कुछ हठ ही कर ली है दिल ने, मेरी नही सुनता रोज़ मिन्नतें करती हूँ ,कम्बख़्त नाक़ाम कर देता है ।
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ज़लज़लों के शहर
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लेखक:
Anshu chauhan
ये ज़लज़लों के शहर हो गए आशियानों पर इनके क़ुदरत के क़हर हो गए मायूसियाँ सी पसरी हैं चेहरों पर महज़ घर ख़ाली हैं और सड़कों पर बसर हो गए तोड़ते हैं दम कहीं साहस ,अरमां ,अठखेलियां संवेदना पर विनाश के गहरे असर हो गए ये ज़लज़लों के शहर हो गए है भूख भी ,प्यास भी और अधूरी आस भी टूट कर ये सभी शोक में बिफ़र रो गए ये ज़लज़लों के शहर हो गए सर्द ,गर्म मौसम कोई छत इसी नभ तले दर्द से बेअसर इनके सबर हो गए ये ज़लज़लों के शहर हो गए
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लेखक:
Anshu chauhan
दिल्ली के दरियागंज इलाके में रविवार की रात बाइक से कार छू जाने की मामूली सी घटना ने जिस तरह भयावह रूप धारण, किया इससे स्पष्ट पता लगाया जा सकता है कि आज कल लोगों में सहनशीलता व मानवीयता की कितनी कमी हो चुकी है । एक भौतिक चीज़ क्या किसी इंसान के लिए इतनी महत्वपूर्ण हो सकती है कि वह उसके लिए किसी व्यक्ति की हत्या कर दे । कोई मानव इतना क्रूर कैसे हो सकता है कि गाड़ी में जरा सी खरोंच आने पर बदले की भावना में वह उस परिवार की समस्त ख़ुशियाँ ही छीनने पर आमादा हो जाये । इतना संकुचित दृष्टिकोण लेकर इंसानियत का अस्तित्व बरक़रार नहीं रखा जा सकता । कोई भी भौतिक चीज़ किसी इंसान के जीवन से अधिक मूल्यवान नहीं हो सकती । अपनी ख़ुशी के लिए किसी दूसरे की ख़ुशी मिटाना इंसानियत पर प्रश्नचिन्ह लगा देता है ।