संदेश

2022 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हर वक्त की खामोशी भी अच्छी नहीं होती

चित्र
घरेलु हिंसा या डोमेस्टिक वायलेंस एक ऐसी हिंसा है जो सार्वजनिक रूप से तो उजागर नहीं हो पाती है लेकिन भीतर ही भीतर इतनी मज़बूती से जम जाती है कि  इसके शिकार व्यक्ति की ज़िंदगी को  ये नर्क बना देती है। घरेलु हिंसा का सबसे दुःखद पहलू ये है कि इसमें व्यक्ति अपने ही घर में असुरक्षित और भयभीत सा महसूस करता है। वह अपने ही किसी रिश्तेदार के अत्याचार का शिकार होता है। वह चाहकर भी उसका विरोध नहीं कर पाता है। अपने परिवार की प्रतिष्ठा के लिए वह चुपचाप अपने को कुर्बान करने को तत्तपर रहता है। सब कुछ सुनकर ,सहकर देखकर भी अनजाना बना रहता है लेकिन ऐसा करना वास्तविकता में बहुत ग़लत है।  किसी के साथ अन्याय को करना व सहन करना  दोनों  ही  ग़लत बताये गए हैं । अगर किसी के साथ घर में कोई भी ऐसा व्यवहार हो रहा है जो नैतिक दृष्टि से ग़लत है तो उसे मत सहिये। स्वं विरोध कीजिये और संभव न हो तो कानून की मदद लीजिये। इस दुनिया में भगवान ने सभी को स्वतंत्र व सम्मान से जीने का हक़ दिया है। अगर कोई भी भावनात्मक तरीके से या अन्य किसी भी तरीके से तुम पर हावी होने की कोशिश कर रहा है तो उसका सामना कीजि...

बंधुत्व भाव हो तो युद्ध क्यों

चित्र
"सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।"    हम सब अगर विश्व बंधुत्व का भाव मन मे लेकर चलें और क्रोध,द्वेष,लोभ,वासना,नफरत इन 5 भावों का नाश कर लें तो पूरी दुनिया में किसी को सिक्योरिटी फोर्स की,किसी अस्त्र-शस्त्र की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. कितनी विचित्र सी बात है कि हम हर देश की  सीमा पर जो ये सीमा सुरक्षा बलों को देखते हैं इसके पीछे कहीं ना कहीं मूल कारण सम्पूर्ण मानव सभ्यता में प्रेम का अभाव और आपसी द्वेष-भाव ही है.अगर सभी में विश्व-बंधुत्व की भावना हो तो क्यों इतना भयग्रस्त रहें सब.क्यों परमाणु बम ,न्युक्लियर बम ,मिसाइल आदि विध्वंशात्मक चीजों के निर्माण पर,इनके संग्रह पर जोर दिया जाएगा. ज़रा ध्यान से सोचिये कि क्या  आज  पूरी दुनिया विध्वंश,हिंसा और द्वेष को बढ़ाने में नहीं लगी हुई है.हम सभी क्या  कभी ये सोचते हैं कि हम सभी पृथ्वी वासी उस परम सत्ता( प्रभु) के प्रति समान रुप से उत्तरदायी हैं.हमने भले ही अपनी बुद्धिनुसार अपनी अलग-अलग    सत्ताओं का निर्माण कर लिया हो पर हमारा (सम्पूर्ण सृष्टि) का राजा त...

सोचना तो पड़ेगा

चित्र
  बड़ी पीड़ादायक बात है कि समाज में कुछ व्यक्ति मर्यादा और अनुशासन को बोझ मान कर मनमानी स्वतन्त्रता और  उद्दन्डता के पक्षधर होते  जा रहे  है.ऐसा कोई भी आचरण ज़िसमे आत्मानुशासित होना पड़े उनको कष्टप्रद लग  रहा है.मानसिक पवित्रता गायब सी होती जा रही है.ये लोग बस भोग-विलास के लिए प्रयासरत है.नैतिकता की बात  इनके लिए मज़ाक से ज़्यादा कुछ नहीं हैं.संस्कारो की बात पिछड़ापन हैं,अवैज्ञानिक हैं.भलाई की बात करने वाला  इनका सबसे बडा शत्रु है .आध्यात्मिक बातें करने वाला इनकी दृष्टि में  सबसे बड़ा मनोरोगी है . अब ऐसे में सब कुछ उसी के ( प्रभु के) हाथ में है,उस परम सत्ता के. वरना सच कहूँ  तो इस समय समाज में कुछ  चीज़ें, बड़ी ही घृणास्पद व असहनीय घट रही हैं।  लिवइन रिलेशनशिप,रेप,हत्या इनसे सम्बंधित समाचार ही प्रमुखता से सब जगह पढ़ने और सुनने को मिल रहे हैं. मर्यादा  में  रहना  ऐसे लोगों  के लिए इतना मुश्किल हो रहा है कि ये लोग इस पीड़ा से बचने हेतु विभिन्न प्रकार की   सुविधा और स्वतन्त्रता हेतु अपने दिमाग का दुरूपयोग कर रहे हैं. ...

