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दिल में किसी को कैद करो तो जाने न दो सहेज कर इस कदर रखो के छटपटाने न दो आदत सी हो जाए इस कैदख़ाने की आशियां  कहीं और बनाने न दो ये सवाल मोहब्बत का है फिर भी बंदिश की घुटन खयालातों  में आने न दो पा ही लीं हैं जो  घड़ियाँ  उसे आजमाने की आवारा  पंछी की तरह उसे  उड़ जाने न दो । 
ये' ख़ुशी 'एक इवादत है इसकी पूजा किया  करें  ये एक 'प्रसाद'' है ख़ुदा का जो सब को  दिया  करें । 

हद है कहूँ तो

मोहब्बत में किसी की खुद को मिटाना हद है कहूँ तो रातों को उठ -उठ  आंसू बहाना हद है कहूँ तो गए अब लैला ,मजनू के ज़माने प्यार की क़समें यूँ खाना हद है कहूँ तो ये इश्क आज -कल का सच्चा नहीं होता तन्हाइयों में दिल को जलाना हद है कहूँ तो दिल की लगी से कुछ हासिल नहीं होगा बग़ावत उसूलों से करना हद है कहूँ तो। इस आवारा दिल की फ़ितरत अजब है बातों में इसकी हर बार आना हद है कहूँ तो । 
उसके अहसास  में  मेरा होना काफ़ी  है  कब मैंने उसका साथ पाने की हसरत की है 
मेरे खयालातों से उसके ख़यालात नहीं मिलते वो जिद पर अड़ा है  के तुम मेरा अक्स  हो ।   
वो हमारी जुस्तजू  में ख़ुद को मिटाने पर आमादा हैं  मग़र मगरूर इतने हैं के इज़हारे मोहब्बत नहीं करते  

माँ तू दु आ सी लगती है

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माँ! तू  बीमारी में दवा लगती है मुश्किल  में दुआ लगती है  दिल को कोई गम नहीं छूता जब तू करीब हुआ करती है  सिर पर तेरा हाथ रब का  सा सुकूं देता है उस  वक्त बहुत डरती हूँ जब तू दूर हुआ करती है तेरे आंचल की छाया में दर्द  पिघल  सा  जाता  है शक्ति सी हो जाती हूँ  जब तू सिर को छुआ करती है । रचनाकार -अंशु चौहान तस्वीरसाभार -गूगल

भिखारी

हाँ मैंने देखा है एक शख्स को हाथ में कटोरा लिए , दो वक्त की रोटी का इंतजाम करते हुए । कचरा -पात्र से किसी की फेंकी हुई पाव -भाजी की प्लेट को , भूख से व्याकुल चाटते हुए । हाँ मैंने देखा है एक शख्स को किसी सफ़ेद -पोश अभिमानी से मूक-वधिर की तरह पिटते हुए । हाँ मैंने देखा है एक शख्स को , गरीबी  से  बेऔजार लड़ते हुए हाँ मैंने देखा है  एक शख्स को तिरस्कार में भी मुस्कुराते हुए अपनी बेचारगी में भी माँ को सक्षमता का अहसास कराते हुए हाँ मैंने देखा है एक शख्स को झोपड़ी की ओट में ख़ुद के आंसू छुपाते हुए । रचनाकार -अंशु चौहान 
ये धुंधली  सी कुछ यादें ,कुछ दर्द , कुछ वादे अभी भी इस दिल में कुछ फ़ालतू का सामान बाकी है । 
जब अनैतिकता की श्रेणी में आने वाली बातों पर मेरी नाराजगी लोगों को अनुचित लगती है ,तब मुझे अहसास होता है कि या तो आधुनिकता की दौड़ में मै बहुत  पीछे रह गई हूँ या फिर वो लोग संस्कारहीनता की दौड़ में बहुत आगे निकल गए हैं । 
'ए उजालों अपनी रौशनी पर गुमां न करना  ये रौशनी भी तुम्हारी इन अंधेरों से है'

