संदेश

अप्रैल, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

'योग' पहले भी आज भी

चित्र
आज के युग में 'योग' का कितना महत्व है ये समझाने की आवश्यकता नहीं है। अस्वस्थ खान-पान और ख़राब जीवन -शैली के प्रभाव से आज हर दूसरा - तीसरा व्यक्ति बीमारियों की चपेट में है। ऐसे में योग ही एक मात्र वो उपाय है जो हम सब को स्वस्थ बनाए रख सकता है। योग पद्दति की उपादेयता वैसे तो प्राचीन काल से ही रही है लेकिन आधुनिक युग में इसकी ज़रुरत अपरिहार्य है। योग - भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रहें है। 'योग' एक ऐसी पद्दति है जिसमे शरीर ,मन और आत्मा एक -साथ जुड़ जाते हैं। योग गुरु बाबा रामदेव जी ने आधुनिक युग में इसकी जो महत्ता प्रतिपादित की है वो सराहनीय है। आज भारत में ही नहीं वरन अन्य देशों में भी 'योग' का महत्वपूर्ण स्थान है। अन्य देश भी इसके माध्यम से उत्तम स्वास्थ्य का लाभ ले रहे हैं। प्रधान -मंत्री नरेंद्र मोदी जी  ने योग की महत्ता को स्वीकार करते हुए ही '21 जून' को योग दिवस के रूप में मनाए जाने का प्रस्ताव रखा था जो पारित भी हो चुका  है। अब ये दिन योग दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज यदि हर व्यक्ति स्वयं को  मानसिक और शारीरिक रूप से निरोगी रखना चाह...

मुफ़लिसी

चित्र
मुफ़लिसी से परेशां मै भी हूँ तू भी है इन राहों पर क़दम तेरे भी है मेरे भी हैं   रख कर मेरे काँधे पर हाथ ,दोस्ती की क़सम ले ले  उस मंज़िल पर नज़र तेरी भी है मेरी भी है  चल आज अपने बस्तों में विश्वास की क़िताबें भर लें  बैग ख़ाली यूँ तो तेरा भी है मेरा भी है दोपहर के भोज की चिंता भी क्या करें हम ग़रीब  लंगर का ख़याल तुझे भी है मुझे  भी  है  ना तेरा कोई ठिकाना न मेरा कोई घर है  सड़कों के किनारे बिछौने की तलाश तुझे भी है मुझे भी है  उस 'रौशनी' में  रहने की तड़प कम नहीं होती ए दोस्त  इन अँधेरी गलियों से हैरान मै भी हूँ तू भी है।

'शिक्षण -संस्थाएँ और चिकत्सालय '

चित्र
शिक्षण -संस्थाएँ और चिकत्सालय दो ऐसी जगह हैं जहाँ से लोगों की उम्मीद ,उनका विश्वास और उनका भविष्य  जुड़ा होता है। ये वो जगह हैं जहाँ  किसी भी तरह का प्रलोभन या व्यक्तिगत स्वार्थ की वृत्ति यहाँ दाख़िल इंसान की  और उसके पूरे परिवार की ज़िंदगी को बर्वाद तक कर सकते हैं। शिक्षण संस्थाओं में अभिभावक अपने बच्चों को उज्ज्वल भविष्य हेतु प्रवेश दिलाते हैं।  अपने बच्चों के लिए सुनहरे सपने बुनते हैं।  इसके लिए वो कैसे भी करके इन स्कूलों की मोटी फीस भी चुकाते हैं। बच्चों की ख़ुशी के लिए वो अपने ख़र्चों में भी कमी कर देते हैं। ऐसे में इन संस्थाओं की ज़िम्मेदारी बनती है कि ये संस्थाएँ किसी भी प्रकार के प्रलोभन और स्वार्थ से ऊपर उठ कर अपने स्टूडेंट्स के भविष्य के बारे में सोचे। सभी विद्यार्थियों के प्रति निष्पक्ष रहें। स्कूल प्रशासन किसी भी तरह के लालच से ऊपर रहे। किसी भी तरह की  अनावश्यक शर्त  अपने विद्यार्थियों पर न थोपें।  ये संस्थाएँ  बच्चों के भविष्य पर फ़ोकस करें न कि अपनी संस्था के व्यावसायिक लाभ के प्रति।  यूनिफार्म या क़ित...

