अपूर्वः कोपि कोषोयं विद्यते तव भारति,व्ययतो वृद्धिमायाति,क्षयमायाति संचयात। इस श्लोक में कहा गया है कि विद्द्या रुपी ये जो ज्ञान का कोष है ये बड़ा अद्भुत है, इसे जितना ख़र्च किया जाता है उतना ही बढ़ता है।अर्थात विद्द्या (ज्ञान) जितना बाँटा जाए उतना ही इनका फायदा रहता है,बांटने वाले को भी और ग्रहण करने वाले को भी।बस इसमें सावधानी ये बरतनी होती है कि ये सही व तथ्य पर आधारित होना चाहिए क्योंकि किसी भी चीज़ का ग़लत ज्ञान,अर्थ का अनर्थ कर देता है।कई बार किसी बात,किसी कहावत,किसी दोहा,किसी चौपाई का सही अर्थ नहीं लगाया जाता है और कुछ तर्कों को हम अपनी सुविधानुसार अपने हिसाब से,अपने हित में परिवर्तित भी कर लेते हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं जैसे - रामचरितमानस की इस चौपाई को ही ले लीजिए - ''प्रभु भल कीन्ह,मोहि सिख दीन्हीं, मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही, ढोल,गवार ,शूद्र ,पशु , नारी सकल ताड़ना के अधिकारी''। उपर्युक्त चौपाई का अर्थ अधिकतर ग़लत ही समझा जाता है।यही कारण है कि इस चौपाई को लेकर नारी जाति में विरोधी भावना उपजी हुई...