प्रणय के उदगार

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प्रणय के उदगार तुम्हारे मेरी स्मृतियों में बसने दो । कमसिन सी इस देह को अपने आलिंगन में बंधने दो । प्रेम -पुष्प की कोमल पंखुड़ियाँ चारों ओर बिखरने दो , मै स्वप्न -महल की राजकुमारी तनिक मुझे संवरने दो । स्पर्श-उमंगित मन की आतुरता विरह -नीर में मिलने दो , अश्रु -प्लावन होने से पहले रुको मुझे सँभलने दो । प्रियवर !अपनी चितवन की जंजीर में मुझको कसने दो , किंचित ,काश के शब्द -जाल से मुझे आप निकलने दो । आज समग्र समर्पण अपनी मुख -मुद्राओं पर करने दो , प्रणय के उदगार तुम्हारे मेरी स्मृतियों  में बसने दो   ।  रचनाकार -अंशु चौहान तस्वीर साभार - गूगल 

गज़ल

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ख़यालों से दिल को बहलाती रही हूँ मै उसने सुना न सुना मुझको ,आवाज उसको लगाती रही हूँ मै 1  .एक दर्द सा रह-रहकर उठता है ज़िगर में ,फिर भी उम्मीदों के टूटने की फ़िकर में ख़ुद को ख़ुशी से समझाती रही हूँ मै ख़यालों से ................................................................................................ 2  मायूसी का साया फैला है इस कदर से ,जोशे ज़िन्दगी भी मिट गया है जहन से बेचैनियों से दामन सजाती रही हूँ मै ख़यालों से .................................................................................................. 3 ये मुक़द्दर है जो पल-पल जीता है मुझसे ,कई बार मुझको रुलाया है इसने ख़ामोशी से ख़ुदा को बुलाती रही हूँ मै ख़यालों से ..................................................................................... तस्वीर साभार -गूगल रचनाकार -अंशु चौहान 

बस एक बार कहदो

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हालत यदि अपनी आपको बयां करूं तो, क्या तुम मुझको सुनोगे मै पास आकर आपके रो दूं तो ,क्या तुम मुझको चुप करोगे मै आपको अपनी हर बात बताना चाहती हूँ तन्हाइयों से दूर आपका साथ पाना चाहती हूँ मै दर्द भरी धड़कने अपनी आपको सुनाना चाहती हूँ ग़र मै आपको पसंद हूँ ,तो मै खुद से आपको जोड़ना चाहती हूँ कहदो  के आपको मेरी हर शर्त पसंद है बस एक बार कह दो कि आपको मेरी चाहत का हर रंग पसंद है ।   -अंशु चौहान तस्वीर साभार -गूगल
मेरी ग़ैरत को तेरे सामने झुकना ग़वारा नहीं हो मशहूर  कितना भी मग़र तू तो हमारा नहीं  दीवाने देखे हैं बहुत फ़टेहाल चाहत में हमने दर व् दर ठोकरे 'मजनू' की सूरत में खाना मोहब्बत के सागर  का ये किनारा नहीं । नाज़ दिल पे है ग़ैरों की जुबां  सुनी नहीं जिसने जाए किसी के पास मकां की दहलीज़ पार कर वफ़ा ए दिल को मंजूर कोई ऐसा सहारा नहीं ।

बेबस

मायूस से चेहरे को व्यंग की वेदना न दो हंसी ही मिलती नहीं सबको, उन खामोश  निगाहों को विवशता की आहट न दो डगमगाते क़दम कई बार संभाले हैं उसने अब होश में आने पर उपेक्षा के उसे धक्के न दो रूठी हुई ज़िन्दगी को मनाता रहा था वो आज ख़ुद से ही ख़फा है जब  तो अश्कों को उसके श़क की चेष्टा न दो दर्द के भँवर में डूबी हैं उसकी सांसे मुमकिन हो ग़र तुमसे निर्दयता के उसे थपेड़े न दो ।
तेरी चाहत का धीमा ज़हर ,मेरी सांसो में घुल रहा कब से संभाले थे ये तबियत आज कमबख्त हर राज खुल रहा । 

