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योगी

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धर्म हित एक 'योगी' स्व-अवस्था बदल सकता है अस्त-व्यस्त हो जो,व्यवस्था बदल सकता है  प्रचारित हो ग़लत,वो असत्य बदल सकता है मौन हो जहां धर्म,आक्रोश उगल सकता है   कौन कहता है योगी का कर्म सिर्फ 'योग' है                      परमार्थ हित एक योगी,सत्ता बदल सकता है.   -अंशु चौहान        

घातक है अधूरा ज्ञान

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अपूर्वः कोपि कोषोयं विद्यते  तव भारति,व्ययतो वृद्धिमायाति,क्षयमायाति संचयात।  इस श्लोक में कहा गया है कि विद्द्या रुपी ये जो ज्ञान का कोष है ये बड़ा अद्भुत है, इसे जितना ख़र्च किया जाता है  उतना ही बढ़ता है।अर्थात विद्द्या (ज्ञान) जितना बाँटा जाए उतना ही इनका फायदा रहता है,बांटने  वाले को भी और ग्रहण करने वाले को भी।बस इसमें सावधानी ये बरतनी होती है कि ये सही व तथ्य पर  आधारित होना चाहिए क्योंकि किसी भी चीज़ का  ग़लत ज्ञान,अर्थ का अनर्थ कर देता है।कई बार किसी बात,किसी  कहावत,किसी दोहा,किसी चौपाई का सही अर्थ नहीं लगाया जाता है और कुछ तर्कों को हम अपनी सुविधानुसार  अपने हिसाब से,अपने हित  में परिवर्तित भी कर लेते हैं।  ऐसे कई उदाहरण हैं जैसे - रामचरितमानस की इस चौपाई को ही ले लीजिए - ''प्रभु  भल कीन्ह,मोहि सिख दीन्हीं, मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही, ढोल,गवार ,शूद्र ,पशु , नारी सकल ताड़ना के अधिकारी''। उपर्युक्त चौपाई का अर्थ अधिकतर ग़लत ही समझा जाता है।यही कारण है कि इस चौपाई को लेकर नारी जाति में  विरोधी भावना उपजी हुई...

फ़िल्म निर्देशन और नैतिक दायित्व

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आधुनिक युग में मनोरंजन के बहुत से साधन उपलब्ध हैं। इसमें फ़िल्मे,वीडियो गेम्स ,मोबाइल गेम्स,आदि विशेष   भूमिका रखते हैं. फिल्मों का तो समाज के हर आयु-वर्ग पर बहुत  ज़्यादा  प्रभाव पड़ता है। फिल्म की कहानी, उसके गाने,उसके संवाद आदि  सभी  के मन मस्तिष्क पर इतना गहरा प्रभाव डालते हैं कि   बालक  और युवा वर्ग तो अपने  यथार्थ जीवन में कभी-कभी उसी के अनुरूप आचरण  भी करने लगते हैं।  फ़िल्मों  के फूहड़ गाने अक्सर किशोर और युवाओं की जुबां पर चढ़ जाते हैं.अक्सर वो इन्हे गुनगुनाते हुए मिल जाएँगे। ऐसे ही फिल्मों में प्रयुक्त गालियाँ  भी अधिकतर लोग अपना लेते हैं। फिल्म की कहानी  का असर दर्शकों के दिलों - दिमाग पर जो होता है,उसका पता भी  हॉल में दर्शकों की विविध  प्रतिक्रियाओं से हो जाता है. आक्रोश वाली फिल्म से सबका आक्रोश में आकर आक्रामक प्रतिक्रिया देना,भावुक सीन देखकर आंसू बहा देना आदि...| इसलिए  एक फिल्म निर्माता की समाज के प्रति ये बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है कि वह सही...

शत्रुता

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'शत्रुता' एक ऐसा भाव है जो यदि किसी के प्रति दिल में पनप जाए तो उससे कहीं ज़्यादा स्वं के लिए घातक  हो जाता है.ये ऐसा ज़हरीला भाव है जो सोचने समझने की क्षमता तक नष्ट कर देता है। विवेक हनन कर लेता है और सर पर बदला लेने का, खून सवार कर देता है। ये व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर बहुत ही प्रतिकूल प्रभाव डालता है. इस भाव की उत्पत्ति होती है इन छोटे-छोटे भावों से जैसे-द्वेष,ईर्ष्या,असंतोष,तिरस्कार,असहिष्णुता,अपेक्षा,उपेक्षा  आदि। इस  भाव से सबसे ज़्यादा हानि खुद ही की होती है,फिर भी क्षमाशीलताऔर क्रोध पर नियंत्रण की कमी के कारण  हम इसके दुष्परिणाम झेलने के लिए भी तैयार हो जाते हैं और इसके सामने आत्मसमर्पण कर देते हैं. इस भावना के वशीभूत इंसान अपने शत्रु का या तो शारीरिक या मानसिक रूप से बुरा करने पर उतारू हो जाता  है।  कई बार ये भाव किसी ग़लतफ़हमी से भी उत्पन्न हो जाता है जिसका व्यर्थ ही ख़ामियाज़ा उस निर्दोष को भुगतना  पड़ता है जो इस भाव का  बेवजह शिकार हो जाता है।  शत्रुता की वजह कुछ भी हो इसे दिल में जि...