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कुछ हठ ही कर ली है दिल ने, मेरी नही सुनता रोज़ मिन्नतें करती हूँ ,कम्बख़्त नाक़ाम कर देता है ।
एक दुआ ही रख दे ,दुश्मन के हक़ में नफ़रतें ही नहीं ,मोहब्बत भी लौटाएगा कभी । 
 जाते हुए लम्हे रोक लो कोई उन बर्बादियों को नेस्त -नाबूद होती उन आबादियों को समय के गर्त में खो जाऐंगे सुखद लम्हें जी लो बेपरवाह उन आज़ादियों को ।

ज़लज़लों के शहर

ये ज़लज़लों के शहर हो गए आशियानों पर इनके क़ुदरत के क़हर हो गए मायूसियाँ सी पसरी हैं चेहरों पर महज़ घर ख़ाली हैं और सड़कों पर बसर हो गए तोड़ते हैं दम कहीं साहस ,अरमां ,अठखेलियां संवेदना पर विनाश के गहरे असर हो गए ये ज़लज़लों के शहर हो गए है भूख भी ,प्यास भी और अधूरी आस भी टूट कर ये सभी  शोक में बिफ़र रो गए ये ज़लज़लों के शहर हो गए सर्द ,गर्म मौसम कोई छत इसी नभ तले दर्द से बेअसर इनके सबर हो गए ये ज़लज़लों के शहर हो गए
हालात के मारों पर मौसम का असर नहींहोता  ख़राब हो तो ख़बर नहीं होती, ख़ुशनुमा हो तो अहसास नहीं होता । 
हम बहुत ऊँचे इरादों की दुकान रखते हैं ,महँगाई  बहुत है इसलिए कम सामान रखते हैं उसूलों के पक्के हैं क्वालिटी पे चलते हैं ,क्वांटिटी के नाम पर समझौता नहीं करते हैं पैर जमीं पे हैं ,भरोसा आसमान पे रखते हैं छोटा ही सही लेकिन बेहतर मकान रखते हैं । -अंशु चौहान
'मै हूँ साथ तेरे ' तुम मुझे देखकर मुस्कुराते क्यों हो  वो दर्द इस दिल में छुपाते क्यों हो हो जाऐगी 'सहर 'भी  इस' गम ए शाम' की इन हालातों से तुम घबराते क्यों हो कभी जो अँधेरों  में लगे राह मुश्किल हूँ बनके उजाला  तेरे साथ हरदम तुम साये में मेरे लड़खड़ाते क्यों हो । -अंशु चौहान 
'महफ़िल की बातें ' हो वाणी कटु तो मौन अच्छा लगता है न हो शरारत  तो बचपन कहाँ लगता है ताव में आकर करते हैं जो भी  वादे वो गच्चा सा लगता है परत दर परत खुलता है राज़ यूं परांठा हो मानो कोई  लच्छा सा लगता है शिक़ायत में महफ़िल जमाना वो सबका हर शख़्स कानों  का कच्चा सा लगता है । -अंशु चौहान
तेरी पनाहों में हर सुबहा ,हर शाम भली लगती है तन्हा जब भी होती हूँ ए ख़ुदा ,तू होने नही देता ।
 वो दुश्मन है  मेरा या दोस्त समझूँ  उसको  ,हर महफ़िल में मेरा ही  ज़िक्र  किया करता है होंगी बहुत रंजिशें मुझसे उसकी लेकिन ,मेरे ही चर्चे पहले बेफ़िक्र किया करता है । 
चंद अहसान मुझ पे  करके ,वो खुद को खुदा समझते  हैं क्या करें  उन  बेपरवाहियों  का, जिनका आज भी असर है । 
मेरे भरोसे को इस तरहा संभाला उसने टूट कर कभी मुझको बिखरने न दिया । 
दिल्ली के दरियागंज इलाके में रविवार की रात बाइक से कार छू जाने  की मामूली सी घटना ने जिस तरह भयावह रूप धारण, किया इससे स्पष्ट पता लगाया जा सकता है कि आज कल लोगों में सहनशीलता व मानवीयता की कितनी कमी हो चुकी है । एक भौतिक  चीज़ क्या किसी इंसान के लिए इतनी महत्वपूर्ण  हो सकती है कि वह उसके लिए किसी व्यक्ति की हत्या कर दे । कोई मानव इतना क्रूर कैसे हो सकता है कि गाड़ी में  जरा सी खरोंच आने पर बदले की भावना में वह उस परिवार की समस्त ख़ुशियाँ  ही छीनने पर आमादा  हो जाये । इतना संकुचित दृष्टिकोण लेकर इंसानियत का अस्तित्व बरक़रार नहीं रखा जा सकता । कोई भी भौतिक चीज़ किसी इंसान के जीवन से अधिक मूल्यवान नहीं हो सकती । अपनी ख़ुशी के लिए किसी दूसरे की ख़ुशी मिटाना इंसानियत पर प्रश्नचिन्ह  लगा देता है ।   
बेशक़ीमती  हैं वो  रिश्ते जो ज़ज्बातों  की क़दर करते हैं वरना तो अब अपने भी हर मोड़ पर ग़ैरों की तरहा मिलते हैं ।