'विकास नहीं पतन है ये'
कहने को तो अब हम विकसित सभ्यता के मनुष्य हैं।सारी सुविधाएँ और साधन रखते हैं फिर भी यूँ लगता है कि सोच का विकास सही से नहीं हो पाया है,या यूं कहें की सोच की दिशा गलत हो चुकी है। सब कुछ होते हुए भी अभाव ग्रसित सी ज़िंदगी जीना ,संपन्न संस्कृति होते हुए भी संस्कार हीन ,मूल्य विहीन सा जीवन जीना न जाने क्यों चुन रहे हैं इसे हम पैसे होते हुए,फैशन के नाम पर कटे - फटे कपड़ें पहनना ,कपड़ा होते हुए भी छोटे -छोटे कपड़ें पहनना ये हमारा विकास है या पिछड़ापन। पहले किसी ग़रीब व्यक्ति के फटे हुए कपड़े देख कर उस पर दया की जाती थी या किसी भी अन्य व्यक्ति के फटे कपड़े देखकर उसकी आर्थिक स्थिति का आँकलन किया जाता था परन्तु अब अपनी मर्ज़ी से साबुत कपड़ों को फाड़ा जाता है और जगह-जगह कुतर कर हम अपने को स्टाइलिश और आधुनिक मानने लगते हैं। ये आधुनिकता है तो आदिवासी लोग तो हमसे ज़्यादा आधुनिक हैं। इधर-उधर से कुतरे कपड़ों को पहन कर हम पूरे आत्म विश्वास के साथ चलते हैं और साबुत कपड़ों में हीनता का भाव महसूस करते हैं। मानसिकता का इससे ज़्यादा गिरा हुआ स्तर और क्...