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उन मुस्कुराहटों पे जब से ग़म के  पहरे हुए है ख़ुशियों  से मिलने को छटपटाती रोज़ हैं ।
ना रक्खो दिलों में गिले-शिक़वे कोई अब ज़िंदगी में दोस्ती के पल मुश्किल से मिलते हैं । 
हर शख़्स कला का कद्रदान नहीं होता कुछ यूँही हर हुनर का सबब पूछते हैं । 
 ज़िंदगी हर वक़्त आसान होती नहीं मुश्किल बिना शख़्स की पहचान होती नहीं अपने पराये का पता वक़्त बता देता है यूँही ये उलझन आसान होती नहीं बड़े सब्र से गुज़ारी है ज़िंदगी बिना  आँसू कभी मुस्कान होती नहीं 
कुछ हठ ही कर ली है दिल ने, मेरी नही सुनता रोज़ मिन्नतें करती हूँ ,कम्बख़्त नाक़ाम कर देता है ।
एक दुआ ही रख दे ,दुश्मन के हक़ में नफ़रतें ही नहीं ,मोहब्बत भी लौटाएगा कभी । 
 जाते हुए लम्हे रोक लो कोई उन बर्बादियों को नेस्त -नाबूद होती उन आबादियों को समय के गर्त में खो जाऐंगे सुखद लम्हें जी लो बेपरवाह उन आज़ादियों को ।

ज़लज़लों के शहर

ये ज़लज़लों के शहर हो गए आशियानों पर इनके क़ुदरत के क़हर हो गए मायूसियाँ सी पसरी हैं चेहरों पर महज़ घर ख़ाली हैं और सड़कों पर बसर हो गए तोड़ते हैं दम कहीं साहस ,अरमां ,अठखेलियां संवेदना पर विनाश के गहरे असर हो गए ये ज़लज़लों के शहर हो गए है भूख भी ,प्यास भी और अधूरी आस भी टूट कर ये सभी  शोक में बिफ़र रो गए ये ज़लज़लों के शहर हो गए सर्द ,गर्म मौसम कोई छत इसी नभ तले दर्द से बेअसर इनके सबर हो गए ये ज़लज़लों के शहर हो गए
हालात के मारों पर मौसम का असर नहींहोता  ख़राब हो तो ख़बर नहीं होती, ख़ुशनुमा हो तो अहसास नहीं होता । 
हम बहुत ऊँचे इरादों की दुकान रखते हैं ,महँगाई  बहुत है इसलिए कम सामान रखते हैं उसूलों के पक्के हैं क्वालिटी पे चलते हैं ,क्वांटिटी के नाम पर समझौता नहीं करते हैं पैर जमीं पे हैं ,भरोसा आसमान पे रखते हैं छोटा ही सही लेकिन बेहतर मकान रखते हैं । -अंशु चौहान
'मै हूँ साथ तेरे ' तुम मुझे देखकर मुस्कुराते क्यों हो  वो दर्द इस दिल में छुपाते क्यों हो हो जाऐगी 'सहर 'भी  इस' गम ए शाम' की इन हालातों से तुम घबराते क्यों हो कभी जो अँधेरों  में लगे राह मुश्किल हूँ बनके उजाला  तेरे साथ हरदम तुम साये में मेरे लड़खड़ाते क्यों हो । -अंशु चौहान 
'महफ़िल की बातें ' हो वाणी कटु तो मौन अच्छा लगता है न हो शरारत  तो बचपन कहाँ लगता है ताव में आकर करते हैं जो भी  वादे वो गच्चा सा लगता है परत दर परत खुलता है राज़ यूं परांठा हो मानो कोई  लच्छा सा लगता है शिक़ायत में महफ़िल जमाना वो सबका हर शख़्स कानों  का कच्चा सा लगता है । -अंशु चौहान
तेरी पनाहों में हर सुबहा ,हर शाम भली लगती है तन्हा जब भी होती हूँ ए ख़ुदा ,तू होने नही देता ।
 वो दुश्मन है  मेरा या दोस्त समझूँ  उसको  ,हर महफ़िल में मेरा ही  ज़िक्र  किया करता है होंगी बहुत रंजिशें मुझसे उसकी लेकिन ,मेरे ही चर्चे पहले बेफ़िक्र किया करता है । 
चंद अहसान मुझ पे  करके ,वो खुद को खुदा समझते  हैं क्या करें  उन  बेपरवाहियों  का, जिनका आज भी असर है । 
मेरे भरोसे को इस तरहा संभाला उसने टूट कर कभी मुझको बिखरने न दिया । 
दिल्ली के दरियागंज इलाके में रविवार की रात बाइक से कार छू जाने  की मामूली सी घटना ने जिस तरह भयावह रूप धारण, किया इससे स्पष्ट पता लगाया जा सकता है कि आज कल लोगों में सहनशीलता व मानवीयता की कितनी कमी हो चुकी है । एक भौतिक  चीज़ क्या किसी इंसान के लिए इतनी महत्वपूर्ण  हो सकती है कि वह उसके लिए किसी व्यक्ति की हत्या कर दे । कोई मानव इतना क्रूर कैसे हो सकता है कि गाड़ी में  जरा सी खरोंच आने पर बदले की भावना में वह उस परिवार की समस्त ख़ुशियाँ  ही छीनने पर आमादा  हो जाये । इतना संकुचित दृष्टिकोण लेकर इंसानियत का अस्तित्व बरक़रार नहीं रखा जा सकता । कोई भी भौतिक चीज़ किसी इंसान के जीवन से अधिक मूल्यवान नहीं हो सकती । अपनी ख़ुशी के लिए किसी दूसरे की ख़ुशी मिटाना इंसानियत पर प्रश्नचिन्ह  लगा देता है ।   
बेशक़ीमती  हैं वो  रिश्ते जो ज़ज्बातों  की क़दर करते हैं वरना तो अब अपने भी हर मोड़ पर ग़ैरों की तरहा मिलते हैं । 
आलोचनाओं और गालियों के प्रभाव से यदि आप बचना चाहते हैं तो इन्हें स्वीकार करना बंद कर दें ,क्योंकि हम किसी चीज़ से प्रभावित तभी होते हैं जब हम उसे स्वीकार(  एक्सेप्ट ) कर लेते हैं । आप किसी गाली को स्वीकार तभी कर सकते हैं जब आप स्वयं को उसके लायक मान लेते हैं । 
एक आलोचक जब किसी की आलोचना करने पर उतारू  होता है तो इतनी तल्लीनता से करता है कि गैस पर रखा दूध कब मावे में तब्दील हो जाता है, उसे खबर ही नहीं लगती । 
हमे अपने सिद्धांत किसी डर या दूसरे के निर्णय से बदलने नहीं चाहिए ,हम मे  सही को सही व गलत को ग़लत कहने की   शक्ति होनी चाहिए । 
जो इंसान अपनी ग़लतियों को सहजता से स्वीकार कर लेता है वह महान होता है 
विनम्रता से झुका व्यक्ति, दंभ से  तन कर चलने वाले से कहीं ज्यादा आकर्षक लगता है। 
स्कूलों में  सूर्य पूजा व योग  की  अनिवार्यता  के ख़िलाफ़  उठने वाली आवाजों का कोई तार्किक कारण ही समझ  नहीं आ रहा है।   कैसी अज़ीब बात है कि लोग भगवान सूर्य देव को भी किसी धर्म विशेष से जोड़कर  देख रहें हैं । भगवान सूर्य देव किसी धर्म या व्यक्ति विशेष  के संरक्षक नहीं हैं ,वो  सभी को समान रौशनी  देते हैं । क्या कभी उन्होंने हिन्दू ,मुस्लिम ,सिख,ईसाई या अन्य किसी धर्म को  कम या  ज्यादा प्रकाश दिया है ? ऐसे ही योग ,यह तो एक प्राकृतिक व्यायाम है । शरीर को स्वस्थ रखने  का एक अध्यात्मिक उपाय है इससे किसी का कुछ बुरा नहीं वरन अच्छा ही होगा । कम  से कम सूर्य, चन्द्रमा ,तारों और आकाश को तो धर्म की सीमा से मुक्त रखें देशवासियों !जब किसी  भी धर्म के व्यक्ति के साथ  दुर्घटना होती है और खून की जरूरत होती है तब क्या ब्लड बैंक से ब्लड लेते वक्त बोतल के लेबल पर धर्म विशेष की जाँच  करके ही खून लिया जाता  है  ?।नहीं ! तब तो हमारा उद्देश्य व्यक्ति की जिंदगी को बचाना होता है...

