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सितंबर, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

काश

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कृष्ण युग की मैं भी कोई ,काश गोपिका होती धो -धो चरण अपने प्रभु के ,भर -भर पानी पीती सुन्दर उपवन ,मेरे मन का कोना -कोना होता मोह -माया, न जग का कोई रोना- धोना होता छीन मुरलिया कभी मै उनकी ,स्व अधरों से बजाती मोहित हो उनकी छवि से मधुर - मधुर धुन गाती होती इच्छा पल में पूरी ,ना कुछ कहना ,सुनना होता मेरे मन से ,उनका ऐसा गहरा रिश्ता होता उन  आँखों में ही जगती, उन आँखों में सो जाती भूल के सारी दुनिया -दारी बस उनकी हो जाती ।।

सहमा बचपन

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कुछ नापाक निगाहें अब बचपन पर 'आरी' हैं हिफाज़त मासूम दिलों की सबकी ज़िम्मेदारी है  दादी -नानी की परियों की कहानी अब ना इन्हें सुनानी हैं  झाँसी -रानी की वीर- गाथा अब इनको गुनगुनानी  है  खेल -खिलौने  नहीं अब कुंफू -कराटे की बारी है मासूमियत ख़तरे में है सतर्कता निभानी है निर्मम,निरंकुश ,बेख़ौफ़ दरिंदों से नेकी बचानी है ख़ौफ़  नहीं बस  अब हिम्मत दिखानी है। लुट रही हैं ज़िंदगियाँ निर्दोष भोली-भाली होठों पे बचपन के मुस्कान वापस लानी है। -अंशु चौहान

हिंदी के प्रति मेरा लगाव

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हिंदी भाषा के प्रति मै विशेष लगाव रखती हूँ-  पहला कारण तो ये कि देव भूमि उत्तराखंड से सम्बंध रखती हूँ । यहाँ सभी की हिंदी भाषा कुछ ज़्यादा ही अच्छी होती है इसलिए बचपन में घर के हर सदस्य का शुद्ध हिंदी में  वार्तालाप करना इसके लिए विशेष उत्तरदायी रहा है.  दूसरा कारण रहा हिंदी साहित्य में ग्रेजुएट होना। पोस्ट  ग्रेजुएशन में हालाँकि राजनीति विज्ञानं ने इसकी जगह ले ली थी फिर भी इस समय अंतराल में इस विषय ने मुझ पर  गहरा प्रभाव डाला। मेरे लेखन की शुरुआत इसी दौरान हुई।  हिंदी साहित्य के हर कवि और कवयित्री से  मै  बहुत  प्रभावित रही हूँ। उसी साहित्य का प्रभाव मेरी  भाषा में दिखाई देता है। मै इस भाषा की इतनी अभ्यस्त हो चुकी हूँ  कि  मै चाह कर भी सरल शब्द नहीं ढूँढ पाती और अनायास ही कुछ क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग अपनी भाषा में कर  बैठती हूँ।   मेरी क्लिष्ट भाषा पर अक्सर लोग स्तब्ध रह जाते हैं या प्रश्न खड़े कर देते हैं।कुछ मुस्कुराते हैं तो कुछ समझ नआने  पर परेशान हो जाते हैं। लेकिन मै अपने...

शिक्षक दिवस

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सभी आदरणीय शिक्षकों को शिक्षक दिवस की हार्दिक बधाई! आज शिक्षक दिवस के अवसर पर मस्तिष्क में  एक मंथन  सा चल रहा है। दो तरह के शिक्षक मुझे आज याद आ रहे हैं एक वो जो अपने हर शिष्य के उज्ज्वल भविष्य की कामना रखते हुए उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते  हैं । जो अपने कमज़ोर छात्र की  भी अन्य क्षमताओं को पहचान कर उसे  आगे  लाने  के लिए प्रयासरत रहते  हैं न कि  उसे डाट -पीट कर,उसकी उपेक्षा कर उसका मनोबल कमज़ोर करते  हैं. और जो  अयोग्य छात्र को भी योग्य बनाने की ताकत रखते  हैं ।  दूसरे  वो जिनका व्यक्तित्व अख़बारों के माध्यम से  सामने आता है कि अमुक अध्यापक ने प्रश्न का उत्तर न दिए जाने पर अपने छात्र को इतनी बुरी तरह पीटा कि छात्र बेहोश ही हो गया। ऐसे ही अन्य कई जो इस  तरह की  छोटी -छोटी बातों पर असहनीय दंड प्रदान करते हैं। अब शिक्षक तो दोनों ही हैं?लेकिन सच्चे अर्थों में शिक्षक दिवस का औचित्य किनके सन्दर्भ में है ये सर्वविदित है ही। एक योग्य शिक्षक में इतनी ताक़त होती है क...

'वो मजदूर है'

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मेहनत कर जो ख़ुश रहे, वो मजदूर है चटनी-रोटी से जो तृप्त रहे,वो मजदूर है थकान में जिसको राहत, वो  मजदूर है 'धरा' जिसका बिछौना,वो  मजदूर है कर्म से ही जिसको प्यार, वो मजदूर है दूर जिससे आलस्य, वो मजदूर है न होड़ अमीरी से जिसे,वो मजदूर है मज़बूत जिसका हौसला ,वो मजदूर है धूप और ताप से जो बेअसर, वो मजदूर है है तृष्णाओं से जो दूर ,वो मज़दूर है। तेरे  हर विश्राम में जो, वो मज़दूर है -अंशु चौहान

लो आज़ाद किया तुमको

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लो आज़ाद किया अब  तुमको अब ख़ुशबू बन बिखरो इन फ़िज़ाओं में मुझ में सिमट कर घुट जाओगे क्या रक्खा है इन सीमाओं में यहाँ तुम्हारे रूप-रंग की चर्चा नहीं करने वाला उस गुलशन की शान बनो तुम क्या रक्खा है फ़िज़ूल अदाओं में रख सकता हूँ अहसास तेरा तो उस दूरी से भी मै हरपल मुक्त करो ख़ुद को अब तो क्या रक्खा है इन सज़ाओं में बस गई है सुगंध यूँ तो तेरी हर शय में, हर पैमाने में जाने दो रुख़सत करता हूँ क्या रक्खा है इन सदाओं में।