बुराई और कलियुग
कलियुग और बुराई का घनिष्ठ संबंध है .ये एक दूसरे के पूरक हैं.अगर बुराइयों का अस्तित्व न हो तो कलियुग का अस्तित्व भी संभव नहीं है और कलयुग है तो बुराइयां होना भी स्वभाविक है। मोह और लोभ जैसी भावनाएं ही कलयुग में प्रबल होती हैं। 'मोह' सही और ग़लत का फ़र्क करने से रोक देता है और विवेक हर लेता है। मोह ही लोभ पैदा करता है जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति कोई भी अपराध करने पर मज़बूर हो जाता है। लोभ इंसान में तृष्णा पैदा करता है ,असंतोष पैदा करता है।लोभ के वशीभूत इंसान इन्द्रिय तृप्ति हेतु कुछ भी व कैसे भी पाने को उत्सुक रहता है। यही दोष कलयुग का अस्तित्व बनाये रखने में ज़िम्मेदार होते हैं। अगर हर व्यक्ति के मन से से ये दोष निकल जाएँ तो कोई बुराई ही नहीं रहेगी,अपराध नहीं होंगे और अपराध नहीं होंगे तो हर व्यक्ति हर वक़्त सुरक्षित रहेगा। व्यवस्था सुधारने हेतु किसी तंत्र की आवश्यकता नहीं होगी। वास्तव में बुराइयाँ ही कलयुग में सारी परस्थिति ऐसी विपरीत बना देती हैं कि इंसान इनमें उलझता जाता है। इन बुराइयों की वजह से...