लक्ष्य की प्राप्ति में साधन की पवित्रता का होना बहुत अहम है

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हर इंसान की ज़िन्दगी में कुछ तम्मनायें ,कुछ ख़्वाहिशें होती  हैं  जिनको पूरा करने के लिए वह हर संभव प्रयास करता है । कुछ लोग अपने लक्ष्य को पाने के लिए उचित व न्यायोचित मार्ग अपनाते हैं जबकि कुछ इसके लिए अपने धर्म ,मर्यादा व मानवीय मूल्यों को दाव पर लगा देते हैं । ऐसे लोगों पर मुझे तरस भी आता है और क्रोध भी। माना के  प्रसिद्धि पाना हर  इंसान का सपना होता है परन्तु इसके लिए अनुचित साधन अपनाना  एकदम ग़लत है । एक ग़रीब व्यक्ति यदि ख़ुद को अमीर बनाने के लिए चोरी  ,हत्या आदि घिनौने कृत्य   करता है तो वह अपना अगला जन्म  भी निष्चित रूप से ख़राब  करने जा रहा  है । इसके विपरीत  यदि वह परिश्रम कर ,ईमानदारी से थोड़ा -थोड़ा अर्जित करके जिंदगी में आगे बढ़ता है तो वह उस अमीर से कई गुना श्रेष्ठ है जो चोरी ,हिंसा आदि का सहारा लेकर एक उच्च पद पर आसीन  है । अर्थात लक्ष्य की प्राप्ति में साधन की पवित्रता  का होना  बहुत अहम  है ।  ऐसे अपराधी तत्त्व जो अपनी ख़ुशियों के लिए किसी  का  भी  अहित ...