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"उसे भी हक है "(कविता)

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 उसे भी हक है खुलकर खिलखिलाने का   के उसकी सांसे भी ग़मों से बोझिल होती हैं उसे भी हक़ है बिन बताए बाहर जाने का  के उसकी सीमायें भी विवशता से बंधी होती हैं उसे भी हक है सबसे पहले खाने का  के उसके साथ भी दवाईयों की पर्चियाँ जुड़ी होती है उसे भी हक है बारिश में नहाने का  के उसकी तमन्नाएं भी सावन से जुड़ी होती हैं  उसे भी हक है ज़ोर से बातें करने का के उसकी खामोशियां भी शोर से जुड़ी होती हैं उसे भी हक है आकाश में उड़ने का  के उसकी हिम्मतें भी परों से जुड़ी होती हैं उसे भी हक है नदियों सा गुंगुनाने का  के उसकी मन तरंगें भी लहरों से जुड़ी होती हैं उसे भी हक है बहुरूपी पोशाकों का के उसमें भी अल्लहड़ सी छवि छुपी होती है उसे भी हक है पुरूष से भिड़ जाने का  के उसमें भी 'दुर्गा' सी  शक्ति छुपी होती है उसे भी हक है विरोध हित डट जाने का  के उसकी स्वतन्त्रता भी अधिकारों से जुड़ी  होती है.    -अंशु चौहान                                     ...

'ना होती है तुमसे ..(स्वरचित गीत) )

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 (स्वरचित गीत ) ना होती है तुमसे मुलाकात तो ,दिल को आराम नहीं मिलता  हर पल ये ढूंढे नज़र बस तुझे,तेरा पता ही  नहीं  मिलता  1.मुझे तू संभाले ,तुझे मैं सँभालू   तेरे दिल में अपनी जगह मैं बना लूँ  बस जाए मेरी  धड़कनों में जो, ऐसा आगाज़ नहीं  मिलता. ना होती है.   .    . .     2. तसव्वुर  में मेरे  दिन - रात होकर  यादों में मेरी आँखें  भिगोकर चुरा ले जो मुझसे ,मेरी धड़कनों को ,ऐसा आराम  नहीं मिलता . -अंशु चौहान                         

"कुछ तो मतलब रखती हैं"(कविता)

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  मै कुछ बोलूँ पर तेरी  खामोशी, कुछ तो मतलब  रखती हैं. मेरे साथ में तेरी य़ादें ,कुछ तो मतलब रखती हैं.  पास रहुँ तो यहाँ- वहाँ पर नजरें,दूरी में मेरी ही बातें कुछ तो मतलब रखती हैं. बुझा-बुझा सा हाल हैं दिल का ,गरम तवे पर जली सी रोटी कुछ तो मतलब  रखती है. मेरे पास में घंटों रुकना ,गैरों संग चन्द लमहे सिरकत कुछ तो मतलब रखती है. देख के मुझ से मुँह यूँ  छुपाना,नज़र मिलाकर,नजर चुराना कुछ तो मतलब  रखती है. तन्हाई के दो पहलू हैं ,खुद ही खुद से बातें दिल की कुछ तो मतलब रखती हैं .  -अंशु चौहान      

'तलाश'

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 उसमें सुलगती हूँ मैं ,मुझमें बुझता है वो . उसमे चलती हूँ मैं ,मुझमें थमता हैं वो  उसमे संवरती हूँ मैं,मुझमे बिखरता है वो  उसमे पहेली हूँ मैं,मुझमे सुलझा है वो    उसमे रोशनी हूँ मैं मुझमे अंधेरा हैं वो.  उसमे तलाश हूँ मैं,मुझमे लापता है वो . उसमे समन्दर हूँ मैं,मुझमे प्यासा हैं वो .     उसमें आशा हूँ मैं, मुझमें निराशा है वो उसमें ठहरी हूँ मैं मुझमें बीता है वो.        -अंशु चौहान    .