एक ऐसा तत्व जो सभी को अपनी ओर आकर्षित करता है। सुंदरता की परिभाषा और इसके मापदंड सबके लिए अलग -अलग हो सकते हैं। किसी व्यक्ति की नज़रों में एक व्यक्ति सुन्दर हो सकता है परन्तु दूसरे की नज़र में कोई और। इसलिए सान्सारिक लोगों की सुंदरता के मायने अलग हैं। यहाँ कुछ लोगों की दृष्टि में बहुत गौरा ,लम्बा -चौड़ा (अध्यात्म रहित ,अक्खड़ स्वभाव का व्यक्ति सुन्दर हो सकता है। कुछ लिपि-पुती महिलाएँ सुन्दर हो सकती हैं।  कुछ की नज़रों में फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाला ,महंगी पोशाक में लिपटा ,चमकता हुआ  (क्रीम से पुता )व्यक्ति सुन्दर हो सकता है। लेकिन मेरी नज़रों में या यूँ कहें सुंदरता के वास्तविक नज़रिये से एक किसी कुटिया में रह रहा ,पवित्र आचरण वाला ,साधारण से लिबास में लिपटा  ,आध्यात्मिक आभा से युक्त व्यक्ति सर्वाधिक आकर्षक व सुन्दर है।  आचरण की पवित्रता ,अध्यात्म की चमक ही व्यक्ति की वास्तविक सुंदरता होती है मगर  इसे महसूस करने के लिए आँखों में वही पवित्रता होना भी ज़रूरी है।  इस भौतिक जगत के लोग चाहे कितने सौंदर्य प्रसाधन अपना लें ,चाहे कितनी नयी वेश-भूषायें आजमा ले...

'तुम्हारी याद'

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भूलना चाहता हूँ मगर तुम्हारी याद दिला देती है   तन्हाई अक्सर मेरे गम को बढ़ा देती है सिगरेट के धुएँ सा जलता है मेरा दिल  हर एक आह सीने की जलन बढ़ा देती है  गयी हो जब से तुम खाली सा हो गया हूँ  हर बात बीती हुई,उदास सी मेरी शाम बना देती है  ढूँढता हूँ घर के हर एक कोने में तुम्हें  बिखरी हुई हर चीज़ तेरे अवसान की तहरीर बता देती है  तुम थीं तो तुम्हारी क़द्र ना थी कभी  अधूरी हर चीज़ अब तेरी क़ीमत बता देती है।  -अंशु चौहान 

आसक्ति

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  इंसान की दुर्गति का सबसे बड़ा कारण हैं किसी भी व्यक्ति या वस्तु में आसक्ति।आसक्ति से ही अन्य तमाम विकार  पैदा होते हैं। गीता में कहा गया  है कि कोई भी कर्म हमे निरासक्त भाव से ही  करना चाहिए। किसी भी चीज़ में  आसक्ति का मतलब है कि हम उस वस्तु,व्यक्ति या कर्म-फल के प्रति इतने मोह ग्रसित हो जाते हैं कि उसके बिना  हम खुद के जीवन के मायने खोने लगते हैं। हम किसी भी क़ीमत पर उसे अर्जित करना चाहते हैं और नहीं मिलने  पर अवसाद ग्रसित होकर अपराध की राह पर चलने लगते हैं।  आसक्ति इसलिए अधिक घातक है क्योंकि वो इंसान के विवेक को नष्ट कर देती है,उसकी सहनशक्ति ख़त्म कर  देती है। उसे मानसिक रूप से पंगु बना देती है।  किसी के प्रति आपकी आसक्ति,आपकी भौतिक व नैतिक दोनों ही प्रकार की उन्नति अवरुद्ध कर देती है।  आसक्ति कर्म बंधन में फँसा देती है। अनेक इच्छाएँ ,लोभ व दुर्वृत्तियाँ पैदा कर देती है. अब यदि आपने अपनी विवेक शून्यता से आसक्ति पैदा कर ही ली है तो इसे दूर करने के लिए आपको उन विशेष  चीज़ों के प्रति अपना नज़रिया बदलना पड़ेगा। नज़रिया बदलेगा जब ईश्वर...