शाख़ से गिरे पत्ते

चित्र
वज़ूद पर मेरे उठने लगे हैं सवाल अब मै शाख़ पर जब तक था अच्छा था आतिशजनों ने समेट लिया ख़ाक में मिलाने के लिए मै बिखरा हुआ था जब बहुत अच्छा था  मुझ से ही इन शाख़ों की शान हुआ करती थी छाँव  में सभाएँ आम हुआ करती थीं सरे -राह भटक रहा हूँ जब से ज़र -ज़र हुआ मै पहले बहुत अच्छा था जब बच्चा था मन भी हरा-भरा था ,थी तन में संजीवनी हरियाली पीत -वर्ण हो झड़ रहा हूँ अब मै ख़ुश था जब शाख़ से टूटा नहीं था मिलने को हैं अब ख़ाक में मेरी सभी नेकियाँ देख कर हॅसने लगी हैं मुझको नई कोपलें मै ख़ुश था बहुत जब इन्होनें दंभ से मुझको देखा नहीं था।

बुढ़ापा

चित्र
उम्र के इस पड़ाव पर जिन्दगी थमी सी लगे है रिश्तों में मिठास की कमी सी लगे है  तमाम उम्र त्याग  किया जिनके लिए  आज उनसे ही आँखों में नमी सी लगे है  गुज़र गए जो पल आज के इंतज़ार में  आज उन्ही को पाने की मर्ज़ी सी लगे है  खत्म हो गयी है यूँ तो हर ख्वाहिश दिल की   ज़िन्दगी फिर भी तमन्नाओँ  की अर्ज़ी सी लगे है  किसी से कुछ कहने की ज़ुर्रत भी नहीं होती  इस ख़याल में ही जाने क्यों खुदगर्ज़ी सी लगे है  दिखाने को तो मीठा बोल लेते हैं लोग  दिल में मग़र सबके बेदर्दी सी लगे है  ये बुढ़ापा भी सचमुच सताता है कितना  आ जाए तो बस बेक़द्री सी लगे है ।

हसरतें

चित्र
                            हसरतें कब ज़मी पे पैर रख कर चला करती हैं कब अनजान राह पर चल कर सही मंज़िल मिला करती है करे तो करे जहाँ लाख सितम उन पर वक़्त आने पर सज़ा सबको मिला करती है मुद्द्तों से  नज़रे  उसके दीदार को तरसती थीं झुक जाती हैं अब शर्म से जब भी मिला करती है एक तेरी मोहब्बत की ख़ुशी क्या कम है कब ज़माने में सभी की मोहब्बत मिला करती है सहम जाते हैं  अक्सर जुदाई के डर से बड़ी मुश्किल से मिलन की रातें  मिला करती हैं ।

जीव हत्या

चित्र
एक निरीह ,बेज़ुबान पशु जो न किसी चीज़ का प्रतिरोध कर सकता है, न अपनी पीड़ा किसी को बता सकता है । जो न चाहते हुए भी अपनी गर्दन पर चाकू का बार झेलता है ,जो आंसू में न जाने कैसे इतना दर्द छुपाकर खुद को स्वयं पर बार करने वाले के सामने समर्पित कर देता है, कैसे रोक लूँ खुद को उसकी शहादत पर अश्क बहाने से । इन निरीह जानवरों का दर्द व आंसू मेरी आत्मा को कचौटते हैं  ,मुझे चैन से सोने नहीं देते ।   मैं तड़प उठती हूँ कहीं कटने के लिए जा रहे निःशब्द ,मासूम से पशुओं को देखकर । जी होता है कि किसी भी तरह इन्हें बचा लूँ और अभय दान देकर इनकी पीड़ा दूर कर दूं । कभी मन करता है कि ईश्वर काश मुझे ऐसी कुछ अद्भुत शक्तियां दे दे कि मैं इन भोले -भाले  जानवरो की किसी भी स्थान पर तुरंत मदद कर सकूँ। मुझे पता है ये असंभव है और इसके बिना मैं  कुछ कर भी नहीं सकती क्योंकि किसी भी गलत चीज़ को ग़लत साबित करना और उसका विरोध करना इस कलयुग में इतना आसान नहीं है।  आशा कि एक किरण दिखाई दी जब एक अख़बार में मैंने पढ़ा कि जोधपुर में एक ऐसी जगह (मोकलवास ) है जहाँ बकरों के लिए अद्भुत शरणगाह...

