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'अहिंसा और शाकाहार'

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अहिंसा को  किसी  धर्म  विशेष से  जोड़कर नही  देखना  चाहिए  .अहिंसा  का सम्बन्ध  तो  आत्मा  से  है .वो  हर  व्यक्ति  जो  भावुक  है ,जीवों  के  प्रति  दया -भाव  रखता  है ,उनसे  प्रेम  करता  है , कभी  हिंसक  या  मांसाहारी  नही  हो  सकता .आखिर  कैसे  कोई  एक  मासूम  ,निर्दोष  ,असहाय  जीव  को  स्वं  के  लिए मार -काट  सकता  है ,उसके  मृत  शरीर  मे मिर्च -मसाले डालकर उसमे  स्वाद  ढूंढ सकता  है .रास्ते  मे  पड़े  मृत  जानवर को,या किसी भी मृत जानवर की देह को देखकर हमारे अंदर  घृणा और दया के भाव उत्पन्न होते हैँ फिर  इसमे  हम  स्वाद कैसे खोज लेते हैँ.कितनी विचित्र  बात है कि पहले तो हम एक निर्दोष जानवर को  क्रूरता से मार डालें और फिर उस मृत जीव को  अपने पेट मे ग्रहण कर लें.क्या हमारा पेट  शमशा...

मृत्यु -लोक

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भयग्रस्त,आक्रांत,कुछ ख़ुश मिज़ाज़ से, कुछ शख़्स हैं आराम से, तो कुछ परेशांन से, हर सूरत लगे सच और स्वप्न भी कभी , अनिश्चय ,असमंजस ,अस्थिरता का ये मृत्यु लोक मुझे अच्छा नहीं लगता। कर्म-फल,पाप-पुण्य का गणितीय लेखा -जोखा , दण्ड ,प्रताड़ना दहशत भरी साँसे, जीवन परीक्षा-स्थल सा, ये मृत्यु लोक मुझे अच्छा नहीं लगता। आवागमन आत्मा का,यूँ देह का आना -जाना किराये का घर सा ये मृत्यु -लोक, मुझे अच्छा नहीं लगता है शरीर रुधिर,अस्थि मज्जा , साँस,प्राण सब उधार के, अपने ही शरीर पर  पराया नियंत्रण,कठपुतली सा हाल किए ये मृत्यु लोक मुझे अच्छा नहीं लगता. -अंशु चौहान

'मारसाहब'

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  हमारे बचपन में ,गुरु का मतलब होता था -मारसाहब। जी हाँ ये शब्द तो था 'मास्टर साहब 'मगर उस समय में हमारे ये गुरूजी (मारसाहब ) स्टूडेंट्स की इतनी पिटाई किया करते थे कि  इनका नाम करण ही मास्टर साहब से 'मारसाहब' हो गया था। गिनती न आने पर,सवाल न आने पर बेंत की एक लकड़ी मंगाई जाती थी,जिसे स्थानीय भाषा में (संटी ) कहा जाता था। इस लकड़ी से मास्टर जी विद्यार्थियों  के हाथ सूता करते थे। कई -कई शिक्षक तो  बिना सोचे समझे कनपटी पर इतनी तेज खींच कर चाटा मारा करते थे कि चक्कर आने लग जाते थे, बेचारे स्टूडेंट को।भगवान का शुक्र है कि आज के समय में कुछ एक अपवाद को छोड़कर सभी शिक्षक फ्रेंडली और कूल स्वभाव के होते हैं. क्या किसी को भय ग्रसित करके कुछ सिखाया जा सकता है ?शिक्षा तो विनम्रता ,सहनशीलता और स्नेह  से पूर्ण व्यक्ति ही दे सकता है। शिक्षा प्रदान करने वाला जब तक खुद मानवीय गुणों और मृदु व्यवहार से युक्त नहीं होगा तब तक न तो वह ख़ुद शिक्षा देने का अधिकारी है न ही विद्यार्थी उससे शिक्षा ग्रहण करने में रूचि रखने वाला होगा।  आज कानून  ने स्टूडेंट्स  को कुछ ...

