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मातृ -भाषा

भारत -माँ की बेटी 'हिंदी' पाती  दर -दर ठोकर नाज़ों से पलती अंग्रेजी ग़ैर की बेटी होकर आकर्षण में बाँधा ऐसे, निज -भाषा का गौरव हीन  किया समृद्ध ,समर्थ' हिंदी 'का पद पल में इसने छीन  लिया मातृ -भाषा अपनाने में  ना, शर्म देश के लाल करो दो वैभव इस भाषा को तुम गर्व  से अपने भाल धरो । भावों की अभिव्यक्ति में' हिंदी' शक्तिशाली भाषा है राज करे हिंदी सदियों तक मन में यही अभिलाषा है भाषायें सभी  यूँ तो सम्मान की अधिकारी हैं लेकिन स्व देश में इसकी सर्व -प्रथम बारी है । -अंशु चौहान (  हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में- 2015, मेरी डायरी से )

बाल-बाल बचे

जान हथेली पर लेकर, हम नहाने निकले थे  कैसे बताएँ कितनी बुरी तरह ,हम फिसले थे । बच गई हैं हड्डियाँ साबुत, ये खुदा  की रहमत है ''ख़तरों के खिलाड़ी'' प्लेटफार्म से ,यूं तो गुज़रे थे । कुछ इधर-उधर हुई हड्डियों की, मरम्मत अभी बाक़ी है जब गिरे तो जैसे ,दिन में तारे निकले थे । किस कमबख़्त ने, कोसा न जाने फ़िल्मी गानों के, रियाज़ पर निकले थे। बदल के चैनल भक्ति-गीत में बस प्रभु कृपा से जीवित निकले थे ।। 

'ऊटी यात्रा अनुभव '

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ऊटी   भारत देश में प्राकृतिक सौन्दर्य की कमी नहीं है । लगभग हर राज्य हरी -भरी वादियों ,फूलों की घाटियों ,पर्वतों  ,नदियों ,झरनों आदि से संपन्न है । बस एक बार घूमने निकल जाइए फिर लगेगा कि अभी बहुत कुछ देखना बाकी  है । ये देश कितना सुन्दर है । गर्व होता है यहाँ के प्राकृतिक वैभव पर । हर राज्य की अपनी विशेषता है । अपना खान -पान है । इस बार हमने दक्षिण भारत के 'ऊटी 'को भ्रमण के लिए चुना । कोयंबटूर के उत्तर में  ८० किलोमीटर दूरी पर स्थित है ये सुन्दर क़स्बा । प्राकृतिक छटाओं से घिरा हुआ अति सुन्दर  व साफ़ -सुथरा  है । चारों -तरफ़ नीलगिरी की पहाड़ियां हैं ।तमाम  झीलें ,झरने और घाटियाँ हैं ।अधिकतर हिंदी फिल्मों की शूटिंग यहीं पर हुई है जैसे -'हम आपके हैं कौन ','दीवाना  ', दिल से ,कुछ -कुछ होता है और साजन आदि के गानों को यहीं फिल्माया गया है।  यहाँ पर अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती जी के मोनार्क ग्रुप ऑफ़ होटल्स भी हैं ।इन सबके साथ ही सबसे अच्छी बात ये है कि यहाँ के लोग सफ़ाई के प्रति बड़े ही सजग हैं ...

अज़ीब निषेध

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कुछ अटपटी  परम्पराएँ ,थोपे हुए अनर्थक विचार , पारंपरिक निषेध (टैबूज ) ने  हमारे समाज ,हमारी संस्कृति में ऐसी पैठ जमा ली है कि कोई भी सुधारक ,कोई भी प्रगतिशील विचारों का प्राणी चाहकर भी इन्हें समाज से दूर नहीं कर पा रहा  है । कहने को  तो देश प्रगतिशील हो रहा है । स्त्री के अधिकारों की ,उसके सम्मान आदि की भी ख़ूब बातें की जा रही हैं । लेकिन क्या इनमे कुछ सच्चाई है ?शायद नहीं । आज भी समाज में अजीबो-ग़रीब परम्पराएँ ,और कुछ निषेध व्याप्त हैं । जिनके पीछे कोई तर्क ,कोई वैज्ञानिकता नहीं है । सबसे ज़्यादा विवाद और चिंता का विषय है आधुनिक और सुलझे हुए विचारों के माने जाने लोगों द्वारा भी रजस्वला स्त्री के प्रति वही दक़ियानूसी ,अवैज्ञानिक सोच । उनका ये मानना कि इन दिनों स्त्री अपवित्र होती है । उसे घर का खाना  नहीं बनाना चाहिए ,अचार को हाथ नहीं लगाना चाहिए,पूजा नहीं करनी चाहिए आदि -आदि । आखिर इन मान्यताओं के पीछे क्या कोई सटीक तर्क है ,नहीं । सब निरर्थक है । ये एक 'नेचुरल फिनोमिना है '। इसमें अशुद्ध जैसा ,या गंदगी जैसी कोई चीज़ नहीं है । ये स्त्री की सम्पू...