हे राम कुछ ऐसा कर दो

हे राम !आचरण इस युग के नर का, भी मर्यादित कर दो लक्ष्मण रेखा जिसका हो न उल्लंघन,  नारी- हित निर्धारित कर दो ।  कब तक देखूं पतित आचरण ,नारी की ये निंदा  दो आवरण शील,दया का हे कृपालु भगवंता ।  भेद सके ना पुरुष जिसे वो रक्षा कवच बना दो , हर नारी में शुद्ध चरित्र की निर्मल चेष्टाजगा दो । निष्फल कर दे हर कुत्सित दृष्टि को ऐसा आत्म नियंत्रण भर दो , हर पुरुष को राम ,हर नारी को सीता कर दो पैदा ना हो कोई रावन फिर से इस कलियुग को सतयुग कर दो । 
मेरी ख़ामोशी को हालातों से समझौता न समझो ये जलजले बगावत के रोकने की पहल है । 

मुझे कुछ कहना है

दीवानगी की हद तक चाहती हूँ तुम्हें , मै ख़ुदा को पूजती हूँ और दुआओं में  उनसे मांगती हूँ तुम्हें ।  ख्वावों में आज तक देखती थी जिसे,  आज अपने  करीब हरदम पाती हूँ उसे ।  ए जाने जिगर उम्मीदे वफ़ा  जख्मे बेवफ़ाई ना देना मुझे , मोहब्बत तुम्हारे लिए है मेरी  लुटाती रहूंगी सदा  मंजिले आशिक़ी बना के चलना मुझे ।  बहुत अँधेरा है जीवन में तुम्हारे बिना  दीप!रौशन अपने प्यार से बनाना इसे । 
गीत जब से पाया है तुम्हे  दिल दूरियों से डरता है ,रौनके महफ़िल से भी अब कहाँ  बहलता है । स्थायी -यूं तो हर रोज गुज़र जाता है पर वो अहसासे चाहत नहीं मिल पाता है अंतरा -मैंने रो-रोकर गुजारी हैं जुदाई की घड़ियाँ ,हरेक अश्कों ने सजाई हैं तन्हाई की लड़ियाँ अब तो दिल दर्द भरे गीत गुनगुनाता है । यूं तो .................................................................................................................... अंतरा-हम तो मजबूर हैं आपकी चाहत में सनम ,तुमको पाने को मचलता है मेरा दीवाना मन मुझको तेरे सिवा कहीं चैन नहीं आता है । यूं तो ...................................................................................................................... इसकी स्वर -रचना भी मैंने ही की है ,मै उम्मीद करती हूँ जल्द ही मेरी रचनाओं का एक संगीतमय संकलन निकले । प्रभु की इनायत हो । 
तुम सितम पे सितम यूंही करते रहो , मुस्कुरा के हम ख़ुदा को बताते रहेंगे जिस दिन उसकी अदालत में सुनवाई होगी सज़ा क़सम से तुमको दिलाकर   रहेंगे ।

काश

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ये जो गाडोलिया लौहार से हम यहाँ- वहाँ फिरते हैं क्यों होता गर रहने को एक मकान होता । बार-बार मेरी गैरत को ये जो चोट पहुँचाता है कोई कब मुमकिन था जो हांसिल ऊँचा मुक़ाम होता । मजबूर हूँ जो इस कदर आज मै ना होती मेहरबां  जो मुझपे ख़ुदा तमाम होता । मिल सका ना वो जिसकी तम्मन्ना की सोचती हूँ अक्सर  दुआओं का ये तो ईनाम  नहीं होता । ये जो रुका -रुका सा हरपल लगता है मुझको इस तरहा तो ज़िन्दगी से इत्मिनान नहीं होता ।   तस्वीर साभार गूगल

