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'बढ़ती उम्र का दर्द'

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इंसान की असन्तोषी वृत्ति का कुछ नहीं किया जा सकता। बचपन में बड़े होने की इच्छा रखता है और जब बड़ा हो  जाता है तो बड़ा कहलाने से परहेज़ करता है। अंकल-आंटी जैसे  शब्द तो उसे गाली से लगने लगते हैं।   इन शब्दों ने तो इतनी बड़ी समस्या पैदा कर दी है कि कितना भी समझदार व्यक्ति इन्हे सुनकर भड़क उठता है।  और बोलने वाले भी कई बार इस बात का ध्यान नहीं रखते की इसे कहाँ प्रयोग करना है.हर व्यक्ति बिना कुछ सोचे  समझे इन्हे किसी भी व्यक्ति के लिए प्रयोग में ले लेता है।वह ये दिमाग भी लगाने की कोशिश नहीं करता की ये  शब्द अमुक व्यक्ति के लिए सही हैं भी या नहीं.यहाँ बड़े बच्चों द्वारा अपने दोस्त की मम्मी को भी आंटीऔर उनकी   सास को भी आंटी कहा जाता है.अब उम्र का इतना बड़ा अंतर और फिर भी सम्बोधन एक जैसा,निश्चित ही ये सोचने का विषय तो है. ये दादियों  के लिए तो गर्व की बात  हो जाती  है मगर बेचारी मम्मियों के लिए थोड़ा शर्मिन्दगी  पैदा  करने वाली  होती है। इस तरह से अंग्रेजी शब्दों की उपस्थित...

कविता (यूँही दिल को जलाने से क्या फ़ायदा..)

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यूँही दिल को जलाने से क्या फ़ायदा  उन पे तोहमत लगाने से क्या फ़ायदा  अश्क ही ना हों आँखों से गिरते अगर  सूखी आँखों से रोने से क्या फ़ायदा  ग़म ही ज़ाहिऱ हो सांसों की रफ़्तार से  चेहरे  की हरक़त छुपाने से क्या फ़ायदा  दिलज़लों की ना हालत सुधरती कभी  वैद हक़ीम को दिखाने से क्या फ़ायदा  न सलीका हो चाहत निभाने का तो  मुक़द्दर की बातों पे रोने से क्या फ़ायदा।  रंज़ -ओ -ग़म की ज़ुबाने कई और भी  खुद को गुमसुम दिखाने से क्या फ़ायदा  -अंशु चौहान   

'असंतोष '

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जब भी आपको अपने पास उपलब्ध किसी भी चीज़ से असंतोष उत्पन्न हो तो ये सोचकर देखें कि इससे बुरी भी तो हो सकती थी मगर आप हरवक्त उपलब्ध चीज़ से ज़्यादा अच्छी की कल्पना करते हैं और असंतोष की गिरफ्त् में आ जाते हैं.याद रहे आपको जो भी अर्जित होता है आपके ही संचित कर्मों से अर्जित होता है.अपने ही कर्मों से उपलब्ध व अर्जित किसी चीज़ के प्रति नकारात्मक नज़रिया आपके खुद के कर्मों के प्रति अस्वीकृति है.इसलिए अपने कर्मों को उत्कृष्ट बनाने की कोशिश करिये न की उपलब्ध चीजों के प्रति दुख,शोक और अस्वीकृति.हर व्यक्ति,हर वस्तु व व्यक्ति में तो perfection चाहता है परंतु उनका अधिकारी बनने हेतु अपने कर्मों में नहीं .तो अब अपने कर्मों की तरफ ध्यान दीजिए उपलब्ध चीजों की कमियों में नहीं.आप कमिया ही खोजते रहे तो फिर से अपने कर्म खराब करते जाएंगे क्योकि असंतोष से अपराध की उत्पत्ति होती है और अपराधी व्यक्ति तो ख़राब कर्म ही करेगा और ख़राब कर्म के रहते जीवन में कुछ अच्छा घटित होने की कल्पना करना  मूर्खता है .