ग़ज़ल( दस्तक भी ना दी आने से पहले...)

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दस्तक भी ना दी आने से पहले आए तुम चुपचाप सनम पहले तो नहीं थे ऐसे सनम तुम ये कैसा दीवानापन । १.रातों को मेरी याद का मौसम क्या तुमको तड़पाता है ,या  चंचल सा तेरा मन वो मेरी धड़कन को सुन जाता है फिर क्यों  ऐसा  हाल तुम्हारा ,कैसा ये परवानापन दस्तक भी ना दी ------------------------ २ मैंने सुना है मेरी ख़ातिर तू सबको ठुकराता है, पाने को मेरे प्यार का साया तू आँसू पी जाता है मुझसे कभी तू कहता नहीं कुछ ,ये कैसा अनजानापन दस्तक भी ना ----------------------------- ३ मेंरी दुआ है तेरी मोहब्बत मुझको और मेरी तुझको मिल जाए हर अरमां तेरा-मेरा अब तो पूरा हो जाए ,क्योंकि तेरी चाहत बिना मुश्किल जीना है हमदम । दस्तक भी ---------------------------- -१९९४ (गीत )

जाती रही ज़हानत

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  जाती रही ज़हानत खतायें करते -करते  वो हो गये हैं आदी, सज़ाए भरते -भरते ।  है अय्यारी ही अब तो अदा में ,हर करम में  मुंसिफ़ी में उनकी आस्था कहाँ है  गुज़र रही है उम्र उनकी ,धर्म छलते-छलते ।  ग़ायब है शफ़क़त दिल से, ज़हन से  ये ख़यानत का असर है ,बेनूर हो गए हैं  ख़ुश- शक्ल बनते -बनते ।  पकड़ के हाथ हमसफ़र का ,छोड़ गए बीच राह  बदनियत हो गए हैं आवारगी करते -करते ।  वो नादान हमसफ़र उसका ,खा कर भी धोख़ा उससे  नहीं बाज़ आ रहा है वफ़ा करते -करते । 

'कोई दर्द '

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लब पर फ़ीकी हँसी सहेजे, एक धोख़े में जीता है बाहर से ख़ुश दिखता हो पर, भीतर एकदम रीता है । कितने रिश्ते दिल से जाने ,कितने मजबूरी में ढोता है कोई दर्द तो साथ है उसके ,चुपके -चुपके रोता है । प्यार बनाया मज़बूरी को ,या मज़बूरी से प्यार किया हालातों की मार थी ऐसी ,ज़ज़्बातों से हार गया । दिल में ज़ख्म छुपाकर जाने, किस धागे से सीता है राज नहीं खुलता कोई दिल का ,पत्थर बन कर जीता है । । -अंशु चौहान

'कठपुतली मत बनो'

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हर मनुष्य एक कठपुतली की तरह है जब तक स्वविवेक से वह काम नहीं लेता. उसका मष्तिक उसके ख़ुद के द्वारा इतना संचालित नहीं होता जितना कि दूसरों से होता है।आप सोच रहे होंगे कैसे ? तो देखिए-आपने किसी बन्दे की तारीफ़ की बन्दा ख़ुश हो गया।ख़ुशी से नाचने लगा । कृतज्ञ हो गया। अगले ही पल आपको उसकी कोई बात या कोई हरक़त पसंद नहीं आई तो आपने उसकी आलोचना कर दी । वही बंदा आपको भली-बुरी सुनाने लग जाता है। उसकी त्यौरियाँ चढ़ जाती हैं ।   आप किसी को घूर के देखोगे वो गुस्से से आग-बबूला हो जाएगा । बड़ -बड़ शुरू कर देगा।आप किसी को प्यार से  देखोगे वो आपका मित्र हो जाएगा । आपको पसंद करने लगेगा ।अगला कोई वजह नहीं बताएगा क्रोध की,अपनत्व की आप उसकी भाव -भंगिमाओं से उसकी प्रतिक्रियाओं से संचालित होते रहोगे और आपको पता भी नहीं चलेगा कि  कब आप अगले के हाथों कुठपुतली बन गए इसलिए कठपुतली बनना छोड़िए और अपनी बुद्धि ,अपने विवेक से अपने दिमाग को स्व नियंत्रण में रखिए।  अपने को पहले तो स्वच्छ मन का बनाइए ताकि आपके प्रति किसी का नकारात्मक रवैया भी हो तो आप उससे प्रभावित नहीं हों क्योंकि हमे दूसरा तभी नचा पाएगा जब...