'वास्त्विक सुरक्षा तो उसकी तरफ़ से'

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बीमा  पॉलिसीज़  के प्रति लोगों की बढ़ती रूचि का कारण भविष्य को सुरक्षित रखने की सकारात्मक सोच माना  जाए या जीवन की क्षण भंगुरता के अहसास से प्रेरित एक नकारात्मक सोच ? मुझे तो लगता है कि भविष्य की इस क़दर चिंता ने इंसान को इतना नेगेटिव बना दिया है कि हर वक़्त वह एक अनजाना सा भय लेकर बस किसी भी तरह भविष्य को सुरक्षित बनाने की ही सोचता रहता है | इस इंतज़ाम में वह अपने अमूल्य वर्तमान की इतनी ज़्यादा उपेक्षा कर रहा है कि भविष्य की सुरक्षा ही ख़तरे  में पड़ती जा रही है | इतना भय रखकर हम अपने  वर्तमान और भविष्य  दोनों को ही जीने लायक स्थिति में नहीं बचेंगे |जब वर्तमान पहले है तो इसे फ्यूचर के लिए क्यों कुर्बान कर दें और वैसे भी फ्यूचर किसने देखा है।  ज़िंदगी का तो किसी की भी  और कभी भी कुछ भरोसा नहीं है। माना के फ्यूचर की चिंता एक प्रैक्टिकल  और अच्छी सोच है लेकिन जीवन और ईश्वर के प्रति इतना अविश्वास भी तो अच्छा नहीं है। सबसे बड़ी और सुरक्षित पॉलिसी तो उसकी तरफ़ से होती है। उसकी पॉलिसी और सत्ता में जिस दिन गहन आस्था हो जाए...

वक़्त से शिक़ायत

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कितना धीमे -धीमे चलते हो तुम, दुःख के हर दिन में कछुए की भाँति सुख के हर दिन में तुम्हारी ,चाल खरगोश सी हो जाती है  एक गति बढ़ाए नहीं बढ़ती ,दूसरी थामे नहीं थमती है |  सारी दुनिया को वश में करके ,ख़ुद निरंकुश हो जाते हो  मन की मर्ज़ी चले न आगे, जैसे चाहे नचाते हो |  मनमानी चालों पर सबकी, तुम लगाम लगाते हो  बड़ा न तुम से कोई जग में ,अहसास सहज दिलाते हो | कभी दर्द दे जाते तुम ही, मरहम भी ख़ुद ही लगाते हो  डर ,साहस ,सौंदर्य ,राग सब मुट्ठी में भर कर लाते हो  जाने क्या है लेखा -जोखा कहाँ ,कब ,क्या छोड़  चले जाते हो |  कोई शूरवीर नहीं ऐसा ,तुम्हें क़ाबू कर पाया हो  तुम्हें हराकर इस सृष्टि में, जो विजयी बन पाया हो |  इतनी सी बस है शिकायत ,दुःख के लम्हे कम कर दे  सुख की अवधि किसी तरह भी ,बस थोड़ी लम्बी कर दे | | 

बेतुकी कविता

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माना के नहीं है कोई छंद ,कोई लय,बेतरतीब सी गुथी है अनगढ़ से शब्दों में  पर तुम ठहरे तो सही ,तनिक रुक कर अवलोकन तो किया,कुछ शब्द तो कहे आलोचना में | तुम्हारा समीक्षक मन एक विषय चुन ले गया मेरी इस बेतुकी कविता से एक आलोचक ,एक समीक्षक तो दिया  मेरी कविता ने | नहीं लेना मुझे ख़िताब श्रेष्ठ कवि होने का बस मन में उत्पन्न इस वैचारिक उथल - पुथल को व्यक़्त करना चाहती हूँ कुछ शब्दों से विद्द्वता का कोई प्रदर्शन नहीं करना ,न ही बटोरने हैं प्रशंसक अपनी तारीफ़ में बस निर्बंध ,उन्मुक्त हो वो सब कुछ कह देना चाहती हूँ चयनित शब्दों की इस पाती  से जिसका बोझ दिल सह नहीं पाता ,बस कुछ भार कम करना चाहती हूँ कि मन हल्का -फुल्का हो उड़ान भरे अम्बर में | बन्धन मुक्त ,स्वतंत्र लेखन की  हूँ पक्षधर ,बस संयत भाषा ,गहन चिंतन से ऐसी कोई रचना गढ़ु जो मुझमे सिमटा सब ज़ाहिर कर दे , नियम ,छंद ,बंधन हीन ,उन्मुक्त कोई रचना चाहती हूँ मै सच कहूँ तो ऐसी ही बेतुकी कोई कविता चाहती हूँ मै | -अंशु चौहान

'जागृत हुआ मन'