गिरिजा देवी मंदिर (उत्तराखंड)

चित्र
गिरिजा देवी मंदिर  ये है गिरिजा देवी  मंदिर। उत्तराखंड राज्य के बहुत ही  सुन्दर ,शांतिमय और मनोहारी वातावरण युक्त स्थान में ये मंदिर स्थापित है। ये मंदिर कोशी नदी के तट पर स्थित है। रामनगर  से 10 -15 किo मीo दूर ढिकाला मार्ग पर इस मंदिर की प्राकृतिक छटा अत्यंत मनमोहक है। जी चाहता है कि यहीँ बस जाओ। माँ गिरिजा देवी के इस मंदिर में लोगों की असीम आस्था है। माँ गिरिजा (गर्जिया )देवी गिरिराज हिमालय की पुत्री हैं और शिव भगवान की पत्नीहैं। कहा जाता है कि घने जंगलों से घिरा होने के कारण इस क्षेत्र में अक़्सर शेर या अन्य वन प्राणियों की दहाड़ ही सुनाई देती थी।  लेकिन मंदिर स्थापना के बाद अब लोग बड़ी श्रद्धा से और निर्भीक भाव से यहाँ दर्शन को आते हैं। एक बार कोशी नदी की बाढ़ में ऊपरी क्षेत्र से एक टीला और उसके साथ माँ की एक मूर्ति बह कर आ रही थी.टीले के साथ माँ की मूर्ति के करीब आते ही स्थानीय वन कर्मियों ने पाया कि उस मूर्ति में  एक शक्ति एक  सकारात्मक ऊर्जा थी।  अत: उन्होंने यहाँ एक मंदिर की स्थापना क...

क्या ये है नारी स्वतंत्रता

चित्र
  नारी स्वतंत्रता और अधिकारों की पक्षधर मै भी  रही हूँ।  मै मानती हूँ कि स्त्री को भी पहनने ,ओढ़ने  और शिक्षा आदि के क्षेत्र में पूरी छूट होनी चाहिए। उस पर अनावश्यक प्रतिबन्ध नहीं लगाने चाहिए लेकिन  कुछ नैतिक मर्यादाऒं  का निर्वहन तो उन्हें अवश्य ही करना चाहिए। साथ ही अपने परिवार वालों के विश्वास को बनाए रखना भी उनका एक आवश्यक दायित्व होना चाहिए । मै  देख रही हूँ कि बहुत सी जगह इस स्वतंत्रता का सही उपयोग नही हो रहा है। माँ-बाप से झूठ बोल कर क्लासेज बंक करना ,फिल्म देखने निकल जाना या पार्क में बैठ कर अपने पुरुष -मित्र के साथ अमर्यादित आचरण करना एकदम अशिष्ट और निंदनीय कृत्य हैं। स्त्री-पुरुष मित्रता ग़लत नहीं है। मगर इस मित्रता में मर्यादा और संस्कारों की अनदेखी निश्चित रूप से आलोचनीय है। दोनों का  ही आपसी व्यवहार  संयमित और गरिमामय होना चाहिए।  आज  की आधुनिक युवतियाँ स्वतंत्रता को सही अर्थ में नहीं ले रही हैं। अंग प्रदर्शन करने वाली पोशाक उन्हें इतना क्यों प्रभावित कर रही है ?कटी फटी जींस फ़ैशन का हिस्सा बता...

