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'स्वरचित कुछ शेर'

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मेरे कुछ शेर- सब फूलों में एक सी ख़ुशबू  नहीं मिलती  कुछ खास बात है आपमें जो औरों में नहीं मिलती ||  मलबूस ओढ़ा करे इंसानियत का तो क्या  नियत तेरे जैसी साफ़ -सुथरी इस जहाँ की नहीं  तेरी वफ़ा ,तेरे प्यार की क़ायल  हूँ मै  सनकी लोग हमे कहें कोई परवाह नही ||  * गुलशन ए  मोहब्बत वीरां  था अब तक  ए  मसीहा मेरे तुम गुल बनके महके हो ||  * इस जहाँ में तू उस जहाँ में ख़ुदा  है  दोनों की इवादत से मिली है मोहब्बत  कब लगा है तू और ख़ुदा जुदा हैं ||  * सँभाल के रखती हूँ दिल में तेरी हर बेपरवाही को बेवजहा ही तुम मुझे 'लापरवाह 'नाम देते हो .|  * उससे मेरा मिजाज़ अलग था ना मेरी उससे, ना उसकी मुझसे बनी बातें जब भी हुई बस अनबनी,अनबनी सी हुई .|  * क्यों बोए रखते हो दिलों में नफरत के बीज अच्छी फसल में क्या खरपतवार अच्छी लगती है | * वो जो तेरी वफ़ा पर हज़ार पहरेदारियाँ रखता है , टूट कर चाहने की एक अदा ही तो है .|  * ना कर इतनी मोह...

'गणित तुम भूत से '

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तुमसे जितना दूर मै भागी  उतना ही तुम पीछे आए  बचपन पर तुमने मेरे  कैसे -कैसे प्रतिबन्ध लगाए  जीना इतना किया है दूभर    बिन तेरे ना कोई काम सध पाए  क़दम -क़दम पर देता दस्तक  पीछा कोई कैसे छुड़ाए  विद्यालय में तुझसे जूझे  ट्यूशन में फिर से मिल जाए  एक मिनिट को चैन ना पाते  मौज़ -मस्ती पर रोक लगाए  परीक्षा में दिल की धड़कन को  बेरहमी से तू ही बढ़ाए  कपड़ों का  बाज़ार या सब्ज़ी -मण्डी  कहाँ -कहाँ तुझसे नज़र बचाएँ  भूत-प्रेत सा मुझे लगे ये  जितना देखूँ जी घबराए  है क्या कोई पंडित ,ओझा  डर गणित का  जो दूर भगाए |  -अंशु चौहान