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तेरी चाहत का धीमा ज़हर ,मेरी सांसो में घुल रहा कब से संभाले थे ये तबियत आज कमबख्त हर राज खुल रहा । 

हे राम कुछ ऐसा कर दो

हे राम !आचरण इस युग के नर का, भी मर्यादित कर दो लक्ष्मण रेखा जिसका हो न उल्लंघन,  नारी- हित निर्धारित कर दो ।  कब तक देखूं पतित आचरण ,नारी की ये निंदा  दो आवरण शील,दया का हे कृपालु भगवंता ।  भेद सके ना पुरुष जिसे वो रक्षा कवच बना दो , हर नारी में शुद्ध चरित्र की निर्मल चेष्टाजगा दो । निष्फल कर दे हर कुत्सित दृष्टि को ऐसा आत्म नियंत्रण भर दो , हर पुरुष को राम ,हर नारी को सीता कर दो पैदा ना हो कोई रावन फिर से इस कलियुग को सतयुग कर दो । 
मेरी ख़ामोशी को हालातों से समझौता न समझो ये जलजले बगावत के रोकने की पहल है । 

मुझे कुछ कहना है

दीवानगी की हद तक चाहती हूँ तुम्हें , मै ख़ुदा को पूजती हूँ और दुआओं में  उनसे मांगती हूँ तुम्हें ।  ख्वावों में आज तक देखती थी जिसे,  आज अपने  करीब हरदम पाती हूँ उसे ।  ए जाने जिगर उम्मीदे वफ़ा  जख्मे बेवफ़ाई ना देना मुझे , मोहब्बत तुम्हारे लिए है मेरी  लुटाती रहूंगी सदा  मंजिले आशिक़ी बना के चलना मुझे ।  बहुत अँधेरा है जीवन में तुम्हारे बिना  दीप!रौशन अपने प्यार से बनाना इसे । 
गीत जब से पाया है तुम्हे  दिल दूरियों से डरता है ,रौनके महफ़िल से भी अब कहाँ  बहलता है । स्थायी -यूं तो हर रोज गुज़र जाता है पर वो अहसासे चाहत नहीं मिल पाता है अंतरा -मैंने रो-रोकर गुजारी हैं जुदाई की घड़ियाँ ,हरेक अश्कों ने सजाई हैं तन्हाई की लड़ियाँ अब तो दिल दर्द भरे गीत गुनगुनाता है । यूं तो .................................................................................................................... अंतरा-हम तो मजबूर हैं आपकी चाहत में सनम ,तुमको पाने को मचलता है मेरा दीवाना मन मुझको तेरे सिवा कहीं चैन नहीं आता है । यूं तो ...................................................................................................................... इसकी स्वर -रचना भी मैंने ही की है ,मै उम्मीद करती हूँ जल्द ही मेरी रचनाओं का एक संगीतमय संकलन निकले । प्रभु की इनायत हो । 
तुम सितम पे सितम यूंही करते रहो , मुस्कुरा के हम ख़ुदा को बताते रहेंगे जिस दिन उसकी अदालत में सुनवाई होगी सज़ा क़सम से तुमको दिलाकर   रहेंगे ।

काश

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ये जो गाडोलिया लौहार से हम यहाँ- वहाँ फिरते हैं क्यों होता गर रहने को एक मकान होता । बार-बार मेरी गैरत को ये जो चोट पहुँचाता है कोई कब मुमकिन था जो हांसिल ऊँचा मुक़ाम होता । मजबूर हूँ जो इस कदर आज मै ना होती मेहरबां  जो मुझपे ख़ुदा तमाम होता । मिल सका ना वो जिसकी तम्मन्ना की सोचती हूँ अक्सर  दुआओं का ये तो ईनाम  नहीं होता । ये जो रुका -रुका सा हरपल लगता है मुझको इस तरहा तो ज़िन्दगी से इत्मिनान नहीं होता ।   तस्वीर साभार गूगल

