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'शुद्ध भक्ति'

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'शुद्ध भक्ति ' शब्द को सुनकर मन में सभी के दिल में ये ख्याल तो ज़रूर आया होगा की भक्ति में शुद्ध और अशुद्ध  का क्या मतलब हुआ। दरअसल भक्ति में शुद्ध और अशुद्ध का सम्बन्ध भक्त की भावना से होता है। भक्त भी दो तरह के होते हैं- एक वो जो अपनी तमाम इच्छाओं की पूर्ती हेतु भक्ति करते हैं,जगह जगह के मंदिरों में  जाकर पूजा अर्चना करते हैं,धोक लगाते हैं कि अमुक समस्या या दुःख खत्म हो जाएगा तो इतने का प्रसाद चढ़ाएंगे  या कोई भी कार्य।कुछ मामलो में तो दूसरों के अहित की कामना से भी कुछ लोग पूजा करते हैं. सही इच्छाओं की पूर्ती के लिए की गई पूजा में  कोई बुराई नहीं है लेकिन ग़लत इच्छाओं के लिए की गई पूजा भी  पाप कर्म में ही आती है।सबसे निकृष्ट लोग वही होते हैं जो भक्ति की आड़ में अपनी ग़लत इच्छाओं की पूर्ती की  कामना रखते हैं।इनकी कोई कामना तंत्र -मंत्र से पूरी हो भी जाये तो ऐसे लोगो का अंत बड़ा भयावह होता है। ये ज़िंदगी मौत के बीच में झूलते रहते हैं और बड़ी ही दर्दनाक मौत होती है इनकी,और प्रेत योनि में जाते हैं। दूसरी भक्ति होती है-निःस्वार्थ भक्ति जिसमें कोई इच्छा नहीं होती।बस प्...

'असमानता क्यों '

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    समाज में कुछ चीज़े बड़ी अव्यवस्थित और अतार्किक हैं। पहले लड़की-लड़के में भेद की मानसिकता थी तो लड़किया दुखी और त्रस्त थीं। अब लड़कियों को इतना प्रोटेक्ट किया जा रहा है की लड़के असुरक्षित हो गए हैं। ऐसे ही कहीं बुजुर्गों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा की बात की जा रही है तो उन बहुओं  के साथ अन्याय हो रहा है  जो अपने ऊपर उन अत्याचारों को झेल चुकी हैं जो सास ने अपनी बुढ़ापे से पहले की उम्र में किये हुए थे। अब सास के पास तो बुढ़ापे की उम्र की सहानुभूति है स्वं के लिए लोगों से,परन्तु बहु को जो मानसिक बीमारियां  और शारीरिक बीमारियां उसकी वजह से मिली उनको समझने और सुनने वाला कोई नहीं। अब ऐसी स्थिति में विवाह से पहले बालक-बालिका असमानता को झेलने वाली उन बालिकाओं की स्थिति पर ज़रा  विचार कीजिये जो विवाह से पहले भी असमानता की वजह से पारिवारिक सुख से वंचित रही और विवाह के बाद  ससुराल में बहु से की जाने वाली सारी अपेक्षाओं की वजह से बाद में भी दुखी हो रही हैं। क्या हर परिवार की स्थिति और परस्थिति समान होती हैं ? नहीं !  सबको अलग-अलग माहौल और सुविधा-असुविधा मिलती हैं।...