'जिस दिन 'बाई 'नहीं आती '

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मन व्याकुल सा रहता  है, रात को नींद नहीं आती दुश्वारी में दिन जाता है, जिस दिन बाई नहीं आती । पड़े सिंक में बर्तन भी, मुझको मुँह चिढ़ाते हैं छोटे-बड़े ये भाँति -भाँति के, उस दिन मुझे नहीं भाते हैं । चम्मच ,करछी ,तवा ,कढ़ाई बड़ा शोर मचाते हैं मन की खीझ कहाँ छुपती है बस कूँचा घिसते जाते हैं  घनत्व झाड़ू का कम लगता है ,पोछे की बारी नहीं आती  घर बहुत बड़ा लगता है जिस दिन बाई नहीं आती।  मन की खीझ कहाँ छुपती है ,बस कूचा घिसते जाते हैं । घनत्व झाड़ू का कम लगता है ,पोछे की बारी नहीं आती घर बहुत बड़ा लगता है ,जिस दिन बाई नहीं आती । । 
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नारी सौन्दर्य को चार -चाँद लगाने में गहने अपना विशेष महत्व रखते हैं । प्राचीन काल में ये गहने फूलों ,पत्तियों आदी से निर्मित होते थे । आज स्वर्ण ,रजत ,हीरे आदी से निर्मित गहने प्रचलन में हैं । ये सब सभ्यता ,संस्कृति और आवश्यकता के विकास से संभव हुआ है । इस विकास ने हमे ये आभूषण तो प्रदान किए मगर हमारी सुरक्षा इनके साथ ही ख़तरे में आ गई है । इन आभूषणों को धारण करके बेखौफ़ कैसे जिया जाए इसका कोई उत्तर नहीं है । ये आपके ख़ुद के हाथ में है कि आप इनको पहन कर कहीं भी जाते हुए अपनी सुरक्षा कैसे करते हो । गहनों के साथ -साथ ख़ुद की असुरक्षा के भय से ही आज हर महिला इन गहनों का नाम मात्र ही उपयोग कर पा  रही है । नारी के श्रृंगार और  वैवाहिक जीवन के लिए सबसे ज़रूरी माना जाने वाला गहना 'मंगल सूत्र 'आज स्त्री के गले से दूर होता जा रहा है ।  सोने की चेन आदि पहनने से पहले भी उसे हज़ार बार सोचना पड़ता है क्योंकि अपनी ज़िन्दगी को  ख़तरे में डालने से हर कोई डरता है । चेन स्नैचिंग की घटना को अंज़ाम देने वाले इन अपराधियों के डर से आज हर महिला गले में सिंपल सा धागा या...

'अम्मा'

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'अम्मा 'मेरे लिए ये एक  ऐसा शब्द है जो अथाह प्रेम,ममता और त्याग की परिभाषा अभिव्यक्त करता है।इस शब्द को अधिकतर लोग 'दादी 'के लिए प्रयुक्त करते हैं लेकिन मैं ये मेरी' नानी' के लिए करती थी।वो इतनी ममतामयी थीं कि उनकी गोद में सिर रखते ही मेरी तबियत ठीक हो जाया करती थी।बच्चों का बचा -कुचा खाने में शायद उन्हें ज़्यादा ही सुकून मिलता था इसलिए अक्सर हमारे खाना खाने के बाद बचे हुए खाने में ही कुछ और खाना मिक्स करके खाना पसंद करती थीं।दयालु और सेवाभावी इतनी कि गाँव में किसी की भी तबियत ख़राब होने की ख़बर सुनते ही सब काम छोड़ कर उसके पास पहुँच  जाया करती थीं।उसकी हर संभव मदद किया  करती थी।किसी के चोट लगने पर उसके घाव ख़ुद धोती थीं,मरहम-पट्टी करती थी।बेटा-बेटी दोनों ही उनकी नज़रों में समान थे।पुराने ख़यालातों की होते हुए भी उन्होंने बेटियों पर अपनी भरपूर ममता लुटाई।उन्हें उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित किया । उनकी परवरिश में कभी कोई कमी नहीं आने दी.दिनभर घर के सारे काम करने के बाद थकान को भूलकर वो हमे रात को मुनक्का का दूध पिलाना कभी नहीं भूलती थीं ।यूँ तो हमारे  नाना जी भी...