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ज़मीं से फ़लक  तक एक उड़ान बाक़ी है उल्टे हरफ़ की सीधी पहचान बाक़ी है| मुझमे सोई सी एक अंजान शक्ति को जगाने बुलंद सी  कोई एक आवाज़ बाक़ी है| अब जागूँगी ,नहीं खोऊंगी सपनों में इन निराधार ,निरंकुश स्वप्नों को डराने हक़ीक़त का एक  अंकुश बाक़ी है| बहुत हुई आराम के बिछौने पर चैन की साँसें अब श्रम से उपजी थकान पाना बाक़ी है| लो तुम भी बढ़ाओ अब हौसला कुछ मेरा इस सफ़र में तुमसे भी कुछ उम्मीद बाक़ी है ||

'ये फ़र्क क्योँ रहमत में '

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जी हाँ !जानवरों की जान की भी अलग-अलग क़ीमत होती है किसी को मारने से रोजग़ार  चलता है तो किसी को  मारने की सज़ा जेल होती है | 'जीव' यूँ तो सभी में एक ही  होता है लेकिन सब पर इंसान की रहमत अलग होती है | कुछ के दर्द और आँसुओं की कोई औक़ात नहीं होती जबकि किसी की 'आह'(दर्द ) पर दुनिया सुबकती है | कुछ बिखर जाते हैं रस्ते में टुकड़े -टुकड़े होकर और रह से गुज़र रहे शख़्स के शिकन तक नहीं होती वहीँ कुछ पहुँचा देते हैं सलाख़ों के पीछे और आसानी से ज़मानत तक नहीं होती | ये अंतर न जाने क्यूँ है यहाँ, जबकि प्रभु की अदालत ऐसे भेदभाव से कभी सहमत नहीं होती | क्या कुछ फ़र्क है शेर ,चीते ,हिरण और मुर्गे ,बकरे के प्राणों में फिर इनकी रक्षार्थ प्रयासों में, एक सी हरक़त क्यों नहीं होती | हर जीव का जीवन ज़रूरी है ,सबकी जान का महत्व सम होना चाहिए  | कुछ भी हो ,कैसे भी हो बस जीव हत्या रुकनी चाहिए |

'मेरे शहर की सड़कें'(poem)

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  मेरे शहर की सड़कें एकदम साफ़ हों , जो भी फेंकें कचरा ना ग़लती माफ़ हो|  हर बीमारी दूर रहे तो ,भीतर मन भी पाक हो  मेरे शहर की सड़कें एकदम साफ़ हों |  खुले में ना कोई शौच करे ,न पशु विचरण  सर - ए -राह  हो  दूर देश में शहर ना ये बदनाम हो |  मेरे शहर की सड़कें एकदम साफ़ हों  जो भी फेंके कचरा ना गलती माफ़ हो |  हो अतिथि सत्कार ,ना मेहमाँ  परेशां हो  हर विज़िटर  की नज़र में जयपुर खास हो|  मेरे शहर की सड़कें एकदम साफ़ हों  जो भी फेंके कचरा न गलती माफ़ हो |  जो भी आये अधरों पर मुस्कान हो स्वच्छता से अब इसकी पहचान हो |  मेरे शहर की सड़कें एकदम साफ़ हों  जो भी फेंके कचरा न ग़लती माफ़ हो | |  - (गीत ) स्वच्छ भारत अभियान हित समर्पित 

'बालिका'

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माँ  की  अल्मारी  मे  मेरे बचपन  का  कोई खिलौना  नही  मिलता गाँव  की  उन  गलियों  मे  अब  मेरा  कोई  ज़िक्र नही मिलता अब समझी  मै  बालिका  होने  का  मतलब ये  वो  है  जिसे  अपने  ही  घर  मे  अपना  हक नही  मिलता बेटे  की  ख्वाहिशें  जहाँ  सर्वोपरी  होती  हैं , बेटी  की  तमन्नाओं  को  कोई  दाम  नही मिलता. बड़ा  अजीब  सा  आलम  है  कि  कन्या  पूजन  भी  होता  है  मगर ,देवी  सा  उनको  सम्मान  नही  मिलता  . चरण -स्पर्श  भी  होते  हैं  नवरात्रों  मे  लेकिन ताउम्र  मन मे उनके  प्रति  वो  सुविचार  नही  मिलता . समझ  चुकी  हूँ  बालिका  होने  की  सज़ा  क्या  है , ये  वो तितली  ...