'सत्य ज्ञान'

चित्र
  अगर भरपूर संपत्ति होते हुए भी आपके मन में अशांति है तो वास्त्विकता में आप बहुत बड़े गरीब हैं ,अगर उच्च शिक्षित होते हुए भी आपको आध्यात्मिकता का ग्यान नहीं है तो आप अशिक्षित हैं.मनुष्य होकर भी आप अगर अपने भौतिक शरीर हेतु ही सब प्रयास कर रहें हैं और आत्मा हेतु नहीं तो आपका जीवन पशु से कदापि  भिन्न नहीं हैं.इसलिए मनुष्य देह रहते इस जीवन को प्रभु भक्ति और आध्यात्म में लगा लीजिए। हर कर्म प्रभु की खुशी हेतु करे.अगर जिंदगी में असली खुशी और शांति चाहते हो तो प्रभु की तरफ भागो भौतिक चीजों की तरफ नहीं. ।अगर जॉब प्राप्ति वाला ज्ञान असली ज्ञान होता तो आज सभी लोग सुखी होते मगर आज लोग जितने ज्यादा शिक्षित हैं उतने ही दुखी और असंतोष से ग्रसित हैं .सच तो ये है कि ये सही ज्ञान नहीं है ज्ञान वो है जो हमारा आत्मिक उत्थान करता है।जो प्रभु से हमें जोड़ता है। जो मनुष्य जन्म की सार्थकता हेतू हमें तैयार करता है।आपके पास जो भी प्रतिभा या ज्ञान है उसको प्रभु सेवा हेतु सबके कल्याण में लगा दोजिए। ईश्वर आपके ज्ञान को आध्यात्मिक और कल्याणकारी बना देंगे।

भौतिकता के परे सुकून

चित्र
  कितना असंतोष था पहले ज़िंदगी में कि ये अचीव नहीं किया ,वो अचीव  नहीं किया ,कुछ करना है ज़िंदगी में. नाम शोहरत ,पैसा और ज़्यादा हो.... कितनी तृष्णा थी मगर न जाने कैसे और  कब ईश्वर ने अपनी तरफ़ मुझे खींच लिया। सारी भौतिक इच्छाएँ धीरे -धीरे ख़त्म होती जा रही हैं। जो चीज़ें पहले मुझे आकर्षित करती थीं अब मुझ पर कोई प्रभाव नहीं डालती। किसी भौतिक चीज़ में मेरा आकर्षण नहीं रहा है अब हालाँकि भौतिक चीज़ों में मेरा आकर्षण पहले से ही काफ़ी कम रहा है लेकिन अब तो नीरसता सी ही पैदा हो गई है। बस सांसारिकता को निभाना एक कर्त्तव्य ,प्रभु की आज्ञा पालन और उनकी इच्छा का सम्मान करना मात्र  है।  अब आकर्षण है तो प्रभु भक्ति में ,उनकी कथा  सुनने में ,उनसे सम्बंधित किसी भी चर्चा में। उनके स्वरुप दर्शन में. अब तो बाक़ी सब चीज़ें पागलपन ,अज्ञानता से उपजी भटकन लगती हैं। सच में ईश्वर से प्रेम ,तुम्हें ये सिखा देता है कि उससे सुखद ,उससे प्यारा  ,उससे श्रेष्ठ कोई अहसास इस सृष्टि में नहीं है। सब चीज़ें ,व्यर्थ हैं। सारी उपलब्धियां कोई मायने नहीं रखती। इतने सुखद अहसास ,इतनी प्यारी अनुभूति से इत...