फालतू शब्द

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कुछ ऐसे शब्द जो प्रचलन में हैं लेकिन उल्टे अर्थ के साथ । दो शब्दों के बारे में बात करुँगी । ये हैं बिनाफ़ालतू और बेतुक़ी बात । फालतू का मतलब है अनावश्यक ,व्यर्थ । इस हिसाब से बिना फालतू का मतलब हुआ -आवश्यक ,उपयोगी । अब एक वाक्य में देखिये -पापा आप मुझे बिना फ़ालतू में ही डाट रहे हो (गुस्से में )।  बच्चा अप्रत्यक्ष रूप से कह रहा है कि आप मुझे सही डाट रहे हो ।इसका मतलब हुआ पापा सही डाट रहे हैं । फिर बच्चे को शिकायत या गुस्सा करने की ज़रूरत ही नहीं है ।  दूसरा  है -बेतुक़ी बात । मतलब- बिना लय की बात।  भाई बातों से तुक का क्या लेना देना । बातें तो सही ,ग़लत या अर्थहीन और अर्थयुक्त हो सकती हैं । कोई तुक वाली या लय वाली बात भी करता है भला । 
मेरी चाहतों का बसेरा हो जिसमे, मै ऐसा कोई एक  मकां चाहती हूँ सवेरा हो जिसमें मेरी ख़्वाहिशों का, मैं ऐसा खुला आसमां चाहती हूँ

'कंप्यूटर पर टाइपिंग और' टेनिस एल्बो' के बाद से मेरी लिखावट '

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  कंप्यूटर पर टाइपिंग और' टेनिस एल्बो' के बाद से मेरी लिखावट का जो हाल हुआ है बता नहीं सकती ।  इसके साथ ही लिखते वक़्त मुझमें धैर्य की कमी।  मैं बस शुरुआती पंक्ति के अंतिम छोर तक जल्द से जल्द पहुँचना चाहती हूँ । और इतना सा इंतजार भी मुझसे नहीं होता । आज  तो हद ही हो गई ।जैसे  ही  कुछ लिखना शुरू किया तो देखा कि मैंने 'ल 'को पेड़ की ऐसी शाखा पर लटका दिया है जो टूटने के कग़ार पर है,और वो मुझसे कह रहा है -मुझे बचा लो '। 'मैं ' का हाल ऐसा था जैसे किसी बहुत संकरी गली में फ़स गया हो  और निकलना मुश्किल है । 'क' बेमतलब  सीना फुलाकर, ठहाके लगाकर हँस रहा था । 'च ' मैराथन में भाग लेने को  तैयार था । सारे शब्द मानो 'बौरा 'गए थे और मैं उन्हें समझने की कोशिश कर रही थी कि कुछ नहीं होगा । सब सुरक्षित हो । बस यूँही सब अपनी -अपनी जगह पर बने रहो । ये सब इस नासमझ पेन की ख़ता है जो  अब मेरी उँगलियों में ठीक से नहीं टिकता वरना कंप्यूटर पर तो तुम्हारा पूरा ख़याल रखती हूँ । ☺☺
माथे की तनी लकीरों से, उसके 'तंस 'नज़र आ जाते हैं दिल ,जुबां से लेकिन फिर भी, इनका असर छुपाते हैं उसके मन में मेरी ख़ातिर, कितने शिक़वे रह जाते हैं मुझसे मिलते हैं जब भी, कुछ कहते -कहते रह जाते हैं ख़त्म सिलसिला अभी नहीं ये, जाने क्या-क्या बाक़ी है भूला  सा लगता है यहाँ पर, शब्द कोई जो 'माफ़ी 'है । ।