फितरत

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ख्वाहिशें ,सपने ,ध्येय ,उम्मीदें  सब दिल  मे  डेरा  जमाए  बैठे  हैं खत्म  करूँ  इनको  तो  दिल  खाली  है पाल के रखूँ  तो  सेहत  मे  कंगाली  है इनके  वजूद  को  भी  रख लूँ ये  सेहत  भी  सँभाल  लूँ हम  ऐसे  ही  किसी  मशविरे  की  आस  लगाए  बैठे  हैं मेरी  आदतों  पर  मत  जाना  ए  दोस्त कभी  खुशमिजाज़  भी  दिखते  हैं तो  कभी  मुँह भी  फुलाए  बैठे  हैं चुगलियाँ  ना  करना  मेरे  मनमौजी  मिजाज़  की जो  दुश्मन थे  कभी  हमारे ,आज  दिल  भी  लगाए  बैठे  हैं मेरी  एक  हरकत  पर  वो  तूफान  मचा  देते  हैं सुन  लो  गौर  से ये भी , दिल  मे बबँडर   हम भी छुपाए  बैठे  हैं . -अंशु  चौह...

'स्वरचित कुछ शेर'

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मेरे कुछ शेर- सब फूलों में एक सी ख़ुशबू  नहीं मिलती  कुछ खास बात है आपमें जो औरों में नहीं मिलती ||  मलबूस ओढ़ा करे इंसानियत का तो क्या  नियत तेरे जैसी साफ़ -सुथरी इस जहाँ की नहीं  तेरी वफ़ा ,तेरे प्यार की क़ायल  हूँ मै  सनकी लोग हमे कहें कोई परवाह नही ||  * गुलशन ए  मोहब्बत वीरां  था अब तक  ए  मसीहा मेरे तुम गुल बनके महके हो ||  * इस जहाँ में तू उस जहाँ में ख़ुदा  है  दोनों की इवादत से मिली है मोहब्बत  कब लगा है तू और ख़ुदा जुदा हैं ||  * सँभाल के रखती हूँ दिल में तेरी हर बेपरवाही को बेवजहा ही तुम मुझे 'लापरवाह 'नाम देते हो .|  * उससे मेरा मिजाज़ अलग था ना मेरी उससे, ना उसकी मुझसे बनी बातें जब भी हुई बस अनबनी,अनबनी सी हुई .|  * क्यों बोए रखते हो दिलों में नफरत के बीज अच्छी फसल में क्या खरपतवार अच्छी लगती है | * वो जो तेरी वफ़ा पर हज़ार पहरेदारियाँ रखता है , टूट कर चाहने की एक अदा ही तो है .|  * ना कर इतनी मोह...

'गणित तुम भूत से '

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तुमसे जितना दूर मै भागी  उतना ही तुम पीछे आए  बचपन पर तुमने मेरे  कैसे -कैसे प्रतिबन्ध लगाए  जीना इतना किया है दूभर    बिन तेरे ना कोई काम सध पाए  क़दम -क़दम पर देता दस्तक  पीछा कोई कैसे छुड़ाए  विद्यालय में तुझसे जूझे  ट्यूशन में फिर से मिल जाए  एक मिनिट को चैन ना पाते  मौज़ -मस्ती पर रोक लगाए  परीक्षा में दिल की धड़कन को  बेरहमी से तू ही बढ़ाए  कपड़ों का  बाज़ार या सब्ज़ी -मण्डी  कहाँ -कहाँ तुझसे नज़र बचाएँ  भूत-प्रेत सा मुझे लगे ये  जितना देखूँ जी घबराए  है क्या कोई पंडित ,ओझा  डर गणित का  जो दूर भगाए |  -अंशु चौहान 
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मै भी खड़ी हूँ झूठ के प्रतिरोध में लेकिन चयन शब्दों का मर्यादा में मै  बेहतर समझती हूँ |  छोड़ दूँ बंदगी ,भूलकर शिष्टता त्यागकर  अपनी आन और शान -बान को  इस क़दर बेअदब होना मै बद्द्तर समझती हूँ  | चयन शब्दों का मर्यादा में मै बेहतर समझती हूँ |   भरी आक्रोश में हूँ ख़ूब ,मन दहकती ज्वाला है ,तहज़ीबों की सीमा ने इस दिल को सँभाला है |  छोड़कर संस्कृति और संस्कार को ,त्यागना इस तरहा सद्व्यवहार को , सभ्यता और दिलों पर मै ये नश्तर समझती हूँ |  चयन शब्दों का मर्यादा में मै बेहतर समझती हूँ |