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लड्डू गोपाल

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कलयुग में 'भक्ति' ही इंसान के उद्धार का एकमात्र साधन है। विशुद्ध (निष्काम )भक्ति से ईश्वर को सहज ही पाया  जा सकता है। भक्ति के प्रकार भी अलग-अलग हो सकते  हैं और सबके ईष्ट भी अलग -अलग। कुछ शिव जी को  मानते हैं ,कुछ राम जी को ,कुछ माँ दुर्गा को, कुछ कृष्णा जी को और कुछ इन सभी को। कृष्ण का स्वरूप   चंचल,नटखट ,और सर्वाकर्षक होने के कारण अधिकतर भक्त गण  कृष्ण जी के प्रति आकर्षित हो जाते है. कृष्णा जी का बालरूप( लड्डू गोपाल )रूप आज कलयुग में लोगों को अत्यधिक आकर्षित कर रहा है। इसलिए  आजकल एक होड़ सी मच  गयी है लड्डू गोपाल जी को घर मे लाने की।  ईश्वर भक्ति किसी भी रूप में की जाये ग़लत नहीं है लेकिन भक्ति का सम्बन्ध आत्मा से है इसलिए इसमें दिखावा  नहीं होना चाहिए।कई लोग आजकल देखा -देखी से या इस भावना से लड्डू गोपाल जी को घर पर लाते हैं कि  उनको  लाने से उनकी सारी मनोकामनायें पूरी हो जाएंगी, तो ऐसी भावना से नहीं बल्कि सेवा करने की भावना से  लाएं। साथ ही उनको उठाकर यहाँ -वहाँ न ले जायें क्योंकि अगर आप बाल रूप में मान रहे हो तो एक छोटे...

'मौन'

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कहते हैं कि मौन में बड़ी ताकत होती है। प्रायः देखा गया है कि साधु-संत भी मौन रहना ही पसंद करते हैं। ये भी  कहा जाता है कि असंतुष्ट और अज्ञानी व्यक्ति को ज़्यादा बोलने की आदत होती है क्योंकि एक संतुष्ट और ज्ञानी  व्यक्ति के पास अधिकतर प्रश्नों के उत्तर होते हैं और हर चीज़ से संतुष्ट रहने के कारण उसे बोलने की ज़रूरत नहीं  पड़ती है।वह सीमित वार्तालाप ही करता है।  ये भी कहा जाता है कि मौन रहने के इतने फायदे हैं कि इसको अपनाकर तमाम विवादों  से बचा जा सकता है  लेकिन ये बात थोड़ी अज़ीब लग सकती है सामान्य व्यक्तियों के सन्दर्भ में,क्योंकि अगर किसी व्यक्ति का किसी से  झगड़ा हो जाये तो क्या उस स्थिति में किसी एक पक्ष के मौन धारण कर लेने पर झगड़ा शांत हो जाएगा या और  बढ़ेगा। क्योंकि क्रोध में पागल व्यक्ति की बात का उत्तर न दिया जाये तो वो इतना आक्रामक हो जाता है कि वो  आपका सिर भी फोड़ सकता है, आपकी मौनावस्था से क्षुब्ध होकर।तो उस स्थिति में आपका मौन आपकी ज़िंदगी  को ही सदैव के लिए मौन कर सकता है।  ठीक इसी तरह अगर कहीं अपराध या अन्याय हो रहा है और आप ये स...

ये चिड़ियाघर नहीं है भाई

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  मैंने एक बार घर में एक बिल्ली पाली थी। पाली क्या थी गले पड़ गई थी भाई साहब । बिल्ली ही नहीं उसका परिवार भी।   बिल्ली के २ बच्चे ,उसका पति सब  का नाश्ता पानी मेरे ही सर आ गया था। पशु-पक्षी के प्रति प्रेम भाव के  कारण हमने  ये पंगा  लिया था । ख़ैर जैसे -तैसे करके हमने २-३ महीने इस परिवार की सेवा की।  जैसे-तैसे इसलिए नहीं कि इन्हे खिलाने में असमर्थ थे बल्कि इसलिए कि किसी भी पक्षी या पशु को पालकर उसकी  स्वतंत्रता ,उसका स्वच्छंद  वातावरण नहीं छीनना चाहते थे । साथ ही इनकी कुछ वृत्तियाँ और हमारी कुछ  विवशताएँ  थीं जिनके रहते ये सब कर पाना मुश्किल था।अतः मेरी इच्छा की सुनवाई हुई और कुछ समय बाद ये  स्वं ही अपने -अपने  चयनित स्थान की तरफ़ गमन कर गए और फिर कभी इनके दर्शन नहीं हुए। एक लम्बे अंतराल के बाद कुछ बिल्लियां  और उनके बच्चे आस -पास ,फिर से  दिखाई दिए। ये कोई अन्य परिवार  था । हमारे मन में भय उत्पन्न हुआ कि ये लोग फिर से कहीं गले ना  पड़ जाएं इसलिए हमने तुरंत एक कुत्ते की  व्यवस्था कर ली। अरे भई ! इ...