गूगल गुरु

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जब भी मन में थी कोई उलझन ,गूगल ने सुलझाई सब प्रश्नों का उत्तर तुमको यहीं मिलेगा भाई । गूगल है भंडार ज्ञान का यहाँ हर संशय मिट जाए अदृश्य गुरु ये हर पहेली ,देते झट सुझाए । मौखिक कहो या लिखो समस्या ,सुनते सभी तरह भाई सर्च मार्ग में यहाँ कभी ना, कोई बाधा आई । ना अटके जीके  में, ना रहा अधूरा होम वर्क़ भाई गूगल ने आसानी से सब ,ज्ञान -सामग्री जुटाई गूगल गुरु के चरणों में चलो शीश नवाएं भाई । ।                                                                                                                             -अंशु चौहान

"उसका जादू "

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मासूम सी उछल -कूद ,नन्ही निश्छल- ऑंखें और उस पर उसका नन्हा सा आकार!इन सब चीज़ों ने मुझे अनायास ही अपनी और आकर्षित किया । यह एक नन्हा सा पिल्ला था ,जो मुझे लोगों की भीड़ से अलग एक अपनेपन का अहसास दे रहा था  । मैं इसकी बचकानी हरक़तों से बड़ा ही सुकून पा रही थी । मैं उसे देखकर सोचती रही काश लोग भी ऐसे ही निश्छल होते। माना के  ये पशु विवेक शून्य होते हैं लेकिन इनका छल रहित ,भोला चेहरा  इंसान से ज़्यादा आकर्षक होता है । उसकी बचकानी हरक़तें ,नन्ही सी नाक ,टिमटिमाती आँखें और बेवज़ह से अचानक उछल पड़ना मुझे पागल सा बना रहे थे । उसकी इन हरक़तों से मन चाहा कि मैं उसे दबोच लूँ !लेकिन फ़िर  याद आया अरे नहीं इसमें रिस्क है । मैं उसे एक खिड़की से निहार रही थी और वो मेरी इन मानसिक उद्दंडताओं से अनभिज्ञ था । फिर अचानक वो न जाने कहाँ ग़ायब हो गया ।  मैंने भी  बाद में विचार किया कि मैं भी कितनी मूर्ख थी !गली के एक पिल्ले पर इस क़दर मोहित हो गयी थी । उसको गोद में लेने की सोच रही थी । वह नहाया हुआ और पालतू भी तो नहीं था । गंदगी ,कीटाणु... आदि के ख़याल.....बीमार ...

लिव- इन- रिलेशनशिप एक बीमारी

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हाल ही में  लिव- इन- रिलेशनशिप कानून की विसंगतियों पर कुछ सवाल उठे  हैं ।मुझे तो अफ़सोस है कि इस तरह के विषय को कानूनी मान्यता मिली ही क्यों ?   मेरी दृष्टि में तो ये विषय पूरी तरह नैतिकता और भारतीय संस्कृति की प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ है । इस विषय  को कानून से नहीं बल्कि संस्कारों और मानवीय मूल्यों से प्रतिबंधित किये जाने की ज़रुरत थी । भारतीय संस्कृति में जहाँ' विवाह ' को एक पवित्र संस्कार माना गया है । वहाँ इस तरह के अमर्यादित और संस्कार रहित व्यवहार को कानूनी संरक्षण प्रदान करना'' विवाह' संस्कार की प्रासंगिकता को खत्म कर देता है । जब आप बिना विवाह के साथ रहने की अनुमति दे रहे हो तो यहाँ' विवाह 'का औचित्य ही क्या है । फिर विवाह के नाम पर अनावश्यक खर्चे और दिखावा करने की क्या ज़रूरत है । संतान तो बिना विवाह के भी पैदा हो सकती है और जब इन संबंधों को ही मान्यता मिल  गई है तो संतान भी कहाँ अवैध कहलायी जाएगी । लेकिन क्या ये ईश्वर की नज़रों में या नैतिक मापदंडों पर सही कदम है । मेरी नज़रों में तो बिलकुल नहीं । अब इस तरह के संबंधों से उत्पन्न संतान व इस...