राम और कृष्ण को सही से जाने

चित्र
  भगवान राम और कृष्ण जी के (मनुष्य रूप में) जीवन के  विभिन्न दुख भरे प्रसंगों को जो उनके कर्म फल से जोड़ कर देखते हैं वो भूल रहे हैं कि प्रभु राम और कृष्ण सामान्य इंसान नहीं  भगवान हैं और कर्म फल भोगना तो सामान्य इंसान की नियति है.तो भगवान राम और कृष्ण जी के बारे में सही जानकारी प्राप्त करने के लिए रामचरितमानस और श्रीमद्भगवत् गीता को ज़रूर पढ़ना चाहिए,अन्यथा उनके ये विचार प्रभु के प्रति अपराध की श्रेणी में रखे जाएंगे. वास्त्विकता ये है कि सांसारिक  मनुष्यों को सही कर्म सम्बन्धी सही  दिशा निर्देशन देने  हेतु,भगवान  विभिन्न लीलाओं के माध्यम से उन्हे शिक्षित करने की कोशिश करते हैँ. कर्म फल भोगना तो इंसान का काम होता है. कृष्ण तो परम शक्ति हैं, कृष्ण तो  जगन्नाथ अर्थात सम्पूर्ण जगत के नाथ हैं.सृष्टि संचालक हैं ,और सृष्टि संचालक के लिए भी अगर कोई कर्म फल भोगने  जैसे भाव रखकर देखता है तो अल्पज्ञानी है वह व्यक्ति. कृष्ण और राम तो सृष्टि के पालन करता भगवान विष्णु के ही अवतार हैं। व स्वं  सृष्टि के पालन करता हैँ. जय श्री राधे कृष्णा 🙏  ...

'हाय -हाय छोड़ो '

चित्र
  हे सभी धार्मिक मनुष्यों !अगर आप अपनी भारतीय संस्कृति में विश्वास करते हो तो अब आप  अंग्रेजी  के 'हाय' शब्द  की जगह नमस्ते, जय श्री कृष्ण ,जय श्री राधे ,जय श्री राम  सम्बोधन का उपयोग करेंगे.वास्तव में कारण  ये  हैं कि  अंग्रेजी  का 'हाय' हिन्दी के 'हाय ' से पूर्णतया भिन्न है.मुझे मालूम है कि 'hi'  की फुल form  के हिसाब से ये शब्द ग़लत नहीं है इसका simple सा अर्थ है 'हाउ आर यू '= 'आप कैसे हैं'.लेकिन हिन्दी का 'हाय'  बहुत ही ग़लत या नेगेटिव शब्द है ज़िसका मतलब 'बद्दुआ' से होता है तो सुबह शाम इस तरह के नकारात्मक शब्द को अपनी ज़ुबान पर लाने से बचें.नमस्ते ,प्रणाम ,जय श्री कृष्णा,जय श्री राधे,जय श्री राम,आदि सम्बोधनों  को अपनायें.इसे पुराने, रूढ़ीवादी ,दकियानूसी विचारों का नाम देकर ये मत भूल जाना कि जीभा पर बार-बार आने वाला ग़लत शब्द कभी ना कभी ग़लत प्रभाव दिखा ही देता है.इसलिए जीभा पर अच्छे शब्द लायें व उन्ही का नित्य प्रयोग करें.एक तरफ जहां विदेशी लोग नमस्ते ,प्रणाम आदि शब्दों को अपनाने में गर्व का अनुभव कर रहे हैं वहीं हम अपन...

कुछ सवाल

चित्र
अगर आपके पास हैं उत्तर तो कृपया बताईये- पहला सवाल -  1.मधुमक्खी की उल्टी होते हुए भी शहद इतना पवित्र क्यों माना जाता है कि हर पूजा में ,प्रभु के अभिषेक में इसे प्रयोग में लिया जाता है... ??   दूसरा सवाल -  2.जब मृत्यु के बाद शरीर नष्ट हो जाता है और आत्मा दूसरे शरीर को धारण कर लेती है (सूक्ष्म शरीर 1वर्ष  बाद कर्म फल भोग कर मुक्त हो जाता है) तो  श्राद्ध  कर्म किसके लिए किये जाते हैं. तीसरा सवाल   3.जब मृत्यु के बाद इंसान का पूरा शरीर (मस्तिष्क) सहित नष्ट हो जाता है तो  पुनर्जन्म वाले व्यक्ति को पूर्व जन्म की याद किस माध्यम से रह जाती है. (इसका अर्थ है कि आत्मा ही इंसान की मूल संचालक है मस्तिष्क नहीं.)सभी information आत्मा में ही store होती

