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कभी -कभी

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याद तो अब भी आते हो लेकिन पहले से बहुत कम कभी -कभी नींदे तो अब भी उड़ाते हो लेकिन पहले से बहुत कम कभी -कभी चाहत तो अब भी निभाते हो लेकिन पहले से बहुत कम कभी -कभी वो शोर ,वो बग़ावत तो अब भी है लेकिन पहले से बहुत कम कभी -कभी मिलने के बहाने तो अब भी बनाते हो लेकिन पहले से बहुत कम कभी -कभी आँखों में नमी, वो सिसकियाँ तो अब भी हैं लेकिन पहले से बहुत कम कभी -कभी सबके ताने तो अब भी सताते हैं लेकिन पहले से बहुत कम कभी -कभी रूठ जाऊँ तो मनाने अब भी आते हो लेकिन पहले से बहुत कम -कभी -कभी शिक़वे तो अब भी हैं लब पे लेकिन पहले से बहुत कम कभी -कभी उम्मीद मिलने की अब भी है लेकिन पहले से बहुत कम कभी -कभी मैं भी उलझती हूँ इन बातों में लेकिन पहले से बहुत कम कभी -कभी

मूक दर्शक

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कुछ नहीं बोलूँगी बस इतना कह दो कि मृत प्राय : हो चुकी हैं संवेदनाएँ तुम्हारी और अब अहसास भी नहीं होता किसी की पीड़ा का तुम्हे क्योंकि पत्थरों से सिर टकराने की आदत नहीं है मेरी। हर बात तुम तक पहुँचें पर प्रतिक्रिया शून्य हो तो समझा जा सकता है कि उस परिवेश से आगे निकल आए हो तुम जहाँ तुम्हें इंसानियत का अहसास था अब जीने लगे हो भाव-हीन ,निरंकुश ,निष्ठुर दुनिया में जहाँ कोई मानवीय पीड़ा ,कोई अनाचार तुम्हें व्याकुल नहीं करता किसी दुर्भाव से तुम्हें कोई रंजिश नहीं होती। इस नीरवता को धारण कर तुम ख़ुद को शांत और अहिंसक सिद्ध करना चाहते हो  तो जाओ  मै तुम्हें कायर ,धर्म -विमुख  और पलायनवादी घोषित करती हूँ। बोलो स्वीकार करते हो !  रहने दो ,बने रहो यूँही मूकदर्शक। -अंशु चौहान

ज़िद तो बस ज़िद है

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ज़िद तो बस ज़िद है कभी वाज़िब ,तो कभी वाज़िब नहीं होती कुछ जायज़ ,नाजायज़ तमन्नाओं का असर रखती है कभी उठा लेती है आसमान सर पर छोटी सी चीज़ पाने को तो कभी मचा देती है तूफ़ान नई क्रांति लाने को ये अपने मेहरवान पर जूनून सवार रखती है. ज़िद तो बस ज़िद है कभी वाज़िब, तो कभी वाज़िब नहीं होती। समन्दर ,नदी ,पहाड़ का भी रुख मोड़ दे जो शोर , आँसुओं की जुबां जिसके पास हो जमीं से आसमां तक फ़ैसले बदलने की ताक़त रखती है ज़िद तो बस ज़िद है कभी वाज़िब तो कभी वाज़िब नहीं होती। खिलौनों की दुकान में बच्चों की मनमानी तक गहनों -आभूषणों में  नारी की दीवानगी तक ऊँची क़ीमतों में भी ,क़ीमत अदा कराने  की मज़ाल रखती है ज़िद तो बस ज़िद है कभी वाज़िब तो कभी वाज़िब नहीं होती।

'भिंडी रही इठलाई'

