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मई, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अंतिम सफ़र

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  मृत्यु जीवन का अटल सत्य है। ये एक ऐसा विषय है जिस पर ज़िन्दा रहते कोई भी बात करना पसंद नहीं करता है  और मृत्यु के बाद कोई भी बात करने लायक रहता नहीं है।मृत्यु के सम्बन्ध में  सबसे बड़ी समस्या  ये है कि इसका  कोई निश्चित समय नहीं है। ये कभी भी,कहीं भी आ सकती है।अन्य  सब सामानों की तरह इंसान की  एक्सपायरी  डेट नहीं होती है.इसी अनिश्चितता की वजह से ही इंसान हर वक़्त एक अनजाने भय से ग्रसित रहता है।   ये भय हर व्यक्ति  में नहीं होता है लेकिन कुछ जो ज़िंदगी से अत्यधिक मोह ग्रसित रहते हैं और जिन्होंने भविष्य के  लिए असीमित योजनाएँ व् तृष्णाएँ पाली होती हैं उनके लिए निश्चित ही आक्रांत करने वाली होती है।  वो लोग जो ईश्वर से ज़्यादा नहीं जुड़े हैं उनके लिए ये ज़्यादा ख़तरनाक़ हो सकती है। जो लोग ईश्वर से बहुत ज़्यादा जुड़े हैं,जो प्रभु को ही सच्चा रिश्तेदार मानते हैं उनके लिए तो वो दुनिया भीअपने घर  जैसी होने वाली है. इसलिए कुछ के लिए ये जश्न है अपने प्रीतम से मिलने का और कुछ के लिए भयंकर दुःख।  ये सच है कि माया से बचना हम सांसारिक ...

'कल्कि मंदिर '(जयपुर)

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भारत एक आध्यात्मिक देश है। यहाँ की सभ्यता संस्कृति में अध्यात्म रचा बसा है। ये भूमि ऋषि -मुनियों की तपस्या  स्थली रही है। यहाँ कई बड़े -बड़े संत महात्मा हुए हैं। इसलिए यहाँ का पूरा इतिहास संतों महात्माओं के आध्यात्मिक गुणगान व महिमा से भरा हुआ है।  अब चूंकि संतों-महात्मांओ की भूमि रही है तो अनेकानेक मंदिरों का होना भी लाज़मी है। भारत में लगभग 20 लाख  कुल मंदिर हैं.यहाँ हर राज्य में कई मंदिर मिलेंगे। कुछ मंदिर तो ऐसे हैं जिनसे लगभग सभी परिचित हैं और यहाँ  भ्रमण भी करते रहते हैं। लेकिन कुछ मंदिर ऐसे अज्ञात और रहस्यमयी हैं जिनके  बारे में स्वं वहाँ रह रहे लोगों को भी  पता नहीं है।ऐसा ही एक मंदिर है जयपुर के सिरह ड्योढी में स्थित भगवान कल्कि का मंदिर.हवामहल बाजार में स्थित ये मंदिर 3०० साल पुराना है।    ये दुनिया का एकमात्र ऐसा मंदिर है जिसे भगवान के भविष्य में होने वाले अवतार की कल्पना करके बनाया गया है और जहाँ भगवान विष्णु के भविष्य में  होने वाले इस अवतार की पहले से ही पूजा भी की जा रही है। ये अवतार है भगवान विष्णु का 10वा अवतार,कल्कि अवतार। ...

कलंकित न हो संस्कृति

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  हमारी भारतीय संस्कृति का अलग ही  गौरव है,अपनी अलग विशेषता है।  विदेशी भी भारतीय संस्कृति का सम्मान  करते हैं।यहाँ की संस्कृति की कुछ ख़ास  विशेषताएं हैं जिसकी वजह से सभी  लोग इसकी ओर आकर्षित होते हैं।  इस संस्कृति का मूल स्वरूप खोना नहीं  चाहिए। किसी अन्य संस्कृति से प्रभावित  होकर हमें अपनी इस गरिमामय  संस्कृति को विसराना नहीं चाहिए।  लेकिन आज हम यही मूर्खता कर रहे हैं।  अपनी इस संस्कृति को छोड़कर हम  पाश्चात्य संस्कृति को पूरी तरह अपनाने  पर उतारू हो रहे हैं।  माना के समय के अनुसार चलना व  परिवर्तित होना ज़रूरी है लेकिन ये  परिवर्तन उन्नति और विकास के लिए  होना चाहिए मगर हम तो ऐसा परिवर्तन  पसंद कर रहे हैं जो हमारे पतन को  निमंत्रण देने वाला है।  पहले लिव इन रिलेशनशिप को कानूनी  सहमति देना और अब समलैंगिक विवाह  को अनुमति देने पर विचार  -विमर्श करना।आख़िर कितना नीचे  गिराएंगे हम अपनी संस्कृति को? कितना  और पतित होंगे हम? कुछ तो सोचिये!संभालिये देश को! वरना संस...