तेरे जाने के बाद

एक तूफ़ान सा आ गया है तेरे जाने के बाद कब होंठ हँसे हैं उसके, तेरे जाने के बाद । यूं तो सफ़र ज़िन्दगी का तय कर रही हैं, सांसे उसकी कब मंज़िल मिली मगर उसको,  तेरे जाने के बाद । तुझसे ही आबाद था उम्मीदे जहाँ उसका इस वीरानी को भर पायेगा कौन, तेरे जाने के बाद । दिल में अथाह दर्द ,खुद को नाहक हंसाने की कोशिश कैसे संभाले है खुद को जाने तेरे जाने के बाद । ज़ख्म इतना गहरा ख़ुदा ने ,जो दे डाला उसको वेदना सहती है कितनी तेरे जाने के बाद ।
संगत  का असर देखिए क्या -क्या   कर डालता है । बेचारी एक' कोयल हमारी बस्ती के पार्क में रोज अपना मधुर गीत सुनाने आती थी । हम सभी उसकी मधुर आवाज से मोहित होते रहते थे । एक दिन कोयल ने ज्यों ही अपना रियाज  शुरू किया तभी उसे पास के ही किसी कुत्ते की भोंकने की आवाज सुनाई दी ,अब कोयल रानी उस आवाज से विचलित हो गईं । कोयल के रियाज पर उस आवाज का ऐसा असर हुआ की वह उसी आवाज में बोलने लगी अर्थात वह भोंकने लगी । वह बार -बार कू -कू की आवाज निकालना चाहती  थी परन्तु उस आवाज से प्रभावित होकर उसने भोंकना ही शुरू कर दिया था।  मै १ ० मिनिट तक उन दोनों का ये गायन सुनती रही आज मुझे पता चला कि कोयल रानी के रियाज से नाखुश होकर उसके संगीत शिक्षक ने उसे भोकना बंद करने तक कक्षा में न आने की हिदायत  दी है । बेचारी कोयल  ३ दिन दिनों से इधर दिखाई नहीं दी है । गंभीर मत होइए वो फिर आयेगी ,ये बात अलग है कि अब वह गाएगी नहीं भोंकेगी ..ये मेरा हास्यास्पद अनुभव है ...........
असंयम, असहिष्णुत्ता ,व्यभिचार ,बलात्कार बस यही है पहचान अब भारतीय संस्कृति की क्षीण मानवीय मूल्य ,हिंसा ,लोभ ,अनाचार बस यही है पहचान अब भारतीय संस्कृति की न अतिथि सम्मान ,न सदगुणों का मान पर निंदा ,पर उपहास बस यही है पहचान अब भारतीय संस्कृति की मृत प्राय : हो रही है नैतिकता महान, वो खो चुकी संस्कृति जिस पर था कभी गुमान दूसरों को नसीहत ,नहीं स्व दुर्गुणों का भान बस यही है पहचान अब भारतीय संस्कृति की खून के रिश्तों में भी कालिख मलिनता की दरिंदगी ,दुर्ब्रित्ति ,घ्रिनास्पद  व्यवहार बस यही है पहचान अब भारतीय संस्कृति की । 
तुम  से  मेरी  पहचान  दोस्ती  है अप्नत्व भरा  प्यारा  सा  रिश्ता  दोस्ती  है । भावनाओं  का अटूट  बंधन ,दोस्ती है समर्पण  हो  जिसमें  अहम्  और  स्वं  का उसी  पूर्ण  त्याग  का नाम  दोस्ती  है | न  ईर्ष्या भाव  जिसमें ,परिहास  भाव  से हीन हो उसी  उच्च  भाव  पूर्ण स्वभाव  का  नाम  दोस्ती  है । विस्मृत  न हो कभी ,वो चिरस्मरणीय  अहसास  दोस्ती है ।   
मेरी हर हार पर अहम् उनका पलता रहा , मैंने यही सोचकर अब जीतना छोड़ दिया आश्रित के लिए मेरा भी आखिर,कुछ तो फ़र्ज बनता है ।
मन  के  पृष्ठों  पर उभरी हुई लकीरों को शब्द -चित्रों  का रूप दान दान  तो  कर हो हक़ तेरा भी अदा सृजन के लिए सृष्टि में अपनी दिव्य कला से कुछ निर्माण तो कर कितने हुनर से बनाते हैं पक्षी भी आशियाँ  अपना तू कला  मर्मज्ञ अपनी प्रतिभा गुमनाम न कर मुन्जमिद है जो गर्द दुशवारी की तेरे  माथे  पर करके साफ़ अपने कौशल से सबको  हैरान तो कर ये जरूरी  भी नहीं सारा श्रेय तुझको मिले अनाम ही सही अपना श्रम कुर्बान तो कर । । 

