संदेश

मनुष्य जन्म का उद्देश्य

चित्र
  एक बात समझ नही आती कि  जब मनुष्य जन्म  का उद्देश्य अच्छे कर्म करके  ईश्वर  प्राप्ति करना ही है तो हम ऐसी चीजों को क्यों प्रमोट कर रहे हैं,ऐसी चीजों में क्यों खुशी ढूंढ रहे हैं जो ईश्वर से दूर ले जा रही हैं . क्लब पार्टी ,दारू पार्टी,डांस बार इन सब की क्यों ज़रूरत है ?क्यों जगह-जगह पवित्र कीर्तन ,भजन और यज्ञ का वातावरण नहीं बना देते ताकि सबकी अशुद्ध बुद्धि शुद्ध हो सके।क्यों स्कूल, कॉलेज में गुरुकुल जैसा माहौल नहीं बना देते? क्यों नैतिक  और आध्यात्मिक उन्नति पर ज़्यादा ज़ोर नही देते? संस्कृति, सभ्यता को नाश करने वाली चीजें भी परोसेंगे फिर अपराध बढ़ेंगे तो कहेंगे कि कलयुग आ गया, लोग बिगड गए.बिल्कुल वैसा ही जैसे कोई खुद ही नदी में डूब जाए और फिर चिल्लाकर कहे कि मुझे बचा लो.है ना कोरी मूर्खता? पहले मानवीयता बचाये तभी मानव सभ्यता बचेगी.हम खुद ही अपराधी तैयार कर रहे हैं फिर उन्हीं से परेशान हो रहे हैं और हम अपराध को मिटाने की इच्छा भी कर रहे हैं।कलयुग भी हम अपने कर्मों से बनाते हैं और सतयुग भी. --- https://youtube.com/@merirachnamereswar?si=eluR-g07t6fgf9g- 👆 ...

गलत सोच और कर्म पर नियंत्रण जरूरी

चित्र
जिंदगी में स्वतंत्रता जितनी जरूरी है उतना ही  नियंत्रण भी है।हर वक्त दी गई स्वतंत्रता घातक सिद्ध हो सकती है.भीतर और बाहर दोनो से नियंत्रण ज़रूरी है . आंत्रिक नियंत्रण (क्रोध ,द्वेष,अधीरता आदि पर) नहीं होगा तो बाहर की प्रतिक्रियाये दुर्घटना व विनाश का कारण बनेंगी. अजकल बढ़ रही सड़क दुर्घटनाएं भी इसी कारण से हो रही हैं कि लोग किसी को भी अपने से आगे निकलते हुए देखकर एकदम बौखला उठते हैं चाहे वो  सड़क पर गाड़ी चलाते हुये किसी का उससे   आगे निकल जाने की सामान्य सी बात क्यों ना हो . आजकल लोगों में अजीब सी अधीरता ,उतावलापन और  कुण्ठा पनप गई है. नैतिक और भावनात्मक  स्तर इतना गिर चुका है कि लोगो को ये ही समझ नही आ रहा कि किस बात पर नाराज होना चाहिये और किस पर नही . ऐसी छोटी छोटी बातों पर लोगो को आवेश में आते देखा है जो वास्तव में बहुत मामूली सी होती हैं. चेतना का गिरा हुआ स्तर ही ये सब करवाता है जब इंसान अपनी 'मै' से बाहर नही आ पाता .मेरा सम्मान ,मेरी पूजा ,सिर्फ मेरा अधिकार ,सब को खुद से नीचे देखने की तमन्ना ,किसी को सुख मे देखने से उत्पन्न दर्द और छटापटाहट...

पति-पत्नी का रिश्ता

चित्र
पति-पत्नी का रिश्ता कहते हैं दो आत्माओ का रिश्ता होता है। इस रिश्ते को अगर वफ़ा और निष्ठा के साथ निभाया जाए तो सबसे अच्छा रिश्ता है जो वृद्धावस्था में सबसे ज्यादा आत्मिक हो जाता है .भारतीय संस्कृति में तो पति को देवता माना जाता है .मगर ये ध्यान रखने योग्य बात है कि उसी पति को परमेश्वर माना जाता है जो चरित्र से अच्छा हो, व्यभिचारी को नहीं।एक पत्नी व्रती पति और पतिव्रता स्त्री का स्थान तो देवताओं की दृष्टि में भी उच्च होता है। भारतीय संस्कृति का सम्मान करने वाले तो इसे मानते भी हैं लेकिन आजकल पाश्चत्य सभ्यता से प्रभावित लोग इस रिश्ते की अहमियत भूल गए हैं, इसलिए छोटी-छोटी बातों में तलाक जैसी स्थिति आ जाती है दोनो ही पक्ष अगर प्यार और सम्मान की भावना रखते हुए रिश्ता निभाए तो इस रिश्ते की ऐसी दुर्दशा ना हो.आख़िर अन्य toxic रिश्ते भी तो हम निभाते ही हैं .पति-पत्नी के रिश्ते में तलाक का विकल्प होता है, इसलिए हम इस में सहनशीलता नहीं दिखाते। बस बात-बात में तलाक का विकल्प तलाशने लगते हैं.इसलीये अन्य रिश्तों की तरह इसे भी सही से निभाएं विकल्प ना ढूंढे।पति या पत्नी व्याभिचारी हो तो त्याग देना चाहि...