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'अम्मा का दुलार '

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मिट्टी के उस आँगन में चूल्हे के पास बैठी हुई मेरी अम्मा के हाथों  में थमे थे चकला - बेलन, जिनसे  हर बार गोल रोटी बनकर मेरी थाली में आती थी। मुख पर लगी जूठन को जब अम्मा अपनी साड़ी के पल्लू से हटाती थी , उसके मैले -कुचैले पल्लू में  भी ममता की ख़ुशबू नज़र आती थी। अपनी गोद में बिठाकर उसका निबाले खिलाना वो गोद अम्मा की जन्नत नज़र आती थी। साग की कटोरी में मक्ख़न ढेर सारा खाना जब भी खिलाती थी वो यशोदा  बन जाती थी वो सबसे अलग थी ,अनूठी थी ,न्यारी थी उसकी डाट भी मधुर गीत सी लुभाती थी। ये उसकी ममता ,उसका दुलार ही  तो था  जो होकर सयानी भी मै बच्ची ही कहलाती थी। -अंशु  चौहान

पत्रकारिता 'लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ

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'पत्रकारिता 'लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है जो  कार्यपलिका ,व्यवस्थापिका और  न्यायपालिका  के  बाद  लोकतंत्र  में  महत्वपूर्ण  स्थान रखती  है .लोकतंत्र  को  सुदृढ  और  सशक्त  बनाये  रखने  में  इसकी  महत्वपूर्ण  भूमिका  होती  है . लेकिन  इसके  लिए पत्रकारिता  का  निष्पक्ष ,निडर व  मजबूत  होना  बहुत  ज़रूरी  है तभी  ये अपना  दायित्व  निष्ठा  के  साथ  निभा  पायेगी.   आज  के  परिप्रेक्ष्य में  यदि  देखें  तो एक  स्वतंत्र ,निष्पक्ष व  साहसी पत्रकारिता का  अस्तित्व  खतरे  में  है .पत्रकारों की जगह -जगह हो रही  नृशंस हत्या ,उन पर हो  रहे  आक्रमण व  अपमान जनक व्यवहार से केवल  पत्रकारिता ही  नही संपूर्ण  लोकतंत्र व  समग्र देश  ही खतरे में  है . जब  भी  निष्पक्ष  व  साहसी पत्रकार...

'पोको '(kitten)

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सर्दी के दिन थे.वो अपनी माँ के संग मेरे घर पर आया था .वो इतना छोटा सा और प्यारा था कि कोई भी सरल ह्रदय वाला व्यक्ति उसके मोह-पाश से बच नही सकता था.रंग तो साँवला था मगर आकर्षक बहुत था.उसकी माँ भी सुन्दर और गौर वर्ण की थी.सर्दी के मौसम की वजह से मन चाह रहा था कि उन दोनों के लिए घर में ही रहने की कोई व्यवस्था कर दी जाए मगर फिर इमोशन को कन्ट्रोल करते हुए सोच को व्यवहारिक किया. दरअसल ये माँ और बेटे एक बिल्ली और उसका बच्चा थे.खैर बिना ज्यादा दिमाग लगाए मैने उन दोनों  के लिए खाने -पीने का कुछ इंतजाम किया.उन दोनों के लिए दूध और बिस्किट उपलब्ध कराए गए, पर्याप्त न पड़ने पर चपाती भी बनाई गई . दोनों खा-पीकर बाहर ही खड़े स्कूटर  के कवर में दुबक कर सो गए.सुबह फिर दूध पीकर पता नही कहाँ चले जाते.अब रोज ये ही सिलसिला चलता रहा .बच्चा बड़ा हो रहा था और माँ का उसके  प्रति मोह कम .धीरे -धीरे दोनों में झगड़े शुरू हो गए दूध और इलाके को लेकर शायद.अब माँ चूँकी उसके प्रति क्रूर हो गई थी मैंने भी उसको दूध देना बंद कर दिया था क्योंकि अपनी माँ से डरा,सहमा वह कई बार पेड़ पर चढ़ने का दुस्साहस भी कर चुक...

