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बेतुकी कविता

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माना के नहीं है कोई छंद ,कोई लय,बेतरतीब सी गुथी है अनगढ़ से शब्दों में  पर तुम ठहरे तो सही ,तनिक रुक कर अवलोकन तो किया,कुछ शब्द तो कहे आलोचना में | तुम्हारा समीक्षक मन एक विषय चुन ले गया मेरी इस बेतुकी कविता से एक आलोचक ,एक समीक्षक तो दिया  मेरी कविता ने | नहीं लेना मुझे ख़िताब श्रेष्ठ कवि होने का बस मन में उत्पन्न इस वैचारिक उथल - पुथल को व्यक़्त करना चाहती हूँ कुछ शब्दों से विद्द्वता का कोई प्रदर्शन नहीं करना ,न ही बटोरने हैं प्रशंसक अपनी तारीफ़ में बस निर्बंध ,उन्मुक्त हो वो सब कुछ कह देना चाहती हूँ चयनित शब्दों की इस पाती  से जिसका बोझ दिल सह नहीं पाता ,बस कुछ भार कम करना चाहती हूँ कि मन हल्का -फुल्का हो उड़ान भरे अम्बर में | बन्धन मुक्त ,स्वतंत्र लेखन की  हूँ पक्षधर ,बस संयत भाषा ,गहन चिंतन से ऐसी कोई रचना गढ़ु जो मुझमे सिमटा सब ज़ाहिर कर दे , नियम ,छंद ,बंधन हीन ,उन्मुक्त कोई रचना चाहती हूँ मै सच कहूँ तो ऐसी ही बेतुकी कोई कविता चाहती हूँ मै | -अंशु चौहान

'जागृत हुआ मन'

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ज़मीं से फ़लक  तक एक उड़ान बाक़ी है उल्टे हरफ़ की सीधी पहचान बाक़ी है| मुझमे सोई सी एक अंजान शक्ति को जगाने बुलंद सी  कोई एक आवाज़ बाक़ी है| अब जागूँगी ,नहीं खोऊंगी सपनों में इन निराधार ,निरंकुश स्वप्नों को डराने हक़ीक़त का एक  अंकुश बाक़ी है| बहुत हुई आराम के बिछौने पर चैन की साँसें अब श्रम से उपजी थकान पाना बाक़ी है| लो तुम भी बढ़ाओ अब हौसला कुछ मेरा इस सफ़र में तुमसे भी कुछ उम्मीद बाक़ी है ||