योगी

चित्र
धर्म हित एक 'योगी' स्व-अवस्था बदल सकता है अस्त-व्यस्त हो जो,व्यवस्था बदल सकता है  प्रचारित हो ग़लत,वो असत्य बदल सकता है मौन हो जहां धर्म,आक्रोश उगल सकता है   कौन कहता है योगी का कर्म सिर्फ 'योग' है                      परमार्थ हित एक योगी,सत्ता बदल सकता है.   -अंशु चौहान        

घातक है अधूरा ज्ञान

चित्र
अपूर्वः कोपि कोषोयं विद्यते  तव भारति,व्ययतो वृद्धिमायाति,क्षयमायाति संचयात।  इस श्लोक में कहा गया है कि विद्द्या रुपी ये जो ज्ञान का कोष है ये बड़ा अद्भुत है, इसे जितना ख़र्च किया जाता है  उतना ही बढ़ता है।अर्थात विद्द्या (ज्ञान) जितना बाँटा जाए उतना ही इनका फायदा रहता है,बांटने  वाले को भी और ग्रहण करने वाले को भी।बस इसमें सावधानी ये बरतनी होती है कि ये सही व तथ्य पर  आधारित होना चाहिए क्योंकि किसी भी चीज़ का  ग़लत ज्ञान,अर्थ का अनर्थ कर देता है।कई बार किसी बात,किसी  कहावत,किसी दोहा,किसी चौपाई का सही अर्थ नहीं लगाया जाता है और कुछ तर्कों को हम अपनी सुविधानुसार  अपने हिसाब से,अपने हित  में परिवर्तित भी कर लेते हैं।  ऐसे कई उदाहरण हैं जैसे - रामचरितमानस की इस चौपाई को ही ले लीजिए - ''प्रभु  भल कीन्ह,मोहि सिख दीन्हीं, मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही, ढोल,गवार ,शूद्र ,पशु , नारी सकल ताड़ना के अधिकारी''। उपर्युक्त चौपाई का अर्थ अधिकतर ग़लत ही समझा जाता है।यही कारण है कि इस चौपाई को लेकर नारी जाति में  विरोधी भावना उपजी हुई...

फ़िल्म निर्देशन और नैतिक दायित्व

चित्र
आधुनिक युग में मनोरंजन के बहुत से साधन उपलब्ध हैं। इसमें फ़िल्मे,वीडियो गेम्स ,मोबाइल गेम्स,आदि विशेष   भूमिका रखते हैं. फिल्मों का तो समाज के हर आयु-वर्ग पर बहुत  ज़्यादा  प्रभाव पड़ता है। फिल्म की कहानी, उसके गाने,उसके संवाद आदि  सभी  के मन मस्तिष्क पर इतना गहरा प्रभाव डालते हैं कि   बालक  और युवा वर्ग तो अपने  यथार्थ जीवन में कभी-कभी उसी के अनुरूप आचरण  भी करने लगते हैं।  फ़िल्मों  के फूहड़ गाने अक्सर किशोर और युवाओं की जुबां पर चढ़ जाते हैं.अक्सर वो इन्हे गुनगुनाते हुए मिल जाएँगे। ऐसे ही फिल्मों में प्रयुक्त गालियाँ  भी अधिकतर लोग अपना लेते हैं। फिल्म की कहानी  का असर दर्शकों के दिलों - दिमाग पर जो होता है,उसका पता भी  हॉल में दर्शकों की विविध  प्रतिक्रियाओं से हो जाता है. आक्रोश वाली फिल्म से सबका आक्रोश में आकर आक्रामक प्रतिक्रिया देना,भावुक सीन देखकर आंसू बहा देना आदि...| इसलिए  एक फिल्म निर्माता की समाज के प्रति ये बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है कि वह सही...