'टोटके चौराहे के '

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  बीच चौराहे पर रखे हुये दिये,कुछ मिठाई,नीबू,मिर्च और भी न जाने क्या-क्या ऐसी ... ये किसी पंडित के  सुझाए कुछ नुस्ख़े हैं ,टोटके हैं विपदाओं से लड़ने के लिए जिन्हे अपनाकर हर कोई सुखी और सम्पन्न होना चाहता है. इसके  पीछे भावना है की मेरे ऊपर आई हर विपत्ति,हर बुरी नज़र इस चौराहे से गुज़र रहे व्यक्ति पर चली जाए।  कितनी घातक ,स्वार्थी और संकुचित सोच है इस कृत्य के पीछे। बस मेरा ही भला हो चाहे इसके लिए किसी की -भी ज़िंदगी दाव पर लग जाए। क्या ऐसे इंसान की वृत्ति ,उसकी भावना से ईश्वर अन्जान होंगे?  ये सब देखते  हुए भी क्या वो उस इंसान का हित करेंगे जो ऐसी कुत्सित मानसिकता रखता है। कदापि नहीं! ईश्वर ऐसे व्यक्ति की कभी नहीं सुनेंगे बल्कि एक और पाप -कर्म उसके खाते में जुड़ जाऐगा। हम इस हद तक स्वार्थी क्यों हो जाते हैं कि  दूसरे का अहित करते हुए भी हमारे हाथ नहीं काँपते, हमारी चेतना हमें धिक्कारती नहीं है ?माना के हर व्यक्ति सुखी रहना चाहता है। अपने परिवार को सुखी देखना चाहता है, उसके लिए उसे प्रयास भी करने चाहिए...

बेवज़ह

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कभी -कभी कुछ नहीं होता लिखने को जबकि मन भरा होता है न जाने कितने ही ख़यालों से कोई शब्द नहीं मिलता जबकि हज़ार शब्द होते हैं  शब्द -खाने में  बेकार की कोशिश में गुज़र जाता है दिन कोई नज़्म बनाने में  जबकि कोई लय ,कोई ताल नहीं मिलता  सुर सजाने  में।  गुज़रता जाता है वक़्त यूँही बेवजह ,बेलगाम,  रात भर जगती हूँ मै नींद को मनाने में।  ख़ाली पन्नों पर कुछ बिख़रे हुए अक्षर ,वक़्त  बड़ा लगता है  सबको ठिकाने लगाने में। बड़ी मुश्किल से कोई रचना गढ़ी जाती है और होश उड़ जाते हैं सब के ज़हन तक पहुँचाने में। -अंशु चौहान

काश

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कृष्ण युग की मैं भी कोई ,काश गोपिका होती धो -धो चरण अपने प्रभु के ,भर -भर पानी पीती सुन्दर उपवन ,मेरे मन का कोना -कोना होता मोह -माया, न जग का कोई रोना- धोना होता छीन मुरलिया कभी मै उनकी ,स्व अधरों से बजाती मोहित हो उनकी छवि से मधुर - मधुर धुन गाती होती इच्छा पल में पूरी ,ना कुछ कहना ,सुनना होता मेरे मन से ,उनका ऐसा गहरा रिश्ता होता उन  आँखों में ही जगती, उन आँखों में सो जाती भूल के सारी दुनिया -दारी बस उनकी हो जाती ।।

सहमा बचपन

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कुछ नापाक निगाहें अब बचपन पर 'आरी' हैं हिफाज़त मासूम दिलों की सबकी ज़िम्मेदारी है  दादी -नानी की परियों की कहानी अब ना इन्हें सुनानी हैं  झाँसी -रानी की वीर- गाथा अब इनको गुनगुनानी  है  खेल -खिलौने  नहीं अब कुंफू -कराटे की बारी है मासूमियत ख़तरे में है सतर्कता निभानी है निर्मम,निरंकुश ,बेख़ौफ़ दरिंदों से नेकी बचानी है ख़ौफ़  नहीं बस  अब हिम्मत दिखानी है। लुट रही हैं ज़िंदगियाँ निर्दोष भोली-भाली होठों पे बचपन के मुस्कान वापस लानी है। -अंशु चौहान