'रिक्शावाला '

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भरी दुपहरी हो या फिर जाड़ों की हो शाम राह ए मुसाफ़िर को ढोना ही है बस उसका काम वो भी मानव तू भी मानव है पीड़ा का अनुभव भी सम लेकिन तेरी पीड़ा महँगी उसके श्रम की पीड़ा के तू लगा सके है दाम उसकी किस्मत में ढोना है तेरी में है मौज ए सवार तू तो है आराम का आदी उसकी नियति है ये थकान पर चलती जीविका उसकी तुझसे मान गए उस पर तेरा अहसान । -अंशु चौहान
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हर बार एक जिद करके बैठ जाती  हूँ कि अब नहीं हारूँगी मगर ये जिद मेरे अपरिपक्व विस्वास  की होती है ,फिर एक सच से सामना होता है जहाँ मेरे सारे भ्रम टूट जाते हैं । मैं हारने लगती हूँ उन स्थापित काल्पनिक उम्मीदों से जो मुझे यथार्थ के धरातल पर धकेल देती हैं । हाँ मै मानती हूँ ,मुझे अहसास हो गया है अब कि मै यथार्थ की इस दुनिया में कुछ भी नहीं हूँ । अभी बहुत कुछ पाना बाकी  है अपनी महत्ता दर्शाने के लिए और अपने हर कथन पर लोगों की वाहवाही लूटने के लिए । मुझे प्रतिबंधित होना पड़ेगा अपने विरोधियों का विरोध सहने के लिए। मुझे बचाय रखनी होगी एक फीकी सी मुस्कान अपने विरोधियों के अभिवादन के लिए । जब मै इस कार्य में इतनी दक्ष हो जाऊंगी कि लोगों को इस बात का अहसास ही न हो कि वह मेरी कृत्रिम हंसी है या प्राकृतिक तब मै मान लूंगी कि मै सक्षम हो गई हूँ ऊँचा उठने के लिए  ,कुछ अच्छा अर्जित करने के लिए अन्यथा  मै   यूंही जूझती रहूँगी ख्याति प्राप्त लोगों की दुनिया में अपना अस्तित्व ढूँढने के लिए । अब तो खुश हो न तुम ?यही सब सुनना चाहते थे ना तुम अपने अहम्  क...
क्यों लगता है कहीं  कुछ छूट  गया है  एक खालीपन सा संग चलता है  तीरगी है दिल की गलियों में  उजाला मुझे ये क्यों छलता है  इल्म नहीं है मुझे खुदा का  दीप आलय में रोज जलता है  जलजले तो जमीं पे आते हैं लेकिन  जहन मेरा ये क्यों हिलता है  यूं तो सब्र से काम लिया है  बस अब के थोड़ा कम लगता है । अंशु चौहान (१ ९९४ ) 
मै रिश्ता निभाती हूँ तुम इनकी मर्यादा निभाते हो मैंने शरीर को अहम् समझा तुम आत्मा तक जाते हो मै एक  कदम चलती हूँ तुम दो कदम बढ़ जाते हो सचमुच श्रेष्ठता में तुम मुझसे  बहुत आगे हो मै तुमसे आज अपनी हार मानती हूँ मगर ये हार भी मेरी ही जीत हैक्योंकि तुझ विजेता  को मैंने  पाया  है मोहब्बत की  तुमने बखूबी इवादत की है मुझसे न बन सकी तुमने इनायत की है शिकायत तो खुद से ही है मुझे तुम क्यों रूठ जाते हो
बाइक  पार्क करने  की बात को लेकर दो समुदायों में हुए दंगों  ने ये सिद्ध  कर दिया है कि मनुष्य की सोच आज कितनी संकीर्ण और आत्म केन्द्रित हो गई है । आज लोगों में सहनशीलता और परस्पर  प्रेम की भावना कहीं विलुप्त हो गई है । यूँ तो हमने मनुष्य के रूप में जन्म लिया है परन्तु मनुष्य होने के नाते जो मानवीय गुण हमारे भीतर होने चाहिए उनका हम सब में आज अभाव है । आज का मनुष्य स्व से ऊपर उठना ही नहीं चाहता है।  वह उसी बात को सुनना पसंद करता है जो उसके लिए उपयुक्त हो ,जिससे उसके हित की सिद्धि होती हो ।  कितनी अजीव बात है कि हम अपने क्षुद्र  स्वार्थों के लिए किसी की जान लेने के लिए भी आतुर हो जाते हैं ,किसी का कुछ भी व किसी भी हद तक बुरा सोच लेते हैं । मनुष्य कभी ये नहीं सोचता की ये सारी सृष्टी ,इसका हरेक व्यक्ति सब एक दूसरे से कहीं न कहीं जुड़े हुए हैं और एक दूसरे के काम आ रहे हैं । जब हम आपसी सहयोग और प्रेम की भावना का त्याग कर देंगे तो एक दिन खुद ही तन्हा हो जाएंगे । जब तक व्यक्ति अपने अहम् को सर्वोपरि रखेगा तब तक परमार्थ  की भावना का आविर्भाव ...
व्यथित  होती हूँ जब रिश्तों  की मर्यादा टूटती है मायूस  होती हूँ जब संबंधों से  आत्मीयता छूटती  है रुलाता  है ये आयातित परिवर्तन जो संस्कृति को छल रहा है कुछ ऐसा बदलाव जो अस्वीकार्य है मन को क्यों इस देश में पल रहा है विरोध के स्वर जब भी उठाने की कोशिश की वो तमाम ऑखें मुझे नापाक घूरती हैं भीख मांग रही नैतिकता स्व अस्तित्व की दर व दर अधर्म की हंसी बार-बार छूटती है ये कैसा कहर ,कैसा है मंजर निर्लज्जता यहाँ सरे आम  घूमती है copy right anshu@1994  
शब्द राग से निकले गीत हो गए कुछ सुर मिले आवाज से मीत हो गए खुशबू बिखेर कर चली वो ग़जल  इस तरहा गायक भी उसके आशिक मन प्रीत हो गए वीणा नुपुर पद ताल से संगीत यूं रिसने लगा मौन भी स्वर लहरों में कहीं खो गए अनकहे जुबां उस रात तो कई बात जैसे कह गई 'तानसेन'के गान से रोशन जब दीप हो गए बैठ कर सीप में मोती भी  अपने  जीवन पर रोने लगा मुझ से उन्मुक्त आज तो कविता छंद हो गए ।। 