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सारी सब्ज़ी औनी -पौनी ,भिंडी सबके मनको भाई छरहरी काया में सिमटी, बीच सब्ज़ी संग इठलाई। फ़ेरी वाले ने जैसे ही 'भिंडी 'की आवाज़ लगाई बच्चों ने ज़िद करके सुबह -शाम बनवाई। पूछो इनसे सब्ज़ी में ,क्या है आज बनाना झट बोलेंगे खाने में बस, भिंडी ही है खाना। टिंडे,कद्दू ,तुरई की अब तो, भैया शामत आई मुँह फुलाए बैठी हैं सब ,कोई इनको भी पूछो भाई। सारी सब्ज़ी करती हैं शिकायत ,भिंडी तूने की क्या चतुराई तुझ पर ही आ कर रुकते सब, हम तक नज़र ना आई। सब्ज़ी -मंडी ,गली ,मौहल्ले की रेड़ी  पर तूने ही धाक जमाई इस गर्मी में  बची -कुची सी, हम रही कुम्हलाई। -अंशु चौहान

भटकता पथिक

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मुझे बता ए पथिक ज़रा ,किस पथ पर तू चलता है पग -पग ठोकर ,दर्द बहुतेरे  पथरीली इन राहों पर, क्या ध्येय लिए निकलता है। आनी -जानी सी हैं सांसें ,ना देह तत्व अविनाशी है क्या पाने की इच्छा जग में, किस फल का अभिलाषी है। दलदल सा जग ,मृग -मरीचिका ,उतना धसता जितना रमता है नित्य नए -नए सपने बुनकर ,ख़ुद ही क्यूँ उलझता है। कभी आह्लादित ,कभी रुदन सा ,ये जीवन राग अनूठा है एक पल मीठा स्वाद है इसका, तो अगले पल खट्टा  है। नहीं कहती सब मोह त्याग दे ,कर्तव्यों का निर्वाह न कर लेकिन मुक्त वही यहाँ पर, जो प्रभु अनुचर हो भक्ति -पथ हेतु निकलता है।

उसूलों की ख़ातिर

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इस बेईमान दुनिया में कुछ ईमान तो रख. दे मगर, कुछ सामान अपने पास भी रख. छोड़ दे परवाह बेहिसाब  बंदिशों की दिल में सच्चाई का एक तूफ़ान तो रख. लोगों की नज़रों में उठने की परवाह फ़िज़ूल है ख़ुदा की निगाहों में स्वं को भला इंसान तो रख. रोकेंगी जमाने की गुस्ताख़ तोहमतें लेकिन  उसूलों के लिए ,मिटने की  एक आग तो रख। तू कल भी यहीं था ,आज भी यहीं है आगे बढ़ने की कुछ  शुरुआत तो रख।  मंज़िल क़रीब ही  है अब तेरी पाने  के दिल में अरमान तो रख।

उलझा मन

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ये ज़िंदगी का तज़ुर्बा हसीन,हर कोई बरख़ुरदार नहीं रखता। यहाँ हर शख़्स  कुछ अधूरी ख़्वाहिशें ,दिल में कुछ मलाल रखता है. हर कोई उलझा है हाथों की लक़ीरों में मुखौटो में छुपा के हर कोई अपना हाल रखता है. सामान बेशक़ीमती घरों में लेकिन मिज़ाज़  बीमार ,सेहत फटेहाल रखता है। टूटते हुए  रिश्तों  की बेचारगी सी लेकर खड़ा हो कटघरे में ,ख़ुद के लिए  कई सवाल रखता है। पहरेदारी है हक़ीक़त पर सपनों की बेहद भूत-भविष्य का जी को जंजाल रखता है। बिक चुका है आराम ख़ुद ही के हाथों से पाने का फिर भी उसी को ,नाहक ख़याल रखता है।

नेकी की राह

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हाथों में थाम कर चलते हैं नेक़ी, हल्की बहुत है ढोते क्यों बोझ बदी का ,भारी बहुत था।  उसकी पाक़ नसीहत अब  दिल में उतर गई है  आवारगी में भटकना मेरा शगल था। समेट कर अपने हिस्से की गुस्ताख़ियों को छोड़ आया हूँ जहाँ अँधेरा बहुत था। लौट आया हूँ रौशनी की उस राह पर मै मासूमियत का जहाँ सवेरा  बहुत था। ये जो मेरी रूह पर अमन का असर है आया है जहाँ से, सद्भावनाओं का बसेरा बहुत था।