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"निन्दा घातक हैं "

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"निन्दक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाए   बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे सुभाए"  कबीर जी का ये दोहा आप सभी ने सुना होगा .क्या आप सहमत हैं इस बात से ?मेरा तो मानना है कि ये विचार  काफी हद तक सही नहीं हैं. दुनिया में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो अपनी निन्दा से प्रसन्न या उत्साहित होता होगा.निन्दा या आलोचना  व्यक्ति का मनोबल तोड़ देती है जबकि प्रोत्साहन और प्रशंसा ज़िन्दगी में उन्नति करने और आगे बढ़ने की प्रेरणा  देते हैं.सोचिए !अगर आलोचना से कोई प्रसन्न होता या अच्छे स्वभाव का होता तो किसी की आलोचना करने से  उसका  स्वभाव सही होता जबकि होता उल्टा हैं .आलोचना से परेशान व्यक्ति आत्महत्या की राह चुन लेता है . निन्दा से आहत व्यक्ति निराशावादी हो जाता है उसका विश्वास टूट जाता है.हर कार्य को करने से पहले घबराने   लगता है इसलिए निन्दा कभी भी लाभकारी नहीं  होती .निन्दा करने वाला व्यक्ति सभी की आँखों को  चुभता है,  शास्त्रों में निंदा करने वाले को पापी की श्रेणी में रखा गया है। कहा जाता है कि निंदा करने वाला व्यक्ति जिसकी  निंदा करता...