'मयके की गलियाँ '

वो  गुजरा ज़माना वो मयके की गलियां माँ की जरा-जरा सी बात पर मेरा रूठ जाना अब बहुत याद आता है ।  बीते हरेक सायते की मेरे वर्तमान में दख़ल ये तो नहीं कि मुझे अजीयत  में डालती है , मगर अपनी नादानियों पर अब मलाल आता है । मेरी नानी जो लगती थी हुस्न परी सी कभी, उसके गालों की झुर्री और झुकी कमर देख जवानी का यूँही ख़याल आता है । कितनी ममता लुटाई थी उसने बचपन पे मेरे क़र्ज  कैसे चुकाऊँ जहन में बस ये  ही सवाल आता है.
हम  अपनी  भारतीय  संस्कृति पर बड़ा गर्व करते हैं और गर्व होना भी चाहिए क्योंकी भारतीय संस्कृति सदा से ही सम्माननीय रही है। इस देश ने हमेशा धार्मिक संस्कारों और,सामाजिक मर्यादाओं को महत्त्व दिया है । परन्तु आज हमारी इस संस्कृति ने अपना मूल स्वरुप खो दिया है क्योंकि इस पर पाश्चातीय  सभ्यता का जबरदस्त  असर हो रहा  है । आज भारतीय संस्कृति  से ''मर्यादा''शब्द बाहर  हो चुका है । हम पश्चिमी  देशों की नक़ल करते-करते इतने विवेक हीन हो गए हैं कि सही ग़लत का भेद भी  हमें अब समझ नहीं आता है ।इस विवेकहीनता का स्पष्टीकरण  इस  बात से  स्वतः हो जाता है कि सरकार यहाँ ''संबंधों की उम्र निर्धारित कर रही है । गौर करने लायक पहलू ये नहीं है -कि क्या उम्र निर्धारित कर रही है बल्कि ये है कि भारत जैसे पवित्र देश में इस तरह की गंदगी के बारे में विचार क्यों किया जा रहा है । इस तरह के  कदम से सिर्फ  नैतिकता की  हत्या होगी । समाज में गंदगी  फैलेगी और आने वाले समय में देश की जो तस्वीर सामने आयेगी उस पर हम आंसू बहाने के अतिरिक्त ...