शत्रुता

चित्र
'शत्रुता' एक ऐसा भाव है जो यदि किसी के प्रति दिल में पनप जाए तो उससे कहीं ज़्यादा स्वं के लिए घातक  हो जाता है.ये ऐसा ज़हरीला भाव है जो सोचने समझने की क्षमता तक नष्ट कर देता है। विवेक हनन कर लेता है और सर पर बदला लेने का, खून सवार कर देता है। ये व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर बहुत ही प्रतिकूल प्रभाव डालता है. इस भाव की उत्पत्ति होती है इन छोटे-छोटे भावों से जैसे-द्वेष,ईर्ष्या,असंतोष,तिरस्कार,असहिष्णुता,अपेक्षा,उपेक्षा  आदि। इस  भाव से सबसे ज़्यादा हानि खुद ही की होती है,फिर भी क्षमाशीलताऔर क्रोध पर नियंत्रण की कमी के कारण  हम इसके दुष्परिणाम झेलने के लिए भी तैयार हो जाते हैं और इसके सामने आत्मसमर्पण कर देते हैं. इस भावना के वशीभूत इंसान अपने शत्रु का या तो शारीरिक या मानसिक रूप से बुरा करने पर उतारू हो जाता  है।  कई बार ये भाव किसी ग़लतफ़हमी से भी उत्पन्न हो जाता है जिसका व्यर्थ ही ख़ामियाज़ा उस निर्दोष को भुगतना  पड़ता है जो इस भाव का  बेवजह शिकार हो जाता है।  शत्रुता की वजह कुछ भी हो इसे दिल में जि...

'बढ़ती उम्र का दर्द'

चित्र
इंसान की असन्तोषी वृत्ति का कुछ नहीं किया जा सकता। बचपन में बड़े होने की इच्छा रखता है और जब बड़ा हो  जाता है तो बड़ा कहलाने से परहेज़ करता है। अंकल-आंटी जैसे  शब्द तो उसे गाली से लगने लगते हैं।   इन शब्दों ने तो इतनी बड़ी समस्या पैदा कर दी है कि कितना भी समझदार व्यक्ति इन्हे सुनकर भड़क उठता है।  और बोलने वाले भी कई बार इस बात का ध्यान नहीं रखते की इसे कहाँ प्रयोग करना है.हर व्यक्ति बिना कुछ सोचे  समझे इन्हे किसी भी व्यक्ति के लिए प्रयोग में ले लेता है।वह ये दिमाग भी लगाने की कोशिश नहीं करता की ये  शब्द अमुक व्यक्ति के लिए सही हैं भी या नहीं.यहाँ बड़े बच्चों द्वारा अपने दोस्त की मम्मी को भी आंटीऔर उनकी   सास को भी आंटी कहा जाता है.अब उम्र का इतना बड़ा अंतर और फिर भी सम्बोधन एक जैसा,निश्चित ही ये सोचने का विषय तो है. ये दादियों  के लिए तो गर्व की बात  हो जाती  है मगर बेचारी मम्मियों के लिए थोड़ा शर्मिन्दगी  पैदा  करने वाली  होती है। इस तरह से अंग्रेजी शब्दों की उपस्थित...

कविता (यूँही दिल को जलाने से क्या फ़ायदा..)

चित्र
यूँही दिल को जलाने से क्या फ़ायदा  उन पे तोहमत लगाने से क्या फ़ायदा  अश्क ही ना हों आँखों से गिरते अगर  सूखी आँखों से रोने से क्या फ़ायदा  ग़म ही ज़ाहिऱ हो सांसों की रफ़्तार से  चेहरे  की हरक़त छुपाने से क्या फ़ायदा  दिलज़लों की ना हालत सुधरती कभी  वैद हक़ीम को दिखाने से क्या फ़ायदा  न सलीका हो चाहत निभाने का तो  मुक़द्दर की बातों पे रोने से क्या फ़ायदा।  रंज़ -ओ -ग़म की ज़ुबाने कई और भी  खुद को गुमसुम दिखाने से क्या फ़ायदा  -अंशु चौहान   

'असंतोष '