हिंदी के प्रति मेरा लगाव

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हिंदी भाषा के प्रति मै विशेष लगाव रखती हूँ-  पहला कारण तो ये कि देव भूमि उत्तराखंड से सम्बंध रखती हूँ । यहाँ सभी की हिंदी भाषा कुछ ज़्यादा ही अच्छी होती है इसलिए बचपन में घर के हर सदस्य का शुद्ध हिंदी में  वार्तालाप करना इसके लिए विशेष उत्तरदायी रहा है.  दूसरा कारण रहा हिंदी साहित्य में ग्रेजुएट होना। पोस्ट  ग्रेजुएशन में हालाँकि राजनीति विज्ञानं ने इसकी जगह ले ली थी फिर भी इस समय अंतराल में इस विषय ने मुझ पर  गहरा प्रभाव डाला। मेरे लेखन की शुरुआत इसी दौरान हुई।  हिंदी साहित्य के हर कवि और कवयित्री से  मै  बहुत  प्रभावित रही हूँ। उसी साहित्य का प्रभाव मेरी  भाषा में दिखाई देता है। मै इस भाषा की इतनी अभ्यस्त हो चुकी हूँ  कि  मै चाह कर भी सरल शब्द नहीं ढूँढ पाती और अनायास ही कुछ क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग अपनी भाषा में कर  बैठती हूँ।   मेरी क्लिष्ट भाषा पर अक्सर लोग स्तब्ध रह जाते हैं या प्रश्न खड़े कर देते हैं।कुछ मुस्कुराते हैं तो कुछ समझ नआने  पर परेशान हो जाते हैं। लेकिन मै अपने...

शिक्षक दिवस

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सभी आदरणीय शिक्षकों को शिक्षक दिवस की हार्दिक बधाई! आज शिक्षक दिवस के अवसर पर मस्तिष्क में  एक मंथन  सा चल रहा है। दो तरह के शिक्षक मुझे आज याद आ रहे हैं एक वो जो अपने हर शिष्य के उज्ज्वल भविष्य की कामना रखते हुए उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते  हैं । जो अपने कमज़ोर छात्र की  भी अन्य क्षमताओं को पहचान कर उसे  आगे  लाने  के लिए प्रयासरत रहते  हैं न कि  उसे डाट -पीट कर,उसकी उपेक्षा कर उसका मनोबल कमज़ोर करते  हैं. और जो  अयोग्य छात्र को भी योग्य बनाने की ताकत रखते  हैं ।  दूसरे  वो जिनका व्यक्तित्व अख़बारों के माध्यम से  सामने आता है कि अमुक अध्यापक ने प्रश्न का उत्तर न दिए जाने पर अपने छात्र को इतनी बुरी तरह पीटा कि छात्र बेहोश ही हो गया। ऐसे ही अन्य कई जो इस  तरह की  छोटी -छोटी बातों पर असहनीय दंड प्रदान करते हैं। अब शिक्षक तो दोनों ही हैं?लेकिन सच्चे अर्थों में शिक्षक दिवस का औचित्य किनके सन्दर्भ में है ये सर्वविदित है ही। एक योग्य शिक्षक में इतनी ताक़त होती है क...

'वो मजदूर है'

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मेहनत कर जो ख़ुश रहे, वो मजदूर है चटनी-रोटी से जो तृप्त रहे,वो मजदूर है थकान में जिसको राहत, वो  मजदूर है 'धरा' जिसका बिछौना,वो  मजदूर है कर्म से ही जिसको प्यार, वो मजदूर है दूर जिससे आलस्य, वो मजदूर है न होड़ अमीरी से जिसे,वो मजदूर है मज़बूत जिसका हौसला ,वो मजदूर है धूप और ताप से जो बेअसर, वो मजदूर है है तृष्णाओं से जो दूर ,वो मज़दूर है। तेरे  हर विश्राम में जो, वो मज़दूर है -अंशु चौहान

लो आज़ाद किया तुमको

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लो आज़ाद किया अब  तुमको अब ख़ुशबू बन बिखरो इन फ़िज़ाओं में मुझ में सिमट कर घुट जाओगे क्या रक्खा है इन सीमाओं में यहाँ तुम्हारे रूप-रंग की चर्चा नहीं करने वाला उस गुलशन की शान बनो तुम क्या रक्खा है फ़िज़ूल अदाओं में रख सकता हूँ अहसास तेरा तो उस दूरी से भी मै हरपल मुक्त करो ख़ुद को अब तो क्या रक्खा है इन सज़ाओं में बस गई है सुगंध यूँ तो तेरी हर शय में, हर पैमाने में जाने दो रुख़सत करता हूँ क्या रक्खा है इन सदाओं में।

