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'मेरे शहर की सड़कें'(poem)

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  मेरे शहर की सड़कें एकदम साफ़ हों , जो भी फेंकें कचरा ना ग़लती माफ़ हो|  हर बीमारी दूर रहे तो ,भीतर मन भी पाक हो  मेरे शहर की सड़कें एकदम साफ़ हों |  खुले में ना कोई शौच करे ,न पशु विचरण  सर - ए -राह  हो  दूर देश में शहर ना ये बदनाम हो |  मेरे शहर की सड़कें एकदम साफ़ हों  जो भी फेंके कचरा ना गलती माफ़ हो |  हो अतिथि सत्कार ,ना मेहमाँ  परेशां हो  हर विज़िटर  की नज़र में जयपुर खास हो|  मेरे शहर की सड़कें एकदम साफ़ हों  जो भी फेंके कचरा न गलती माफ़ हो |  जो भी आये अधरों पर मुस्कान हो स्वच्छता से अब इसकी पहचान हो |  मेरे शहर की सड़कें एकदम साफ़ हों  जो भी फेंके कचरा न ग़लती माफ़ हो | |  - (गीत ) स्वच्छ भारत अभियान हित समर्पित 

'बालिका'

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माँ  की  अल्मारी  मे  मेरे बचपन  का  कोई खिलौना  नही  मिलता गाँव  की  उन  गलियों  मे  अब  मेरा  कोई  ज़िक्र नही मिलता अब समझी  मै  बालिका  होने  का  मतलब ये  वो  है  जिसे  अपने  ही  घर  मे  अपना  हक नही  मिलता बेटे  की  ख्वाहिशें  जहाँ  सर्वोपरी  होती  हैं , बेटी  की  तमन्नाओं  को  कोई  दाम  नही मिलता. बड़ा  अजीब  सा  आलम  है  कि  कन्या  पूजन  भी  होता  है  मगर ,देवी  सा  उनको  सम्मान  नही  मिलता  . चरण -स्पर्श  भी  होते  हैं  नवरात्रों  मे  लेकिन ताउम्र  मन मे उनके  प्रति  वो  सुविचार  नही  मिलता . समझ  चुकी  हूँ  बालिका  होने  की  सज़ा  क्या  है , ये  वो तितली  ...

फितरत

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ख्वाहिशें ,सपने ,ध्येय ,उम्मीदें  सब दिल  मे  डेरा  जमाए  बैठे  हैं खत्म  करूँ  इनको  तो  दिल  खाली  है पाल के रखूँ  तो  सेहत  मे  कंगाली  है इनके  वजूद  को  भी  रख लूँ ये  सेहत  भी  सँभाल  लूँ हम  ऐसे  ही  किसी  मशविरे  की  आस  लगाए  बैठे  हैं मेरी  आदतों  पर  मत  जाना  ए  दोस्त कभी  खुशमिजाज़  भी  दिखते  हैं तो  कभी  मुँह भी  फुलाए  बैठे  हैं चुगलियाँ  ना  करना  मेरे  मनमौजी  मिजाज़  की जो  दुश्मन थे  कभी  हमारे ,आज  दिल  भी  लगाए  बैठे  हैं मेरी  एक  हरकत  पर  वो  तूफान  मचा  देते  हैं सुन  लो  गौर  से ये भी , दिल  मे बबँडर   हम भी छुपाए  बैठे  हैं . -अंशु  चौह...