चित्र
जब भी आपको अपने पास उपलब्ध किसी भी चीज़ से असंतोष उत्पन्न हो तो ये सोचकर देखें कि इससे बुरी भी तो हो सकती थी मगर आप हरवक्त उपलब्ध चीज़ से ज़्यादा अच्छी की कल्पना करते हैं और असंतोष की गिरफ्त् में आ जाते हैं.याद रहे आपको जो भी अर्जित होता है आपके ही संचित कर्मों से अर्जित होता है.अपने ही कर्मों से उपलब्ध व अर्जित किसी चीज़ के प्रति नकारात्मक नज़रिया आपके खुद के कर्मों के प्रति अस्वीकृति है.इसलिए अपने कर्मों को उत्कृष्ट बनाने की कोशिश करिये न की उपलब्ध चीजों के प्रति दुख,शोक और अस्वीकृति.हर व्यक्ति,हर वस्तु व व्यक्ति में तो perfection चाहता है परंतु उनका अधिकारी बनने हेतु अपने कर्मों में नहीं .तो अब अपने कर्मों की तरफ ध्यान दीजिए उपलब्ध चीजों की कमियों में नहीं.आप कमिया ही खोजते रहे तो फिर से अपने कर्म खराब करते जाएंगे क्योकि असंतोष से अपराध की उत्पत्ति होती है और अपराधी व्यक्ति तो ख़राब कर्म ही करेगा और ख़राब कर्म के रहते जीवन में कुछ अच्छा घटित होने की कल्पना करना  मूर्खता है .

'अविरल बहती धारा हूँ'

चित्र
अविरल बहती धारा  हूँ  ना  मुझमें तुम रुक पाओगे जितना मुझमें डूबोगे ,उतना ही खोते जाओगे  स्पंदन प्रखर हो जाएंगे ,शब्द  शून्य -प्राण  हो जाएंगे  खोकर मेरी स्मृतियोँ में ,भाव प्रबल हो जाएँगे  फिर हो स्वीकृत ,आभार रहित,आना   इस मन के प्रांगण में, अतिथि सा सहज मन भाव लिए,   अवसाद रहित अहसास लिए, स्व मत से  विलग हो जाओगे|     अविरल बहती धारा हूँ ना मुझमें तुम रुक पाओगे -अंशु चौहान

'भक्ति रस'

चित्र
  'भक्ति' सांसारिक मोह-माया से ग्रसित लोगों के लिए हास्यास्पद  व उपयोगिता शून्य हो सकती है परंतु जिसने इस रस का पान कर लिया है वही जान सकता है इसकी मधुरता व सांसारिक चीजों की रस हीनता .ये ऐसा भाव है जो ईश्वर की विशेष कृपा प्राप्त व्यक्तियों को ही मिलता है.ये बखान करने का नहीं अनुभव  करने का विषय है. भक्ति किसी भी व्यक्ति पर थोपी नहीं जा सकती.इसे तो सरल, भावुक ह्रदय व प्रभु प्रेमी ही समझ सकते हैं.ये तो वो दुर्लभ उपहार है जिसके आगे महंगे -महंगे रत्न तुच्छ लगने लगते हैं.जिसके आगे संसार की कोई चीज़ मोहक नहीं लगती है.ये तो वो नशा है जो महलों की रानी को सम्पूर्ण ऐशवर्य को ठुकराकर जोगन बनने को मजबूर कर दे.जो एक मूर्ख को विद्वान व  महाकवि बना दे.इसे तो ऐसे ही  कुछ विशिष्ट जन  प्राप्त कर पाते हैं अन्यथा तो अधिकतर प्राणी महामाया के आदेशनुसार चलकर सांसारिक चीजों के मोहपाश में बंधे रहते हैं.आधुनिक (कलयुगी लोगों ) की नज़र में 'भक्ति' हास्य ,निराशावाद (depression)और पिछड़ेपन से ज़्यादा कुछ नहीं है.मगर ये समझपाना इन लोगों के लिए इतना आसान नहीं है कि वास्त्विक सफलता ,आशा ,उन्न...

बुराई और कलियुग

चित्र
 कलियुग और बुराई का घनिष्ठ संबंध है .ये एक दूसरे के पूरक हैं.अगर बुराइयों का अस्तित्व न हो तो  कलियुग का अस्तित्व भी संभव नहीं है और कलयुग है तो बुराइयां होना भी स्वभाविक है। मोह और लोभ जैसी भावनाएं ही कलयुग में प्रबल होती हैं। 'मोह' सही और ग़लत का फ़र्क  करने से रोक देता है और विवेक हर लेता है।  मोह ही लोभ  पैदा करता है जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति कोई भी अपराध करने पर मज़बूर हो जाता है। लोभ इंसान में तृष्णा पैदा करता है ,असंतोष पैदा करता है।लोभ के वशीभूत इंसान  इन्द्रिय तृप्ति हेतु कुछ भी व कैसे भी पाने को उत्सुक रहता है। यही दोष कलयुग का अस्तित्व बनाये रखने में ज़िम्मेदार होते हैं। अगर हर व्यक्ति के मन से से ये दोष निकल जाएँ तो कोई बुराई ही नहीं रहेगी,अपराध नहीं होंगे और अपराध नहीं होंगे तो हर व्यक्ति हर वक़्त  सुरक्षित रहेगा। व्यवस्था  सुधारने हेतु किसी तंत्र की आवश्यकता  नहीं होगी।  वास्तव में बुराइयाँ  ही कलयुग  में सारी परस्थिति ऐसी विपरीत बना देती हैं कि इंसान इनमें उलझता जाता है। इन बुराइयों की वजह से...