एक दीप अपनी चाहत का

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एक  दीप अपनी  चाहत  का इस सूनेपन  में  जला  दो मेरी खोई  हुई मुस्कान मेरे होठों  पे  सजा दो । बस तुम्हारी ही दिलकश नज़र ने इस दिल को चुराया है प्रियतम :अपनी सांसों की खुशबू  से मेरा जीवन महका दो । टूटी हुई उम्मीदें ,रूठे हुए अरमां है साथ देकर अपना मुझे  जीना सिखा दो । हर पल घुटती  सिसकती  हूँ  मै खो  न दूं होश अपने तड़प कर इस तरहा आकर अब ये बेखुदी मिटा दो । -तस्वीर साभार गूगल

मौन_अभिव्यक्ति

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मेरी मूक अभिव्यक्ति करती गूढ़ रहस्य उदघाटित भावों की शक्ति करती है मन को मेरे संचालित । प्रश्न -चिन्ह है मुखमुद्रा पर बोधगम्य है चिंतन श्वासों का क्रम उल्टा -सीधा अवसादित है तन-मन आशय खोजता है मन मेरा जिज्ञासा आच्छादित पर उलझा जाता है पल-पल उलझन में अबाधित किंचित भी उल्लास न मिलता हर्षित हो कर भी  मन न हँसता  अंतरमन  में जटिलताओं की लहरें होती प्रवाहित  रोकती हैं तृष्णाएँ असीमित होने से उल्लासित मैं प्रतिबद्ध हूँ मौन भंग कर,न शब्द करूँ उच्चारित आत्म-द्वन्द की इस क्रीड़ा  में , छल को करूँ पराजित॥   

कोई है जो बुलाता है

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            किसी अहसास को हरपल करीब पाती हूँ मै तन्हा जब भी होती हूँ ,उससे बतियाती हूँ मै कहीं कुछ अधूरा सा ,छूटा हुआ है दिल के कोने में कौनसी दुनिया है जिसे बड़ी हसरत से खोजना चाहती हूँ मै । पागल ना हो जाऊं इतना सताता है क्यों खुद को भूल जाती हूँ इतना याद आता है वो मेरे खयालों में ही बस चंद तस्वीरें हैं उसकी जमीं पर कहाँ हकीकत है ऐसी जिसे बेख़बर ढूँढना चाहती हूँ मै । 

उत्सर्ग

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ये ज़िन्दगी कुछ मोम सी  घट रही दुःख ताप से पिघल -पिघल है आरम्भ से अंत तक वेदना का सिलसिला  ये ख़याल बस एक त्याग का जल रही तूफान में संभल -संभल । फूँक से बुझा रहा था नादान बाल वो था कयास क्या उसे दृढ़ हो रही थी स्व से निकल -निकल । हुआ अँधेरा जब जंहा इसे वंहा सजा दिया जलती रही ,जलती रही रौशनी में बुझा दिया लेके पीर दिल में यूँही रही अंत तक विकल -विकल।