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'तेरी भक्ति में मैं '

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निर्लिप्त,निर्दोष,बेगुनाह हो गया हूँ  तेरी भक्ति से पाक-निगाह हो गया हूँ  लोभ,मोह,बेवजह का भटकाव मिट गया है   ज़िन्दगी की दुश्चिंताओं से बेपरवाह हो गया हूँ तू मुझमें जब से बैठा है सुकूँ बनके यकीं कर, मैं फ़कीरी में भी बादशाह हो गया हूँ  तुझसे मेरी नजरों का मिलना भी गज़ब था मोहब्बत में तेरी फनां हो गया हूँ शुरू तुझसे हुआ,खत्म भी तुझमें रहूँगा मैं दिल से तेरी पनाह हो गया हूँ मुझमें बाकी हैं अब क्या,चन्द सांसों का सफर है मेरी मंजिल तू ही,मैं आगाह हो गया हूँ.          - -अंशु चौहान                           

'चलती रहो ,निरंतर,अनवरत '

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रोज देखती हूँ नए सपने,रोज उठती हूँ मन में उत्साह लिए रखती हूँ हर कदम संभल के मंजिल के लिए,मगर मंजिल नहीं मिलती. खाली पन्नों पर बढ़ता जाता है भारी शब्दों का बोझ, उदास सी चलती है रफ्तार से दौड़ने वाली कलम. निचुड़ा हुआ दिल कोसता है ज़ज्बातों को, सयाना दिमाग संभाल लेता है सारी बिगड़ी बातों को . धैर्य,विवेक की बातें कर फिर खड़ा कर देता है मंजिल को दर्शाते पत्थर के पास,  यूँ कह कर कि अब शुरू करो विश्वास के, हौसले के साथ, हारोगी नहीं,पा लोगी उस मंजिल को, बस चलती रहो ,बिना रुके,निरंतर,अनवरत . -अंशु चौहान