गज़ल(अब उनकी किसी बात पर रूठना गुनाह हो गया है..)

चित्र
 अब उनकी किसी बात पर रूठना गुनाह हो गया है  . वो समझते हैं दिल को पत्थर टूटना गुनाह हो गया है। 1.अब खुद से ही धोखा करेंगे, हम अश्को को रोका करेंगे   क्यों बदलता है रुख हर नज़र में अपनी वफ़ा से ये पूछा करेंगे सवाल का जवाब बूझना भी अब तो गुनाह हो गया है 2.कुछ तो है टूटे दिल के भरम में, सांझ ढलती है मन के वहम में, रात में यूं तड़प कर, खुद को तन्हाई में खोजना गुनाह हो गया है . अब उनकी किसी बात पर रूठना गुनाह हो गया है। वो समझते है दिल को पत्थर टूटना गुनाह हो गया है। -  

'तेरी भक्ति में मैं '

चित्र
निर्लिप्त,निर्दोष,बेगुनाह हो गया हूँ  तेरी भक्ति से पाक-निगाह हो गया हूँ  लोभ,मोह,बेवजह का भटकाव मिट गया है   ज़िन्दगी की दुश्चिंताओं से बेपरवाह हो गया हूँ तू मुझमें जब से बैठा है सुकूँ बनके यकीं कर, मैं फ़कीरी में भी बादशाह हो गया हूँ  तुझसे मेरी नजरों का मिलना भी गज़ब था मोहब्बत में तेरी फनां हो गया हूँ शुरू तुझसे हुआ,खत्म भी तुझमें रहूँगा मैं दिल से तेरी पनाह हो गया हूँ मुझमें बाकी हैं अब क्या,चन्द सांसों का सफर है मेरी मंजिल तू ही,मैं आगाह हो गया हूँ.          - -अंशु चौहान                           

'चलती रहो ,निरंतर,अनवरत '

चित्र
रोज देखती हूँ नए सपने,रोज उठती हूँ मन में उत्साह लिए रखती हूँ हर कदम संभल के मंजिल के लिए,मगर मंजिल नहीं मिलती. खाली पन्नों पर बढ़ता जाता है भारी शब्दों का बोझ, उदास सी चलती है रफ्तार से दौड़ने वाली कलम. निचुड़ा हुआ दिल कोसता है ज़ज्बातों को, सयाना दिमाग संभाल लेता है सारी बिगड़ी बातों को . धैर्य,विवेक की बातें कर फिर खड़ा कर देता है मंजिल को दर्शाते पत्थर के पास,  यूँ कह कर कि अब शुरू करो विश्वास के, हौसले के साथ, हारोगी नहीं,पा लोगी उस मंजिल को, बस चलती रहो ,बिना रुके,निरंतर,अनवरत . -अंशु चौहान                                                                                        

'अल्फाजों को मुक्त कर दिया हमने'

चित्र
अल्फ़ाज़ों को मुक़्त कर दिया हमने  दिल ज़ज़्बातों से युक्त कर दिया हमने  सुबक कर भीगी आँखों से,अब लिखता होगा कुछ, कैसे पत्थर को नम कर दिया हमने  उसको होशियारी में जीना था,हमारी नादां सी फितरत थी, वो दिमाग में उलझा था, हम पर दिल की हुकूमत थी  कैसे बुद्धि को, दिल से कम कर दिया हमने, अल्फ़ाज़ों को मुक्त कर दिया हमने, दिल जज़्बातों से युक्त कर दिया हमने  गुरूर ये था कि झुकना नहीं है, किसी ज़ज्बाती के हाथों बिकना नहीं है  कैसे मगरूर को अरहम कर दिया हमने अल्फाजों को मुक्त कर दिया हमने दिल जज़्बातों से मुक़्त कर दिया हमने  -अंशु चौहान