हास्य कल्पनायें

चित्र
आज मै ऊपर आसमां  नीचे, आज मै आगे जमाना है पीछे.. अरे..सँभलूँ   -कब से तार पे लटक रहा हूँ अब तो उतार लो भाई और कितना सुखाओगे ? -इसे कहते हैं वेट लिफ़्टिंग

नया सवेरा

चित्र
                                                      विस्मृत सी हो रही हैं  अतीत की यादें मेरे हिस्से में एक नया सवेरा है  ये जो गुमसुम सी लग रहीं हैं राहेँ नज़र तुमको                                                        इंतज़ार में उसी के निःशब्द हो रही हैं  वो रौशनी की किरण अब करीब ला रहा है  मिट रही है अतीत के अंधेरे की स्याही नई इबारत सी कोई लिखी जा रही है।

मेरी बेरुखी से कोई..( my quote)

चित्र
"मेरी बेरुख़ी से अगर कोई पथ-भ्रष्ट होने से बचता है तो मुझे मंज़ूर हैं वो तमाम इल्ज़ामात जो मुझे दंभी और ख़डूस  सिद्ध करते हैं"।(quote) _ ''इबारत सा पन्नों में  रहने दो,नज़र में ख़ुदा सा रहने दो, मुझसे हकीकत की आस ना रखो ,मुझे बस ख़्वाब सा रहने दो''। (शेर )

'वो नन्ही बच्ची'

चित्र
इसे बचकानी हरक़त कहें या अपनी उम्र से अधिक परिपक्वता लिए घर की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए, एक अबोध बालिका द्वारा की गई हठ। जो भी हो मग़र इस लड़की का ये प्रयास निश्चित रूप से सराहनीय है। तारीफ़ के काबिल है क्योंकि इस बच्ची की सोच सकारात्मक है तभी इसने चोरी जैसी दूसरी ग़लत चीज़ों में दिमाग़ न लगाकर ये मेहनत और ईमानदारी वाला कार्य चुना। ये नन्ही बालिका सुबह कुछ 'सहजन 'की फलियों को पेड़ से तोड़ कर एक सब्ज़ी वाले की तरह दुकान लगाकर पार्क में बैठ जाती है और वहाँ से गुज़र रहे हर शख़्स से ये फलियां ख़रीदने का अनुरोध करती है। यद्यपि सुबह से शाम तक उसके पात्र में मात्र 2 रुपए ही एकत्र हो पाते थे लेकिन जिंदगी में कुछ कर गुज़रने की, आगे बढ़ने की चाह इस बच्ची में स्पष्ट दिखाई दे रही थी .मेरे पूछने पर की तुम क्या बनना चाहती हो उसने बड़ी मासूमियत से कहा ड़ॉक्टर। घरों में काम करने वाली बाई जी की इस बेटी के हौसले बुलंद हैं। ये 3 भाई -बहन हैं। पिता इस दुनिया में नहीं हैं। शायद इसी मज़बूरी ने इसे इतना मानसिक- परिपक़्व बना दिया है। 

प्रतिरोध

चित्र
कई बार समेट लेती हूँ मन में उठे प्रतिरोध को दबा लेती हूँ क्रोध की अग्नि को सिर्फ़ इसलिए कि सयंमित और शांत रहना चाहती हूँ मग़र जब भी कुछ ग़लत होते हुए देखती हूँ तो एक शक्ति मेरे आक्रोश को उद्वेलित करती है तब मैं तोड़ देना चाहती हूँ उस वक़्त हर मानसिक बंधन को जो मज़बूर करते हैं मुझे उस ग़लत को सहन कर निर्विरोध रहने के लिए हाँ मुझमें आक्रोश है हर उस ग़लत विचार ,आलोचना ,परम्परा और अतार्किक हठ के लिए जो अनाधिकार अपना साम्राज्य फ़ैलाने की निरर्थक कोशिश करती जाती हैं ,और चाहती हैं कि मैं आत्म -समर्पण कर दूँ और एक शब्द न बोलूँ उस विरोध में।