कभी -कभी

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याद तो अब भी आते हो लेकिन पहले से बहुत कम कभी -कभी नींदे तो अब भी उड़ाते हो लेकिन पहले से बहुत कम कभी -कभी चाहत तो अब भी निभाते हो लेकिन पहले से बहुत कम कभी -कभी वो शोर ,वो बग़ावत तो अब भी है लेकिन पहले से बहुत कम कभी -कभी मिलने के बहाने तो अब भी बनाते हो लेकिन पहले से बहुत कम कभी -कभी आँखों में नमी, वो सिसकियाँ तो अब भी हैं लेकिन पहले से बहुत कम कभी -कभी सबके ताने तो अब भी सताते हैं लेकिन पहले से बहुत कम कभी -कभी रूठ जाऊँ तो मनाने अब भी आते हो लेकिन पहले से बहुत कम -कभी -कभी शिक़वे तो अब भी हैं लब पे लेकिन पहले से बहुत कम कभी -कभी उम्मीद मिलने की अब भी है लेकिन पहले से बहुत कम कभी -कभी मैं भी उलझती हूँ इन बातों में लेकिन पहले से बहुत कम कभी -कभी

मूक दर्शक

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कुछ नहीं बोलूँगी बस इतना कह दो कि मृत प्राय : हो चुकी हैं संवेदनाएँ तुम्हारी और अब अहसास भी नहीं होता किसी की पीड़ा का तुम्हे क्योंकि पत्थरों से सिर टकराने की आदत नहीं है मेरी। हर बात तुम तक पहुँचें पर प्रतिक्रिया शून्य हो तो समझा जा सकता है कि उस परिवेश से आगे निकल आए हो तुम जहाँ तुम्हें इंसानियत का अहसास था अब जीने लगे हो भाव-हीन ,निरंकुश ,निष्ठुर दुनिया में जहाँ कोई मानवीय पीड़ा ,कोई अनाचार तुम्हें व्याकुल नहीं करता किसी दुर्भाव से तुम्हें कोई रंजिश नहीं होती। इस नीरवता को धारण कर तुम ख़ुद को शांत और अहिंसक सिद्ध करना चाहते हो  तो जाओ  मै तुम्हें कायर ,धर्म -विमुख  और पलायनवादी घोषित करती हूँ। बोलो स्वीकार करते हो !  रहने दो ,बने रहो यूँही मूकदर्शक। -अंशु चौहान

ज़िद तो बस ज़िद है

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ज़िद तो बस ज़िद है कभी वाज़िब ,तो कभी वाज़िब नहीं होती कुछ जायज़ ,नाजायज़ तमन्नाओं का असर रखती है कभी उठा लेती है आसमान सर पर छोटी सी चीज़ पाने को तो कभी मचा देती है तूफ़ान नई क्रांति लाने को ये अपने मेहरवान पर जूनून सवार रखती है. ज़िद तो बस ज़िद है कभी वाज़िब, तो कभी वाज़िब नहीं होती। समन्दर ,नदी ,पहाड़ का भी रुख मोड़ दे जो शोर , आँसुओं की जुबां जिसके पास हो जमीं से आसमां तक फ़ैसले बदलने की ताक़त रखती है ज़िद तो बस ज़िद है कभी वाज़िब तो कभी वाज़िब नहीं होती। खिलौनों की दुकान में बच्चों की मनमानी तक गहनों -आभूषणों में  नारी की दीवानगी तक ऊँची क़ीमतों में भी ,क़ीमत अदा कराने  की मज़ाल रखती है ज़िद तो बस ज़िद है कभी वाज़िब तो कभी वाज़िब नहीं होती।

'भिंडी रही इठलाई'

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सारी सब्ज़ी औनी -पौनी ,भिंडी सबके मनको भाई छरहरी काया में सिमटी, बीच सब्ज़ी संग इठलाई। फ़ेरी वाले ने जैसे ही 'भिंडी 'की आवाज़ लगाई बच्चों ने ज़िद करके सुबह -शाम बनवाई। पूछो इनसे सब्ज़ी में ,क्या है आज बनाना झट बोलेंगे खाने में बस, भिंडी ही है खाना। टिंडे,कद्दू ,तुरई की अब तो, भैया शामत आई मुँह फुलाए बैठी हैं सब ,कोई इनको भी पूछो भाई। सारी सब्ज़ी करती हैं शिकायत ,भिंडी तूने की क्या चतुराई तुझ पर ही आ कर रुकते सब, हम तक नज़र ना आई। सब्ज़ी -मंडी ,गली ,मौहल्ले की रेड़ी  पर तूने ही धाक जमाई इस गर्मी में  बची -कुची सी, हम रही कुम्हलाई। -अंशु चौहान