तेरे जाने के बाद

एक तूफ़ान सा आ गया है तेरे जाने के बाद कब होंठ हँसे हैं उसके, तेरे जाने के बाद । यूं तो सफ़र ज़िन्दगी का तय कर रही हैं, सांसे उसकी कब मंज़िल मिली मगर उसको,  तेरे जाने के बाद । तुझसे ही आबाद था उम्मीदे जहाँ उसका इस वीरानी को भर पायेगा कौन, तेरे जाने के बाद । दिल में अथाह दर्द ,खुद को नाहक हंसाने की कोशिश कैसे संभाले है खुद को जाने तेरे जाने के बाद । ज़ख्म इतना गहरा ख़ुदा ने ,जो दे डाला उसको वेदना सहती है कितनी तेरे जाने के बाद ।
संगत  का असर देखिए क्या -क्या   कर डालता है । बेचारी एक' कोयल हमारी बस्ती के पार्क में रोज अपना मधुर गीत सुनाने आती थी । हम सभी उसकी मधुर आवाज से मोहित होते रहते थे । एक दिन कोयल ने ज्यों ही अपना रियाज  शुरू किया तभी उसे पास के ही किसी कुत्ते की भोंकने की आवाज सुनाई दी ,अब कोयल रानी उस आवाज से विचलित हो गईं । कोयल के रियाज पर उस आवाज का ऐसा असर हुआ की वह उसी आवाज में बोलने लगी अर्थात वह भोंकने लगी । वह बार -बार कू -कू की आवाज निकालना चाहती  थी परन्तु उस आवाज से प्रभावित होकर उसने भोंकना ही शुरू कर दिया था।  मै १ ० मिनिट तक उन दोनों का ये गायन सुनती रही आज मुझे पता चला कि कोयल रानी के रियाज से नाखुश होकर उसके संगीत शिक्षक ने उसे भोकना बंद करने तक कक्षा में न आने की हिदायत  दी है । बेचारी कोयल  ३ दिन दिनों से इधर दिखाई नहीं दी है । गंभीर मत होइए वो फिर आयेगी ,ये बात अलग है कि अब वह गाएगी नहीं भोंकेगी ..ये मेरा हास्यास्पद अनुभव है ...........
असंयम, असहिष्णुत्ता ,व्यभिचार ,बलात्कार बस यही है पहचान अब भारतीय संस्कृति की क्षीण मानवीय मूल्य ,हिंसा ,लोभ ,अनाचार बस यही है पहचान अब भारतीय संस्कृति की न अतिथि सम्मान ,न सदगुणों का मान पर निंदा ,पर उपहास बस यही है पहचान अब भारतीय संस्कृति की मृत प्राय : हो रही है नैतिकता महान, वो खो चुकी संस्कृति जिस पर था कभी गुमान दूसरों को नसीहत ,नहीं स्व दुर्गुणों का भान बस यही है पहचान अब भारतीय संस्कृति की खून के रिश्तों में भी कालिख मलिनता की दरिंदगी ,दुर्ब्रित्ति ,घ्रिनास्पद  व्यवहार बस यही है पहचान अब भारतीय संस्कृति की । 
तुम  से  मेरी  पहचान  दोस्ती  है अप्नत्व भरा  प्यारा  सा  रिश्ता  दोस्ती  है । भावनाओं  का अटूट  बंधन ,दोस्ती है समर्पण  हो  जिसमें  अहम्  और  स्वं  का उसी  पूर्ण  त्याग  का नाम  दोस्ती  है | न  ईर्ष्या भाव  जिसमें ,परिहास  भाव  से हीन हो उसी  उच्च  भाव  पूर्ण स्वभाव  का  नाम  दोस्ती  है । विस्मृत  न हो कभी ,वो चिरस्मरणीय  अहसास  दोस्ती है ।   
मेरी हर हार पर अहम् उनका पलता रहा , मैंने यही सोचकर अब जीतना छोड़ दिया आश्रित के लिए मेरा भी आखिर,कुछ तो फ़र्ज बनता है ।
मन  के  पृष्ठों  पर उभरी हुई लकीरों को शब्द -चित्रों  का रूप दान दान  तो  कर हो हक़ तेरा भी अदा सृजन के लिए सृष्टि में अपनी दिव्य कला से कुछ निर्माण तो कर कितने हुनर से बनाते हैं पक्षी भी आशियाँ  अपना तू कला  मर्मज्ञ अपनी प्रतिभा गुमनाम न कर मुन्जमिद है जो गर्द दुशवारी की तेरे  माथे  पर करके साफ़ अपने कौशल से सबको  हैरान तो कर ये जरूरी  भी नहीं सारा श्रेय तुझको मिले अनाम ही सही अपना श्रम कुर्बान तो कर । । 

'रिक्शावाला '