'सड़क सुरक्षा सप्ताह '

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'सड़क सुरक्षा सप्ताह 'ने आज फिर मेरा ध्यान सड़कों पर वाहन चलाते वक़्त लोगों द्वारा  की जाने वाली लापरवाही पर केंद्रित किया । अधिकतर लोगों के वाहन की रफ़्तार बहुत तेज होती है । लोग हैलमेट'को शायद सिर की जगह कंधे पर रखना  ज़्यादा  पसंद करते हैं ।  सबसे ज़्यादा हद तो किशोर व युवाओं ने कर दी है । सड़क पर दोनों हाथ छोड़ कर बाइक चलाना ,बाइक से फ़ालतू स्टंट दिखाना ,तेज़ स्पीड रखना तो जैसे इनके लिए अपरिहार्य(जिसे टाला न जा सके ) कर्म है । न जाने इनके दिमाग़ में ये चीज़ें कौन डाल देता है कि किशोर या युवा होने पर ऐसा करने से लोग इम्प्रेस होते हैं । सच्चाई तो ये है कि ऐसा करके ये अपनी जिन्दगी तो ख़तरे में डालते ही हैं सभ्य लोगों की नज़रो से भी गिर जाते हैं ।  जरा सोचिए कि कौन  से  माँ -बाप अपनी संतान को दुर्घटना ग्रस्त स्थिति में देख कर खुश होंगे । या कौन से माँ -बाप चाहेंगे कि उनके बच्चे के द्वारा कोई दुर्घटना ग्रस्त हो जाए और पुलिस की गिरफ़्त में आ जाए । सभी माँ -बाप अपने बच्चे के शुभ- चिंतक होते हैं तो इस मामले में क्यों अपना फ़र्ज भूल जाते हैं ।  जब ...

'ग़लत सोच'

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कभी भी किसी इंसान के बारें में अपनी धारणाएं मत बनाइए।  जब तक की आप उसे ठीक से जान नहीं लेते हैं ,अपना मत न रखें ।अमुक व्यक्ति अच्छा है ,बुरा है वो ऐसा करता है ,वैसा करता है आदि  क्योंकि कई बार हम किसी इंसान को इतना ग़लत समझ बैठते हैं कि हमें अपनी सोच पर  ख़ुद पश्चाताप होता है । अतः इस पछतावे से बचने के लिए जरुरी है कि हम ये गलती ही न करें ।  किसी भी व्यक्ति को समझने के लिए हमे उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व का,उसकी मानसिक स्थिति का सही आँकलन करना जरुरी होता है लेकिन हम क्या करते हैं कि उसकी किसी एक बात से या उसके बारे में सुनी गई किसी बात से ही उसका सम्पूर्ण विश्लेषण करने की कोशिश करते हैं।जो एकदम ग़लत है।हम किसी के बारे में किसी के द्वारा कही गई बातों से कैसे सत्य का पता लगा सकते हैं, जबकि ये संभव है कि वह व्यक्ति उस व्यक्ति के प्रति निष्पक्ष न हो।वह व्यक्ति उसके प्रति दुर्भावना से ग्रसित भी हो सकता है या उसके प्रति पक्षपाती भी हो सकता है ।  हम किसी के बारे में अच्छी या बुरी राय अक्सर किसी तीसरे से सुनकर ही बनाते हैं।हर इंसान में कुछ ना कुछ बुराई व अच्छाई ज़रूर...

'आलोचना '

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आलोचना सफलता के लिए उतनी ही जरूरी है, जितनी पौधे के लिए खाद । इसलिए इसकी आदत डाल लीजिए । इससे घबराने की नहीं बल्कि इससे ऊर्जा पाने की और अपनी गलती सुधारने की कोशिश कीजिए । आप ये जान लीजिए कि आप जितने सफल होते जाएँगे आपके आलोचक उतने ही बढ़ते जाएँगे । क्योंकि ईर्ष्या उसी से होती है जिसमे हमें कुछ दमदार दिखता है । हम जिसके सामने कहीं न कहीँ ख़ुद को छोटा मानने लगते हैं ।  आलोचक भी दो तरह के होते हैं -एक वो जो अनावश्यक त्रुटि निकालने में विश्वास करते हैं और तुम्हारा मनोबल गिराना चाहते हैं । एक वो जो तुम्हे और मंझा हुआ और ज़्यादा  कुशल देखना चाहते हैं । किस तरह के आलोचक ज़्यादा अच्छे होते हैं ये आप ख़ुद समझ सकते हैं । लेकिन प्रथम तरह के आलोचकों से भी हम खुद को और अधिक दृढ और स्वयं को भीतर से मज़बूत बनाने का सबक सीख सकते हैं ।  इन अर्थों में हमे अपनी सफलता के लिए आलोचकों की बहुत ज़रूरत होती है । इसलिए आपके आस-पास यदि आलोचकों की भरमार है  तो खुश हो जाइये । उनका स्वागत कीजिए और स्वं को सफल होने के लिए तैयार करते रहिए ।