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भरी दुपहरी हो या फिर जाड़ों की हो शाम राह ए मुसाफ़िर को ढोना ही है बस उसका काम वो भी मानव तू भी मानव है पीड़ा का अनुभव भी सम लेकिन तेरी पीड़ा महँगी उसके श्रम की पीड़ा के तू लगा सके है दाम उसकी किस्मत में ढोना है तेरी में है मौज ए सवार तू तो है आराम का आदी उसकी नियति है ये थकान पर चलती जीविका उसकी तुझसे मान गए उस पर तेरा अहसान । -अंशु चौहान
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हर बार एक जिद करके बैठ जाती  हूँ कि अब नहीं हारूँगी मगर ये जिद मेरे अपरिपक्व विस्वास  की होती है ,फिर एक सच से सामना होता है जहाँ मेरे सारे भ्रम टूट जाते हैं । मैं हारने लगती हूँ उन स्थापित काल्पनिक उम्मीदों से जो मुझे यथार्थ के धरातल पर धकेल देती हैं । हाँ मै मानती हूँ ,मुझे अहसास हो गया है अब कि मै यथार्थ की इस दुनिया में कुछ भी नहीं हूँ । अभी बहुत कुछ पाना बाकी  है अपनी महत्ता दर्शाने के लिए और अपने हर कथन पर लोगों की वाहवाही लूटने के लिए । मुझे प्रतिबंधित होना पड़ेगा अपने विरोधियों का विरोध सहने के लिए। मुझे बचाय रखनी होगी एक फीकी सी मुस्कान अपने विरोधियों के अभिवादन के लिए । जब मै इस कार्य में इतनी दक्ष हो जाऊंगी कि लोगों को इस बात का अहसास ही न हो कि वह मेरी कृत्रिम हंसी है या प्राकृतिक तब मै मान लूंगी कि मै सक्षम हो गई हूँ ऊँचा उठने के लिए  ,कुछ अच्छा अर्जित करने के लिए अन्यथा  मै   यूंही जूझती रहूँगी ख्याति प्राप्त लोगों की दुनिया में अपना अस्तित्व ढूँढने के लिए । अब तो खुश हो न तुम ?यही सब सुनना चाहते थे ना तुम अपने अहम्  क...
क्यों लगता है कहीं  कुछ छूट  गया है  एक खालीपन सा संग चलता है  तीरगी है दिल की गलियों में  उजाला मुझे ये क्यों छलता है  इल्म नहीं है मुझे खुदा का  दीप आलय में रोज जलता है  जलजले तो जमीं पे आते हैं लेकिन  जहन मेरा ये क्यों हिलता है  यूं तो सब्र से काम लिया है  बस अब के थोड़ा कम लगता है । अंशु चौहान (१ ९९४ ) 
मै रिश्ता निभाती हूँ तुम इनकी मर्यादा निभाते हो मैंने शरीर को अहम् समझा तुम आत्मा तक जाते हो मै एक  कदम चलती हूँ तुम दो कदम बढ़ जाते हो सचमुच श्रेष्ठता में तुम मुझसे  बहुत आगे हो मै तुमसे आज अपनी हार मानती हूँ मगर ये हार भी मेरी ही जीत हैक्योंकि तुझ विजेता  को मैंने  पाया  है मोहब्बत की  तुमने बखूबी इवादत की है मुझसे न बन सकी तुमने इनायत की है शिकायत तो खुद से ही है मुझे तुम क्यों रूठ जाते हो
बाइक  पार्क करने  की बात को लेकर दो समुदायों में हुए दंगों  ने ये सिद्ध  कर दिया है कि मनुष्य की सोच आज कितनी संकीर्ण और आत्म केन्द्रित हो गई है । आज लोगों में सहनशीलता और परस्पर  प्रेम की भावना कहीं विलुप्त हो गई है । यूँ तो हमने मनुष्य के रूप में जन्म लिया है परन्तु मनुष्य होने के नाते जो मानवीय गुण हमारे भीतर होने चाहिए उनका हम सब में आज अभाव है । आज का मनुष्य स्व से ऊपर उठना ही नहीं चाहता है।  वह उसी बात को सुनना पसंद करता है जो उसके लिए उपयुक्त हो ,जिससे उसके हित की सिद्धि होती हो ।  कितनी अजीव बात है कि हम अपने क्षुद्र  स्वार्थों के लिए किसी की जान लेने के लिए भी आतुर हो जाते हैं ,किसी का कुछ भी व किसी भी हद तक बुरा सोच लेते हैं । मनुष्य कभी ये नहीं सोचता की ये सारी सृष्टी ,इसका हरेक व्यक्ति सब एक दूसरे से कहीं न कहीं जुड़े हुए हैं और एक दूसरे के काम आ रहे हैं । जब हम आपसी सहयोग और प्रेम की भावना का त्याग कर देंगे तो एक दिन खुद ही तन्हा हो जाएंगे । जब तक व्यक्ति अपने अहम् को सर्वोपरि रखेगा तब तक परमार्थ  की भावना का आविर्भाव ...