भटकता पथिक

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मुझे बता ए पथिक ज़रा ,किस पथ पर तू चलता है पग -पग ठोकर ,दर्द बहुतेरे  पथरीली इन राहों पर, क्या ध्येय लिए निकलता है। आनी -जानी सी हैं सांसें ,ना देह तत्व अविनाशी है क्या पाने की इच्छा जग में, किस फल का अभिलाषी है। दलदल सा जग ,मृग -मरीचिका ,उतना धसता जितना रमता है नित्य नए -नए सपने बुनकर ,ख़ुद ही क्यूँ उलझता है। कभी आह्लादित ,कभी रुदन सा ,ये जीवन राग अनूठा है एक पल मीठा स्वाद है इसका, तो अगले पल खट्टा  है। नहीं कहती सब मोह त्याग दे ,कर्तव्यों का निर्वाह न कर लेकिन मुक्त वही यहाँ पर, जो प्रभु अनुचर हो भक्ति -पथ हेतु निकलता है।

उसूलों की ख़ातिर

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इस बेईमान दुनिया में कुछ ईमान तो रख. दे मगर, कुछ सामान अपने पास भी रख. छोड़ दे परवाह बेहिसाब  बंदिशों की दिल में सच्चाई का एक तूफ़ान तो रख. लोगों की नज़रों में उठने की परवाह फ़िज़ूल है ख़ुदा की निगाहों में स्वं को भला इंसान तो रख. रोकेंगी जमाने की गुस्ताख़ तोहमतें लेकिन  उसूलों के लिए ,मिटने की  एक आग तो रख। तू कल भी यहीं था ,आज भी यहीं है आगे बढ़ने की कुछ  शुरुआत तो रख।  मंज़िल क़रीब ही  है अब तेरी पाने  के दिल में अरमान तो रख।

उलझा मन

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ये ज़िंदगी का तज़ुर्बा हसीन,हर कोई बरख़ुरदार नहीं रखता। यहाँ हर शख़्स  कुछ अधूरी ख़्वाहिशें ,दिल में कुछ मलाल रखता है. हर कोई उलझा है हाथों की लक़ीरों में मुखौटो में छुपा के हर कोई अपना हाल रखता है. सामान बेशक़ीमती घरों में लेकिन मिज़ाज़  बीमार ,सेहत फटेहाल रखता है। टूटते हुए  रिश्तों  की बेचारगी सी लेकर खड़ा हो कटघरे में ,ख़ुद के लिए  कई सवाल रखता है। पहरेदारी है हक़ीक़त पर सपनों की बेहद भूत-भविष्य का जी को जंजाल रखता है। बिक चुका है आराम ख़ुद ही के हाथों से पाने का फिर भी उसी को ,नाहक ख़याल रखता है।

नेकी की राह

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हाथों में थाम कर चलते हैं नेक़ी, हल्की बहुत है ढोते क्यों बोझ बदी का ,भारी बहुत था।  उसकी पाक़ नसीहत अब  दिल में उतर गई है  आवारगी में भटकना मेरा शगल था। समेट कर अपने हिस्से की गुस्ताख़ियों को छोड़ आया हूँ जहाँ अँधेरा बहुत था। लौट आया हूँ रौशनी की उस राह पर मै मासूमियत का जहाँ सवेरा  बहुत था। ये जो मेरी रूह पर अमन का असर है आया है जहाँ से, सद्भावनाओं का बसेरा बहुत था।

बारिश

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काले -काले बादल नभ में ,घनघोर घटाएँ छाई हैं सावन की मतवाली बारिश हमें नहलाने आई है। मन है उमंगित ,धीर -अधीर सा,   गर्मी की सब अलसाई दूर भगाने को ठंडी फुहारों की आँगन में, भीनी ख़ुशबू आई है। बच्चों की एक टोली ने, 'नाव' सुघढ़ बनाई है चंचल बाल -मनों  में अब तो, भारी मस्ती छाई है। मोर ,पपीहा ,कोयल, मेंढ़क, सब जैसे बौराए हैं तपती धरा को बदरी ये काली, नीर थमाने आई हैं।

एक सोच देश -हित में

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क्यों दबी सी है एक आवाज़ ,जिसे गूँजना चाहिए है ये मौन क्यों अज़ीब सा,  बूझना चाहिए। एक सैलाब सा उमड़ा और बहा ले गया, घरौंदे अमन -चैन के कोई तो इंतज़ाम, सूझना चाहिए। विरोध हो ग़लत का तो सराहना सही का विरोध, रोकना चाहिए। बढ़ रही है आग क्यों ,जाति -धर्म भेद की देश क्या और किनसे है , कुछ तो सोचना चाहिए। है देश का वज़ूद और नाम, साथ हैं जब हम सभी बिखर गए तो भारत नहीं,अलग जाति -धर्म के बस समूह कहलाऐंगे। फूँक रहे  देश की संपत्ति जो, विद्रोह  के नाम पर  मंसूबों  से उन्हें क्षुद्र स्वार्थ त्यागना चाहिए।  मिट जायेंगे द्वेष -भाव सभी दिल से मानवता को व्यवहार में अपनाना चाहिए। देश की अखंडता के लिए धर्म -जाति में नहीं एकता-सूत्र में बंधना चाहिए।

'ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर'

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ओ  सी डी (ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर ) यदि आप अपनी कुछ आदतों को तारीफ़ के क़ाबिल समझते हैं तो अपनी ये ग़लत फ़हमी दूर कर लीजिए। क्योंकि कुछ आदतें तारीफ़ की नहीं वरन उपचार  की ज़रूरत रखती हैं।जी हाँ !आपकी कुछ आदतें जिन पर-   आप को गर्व  है वो डॉक्टर की  नज़र में किसी बीमारी के लक्षण भी हो सकते हैं।  हमारी कुछ आदतें ऐसी होती हैं जिन्हें हम सहज मानकर चलते हैं। लेकिन जब ये आदतें हमारे निज़ी -जीवन को असहज बनाकर समस्याएँ पैदा करने लगती   हैं तो इनको क़ाबू में करना ज़रूरी हो जाता है अन्यथा ये बीमारी का रूप ले लेती हैं।ऐसी ही आदतों का का नाम है -'ओ सी डी' बीमारी। एक ही काम को बार -बार करना ,बार -बार देखना कि काम सही से हुआ है या नहीं , बार-बार साबुन से हाथ धोना,कोई चीज़ सही जगह न होने पर आक्रामक हो जाना, फ़ालतू  चीज़ों को घर में-जमा किए रखना जैसे -पुराने कपड़े आदि,कई बार नहाना या घर की दिन में कई बार सफाई करते रहना आदि ओ सी डी के लक्षण हैं। ओ सी डी के कारण  -मस्तिष्क में ख़ास क़िस्म के एक रसायन(सेरेटोनिन )...

उसके हाथों में हम

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सांसें मेरी हिसाब वो रखता है बातें मेरी क़िताब वो रखता है बख़्शी है ज़िंदगी की सौग़ात उसने सबको छीन लेने का हक़  लेकिन खुद रखता है बनाकर जमीं पर खिलौना सभी को तमाशबीन सा मिज़ाज़ वो रखता है न मौत हाथ में है न ज़िंदगी किसी के समय पर पहरेदारी वो रखता है कैसे कह दूँ इस ज़िंदगी पर हक़ मेरा है  अधिकार सारे जब वो रखता है। न मायूस होने देता है न ख़ुश कभी ज़्यादा नाप -तौल  कर  हिदायतें वो रखता है।

'सास -बहु 'मंदिर या सहस्र-बाहु मंदिर

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ग्वालियर का 'सास -बहु ' मंदिर  'सास -बहु 'मंदिर के नाम से अक्सर लोग इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि ये मंदिर आपस में बहुत प्यार से रहने वाली किसी सास व बहु के आपसी प्यार और समर्पण को  दिखाने के लिए निर्मित किया गया होगा  लेकिन ऐसा नहीं है। ये मंदिर सास और बहु से सम्बंधित तो है परन्तु इसकी कहानी कुछ और है।राजस्थान के उदयपुर में ये मंदिर स्थित हैं। 10वीं सदी में  राजा महिपाल द्वारा उदयपुर में निर्मित करवाया  गया ये  मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। यह मंदिर उदयपुर से 23 किलो मीटर दूर नागदा ग्राम में राष्ट्रीय राजमार्ग 8 पर स्थित है। यह उदयपुर का प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। मंदिर दो संरचनाओं का बना हुआ है इनमे से एक का निर्माण सास व दूसरे का बहु द्वारा करवाया गया है। मंदिर में प्रवेश द्वार ,नक्काशीदार छत और बीच में कई खांचों वाली मेहराब है। मंदिर में एक वेदी ,एक पोर्च एक प्रार्थना सभा है। उदयपुर से मात्र 28 किलोमीटर पर एकलिंग जी भगवान का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है। इस मंदिर से थोड़ा पहले ही कच्चे रास्ते पर वास्तुकला का बे...

सास से साँस तक

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   एक साँस और दूसरा सास फ़र्क जरा सा लिखने में है लेकिन बड़ा  ये अंतर रखते हैं। एक जीवन के संचालन की ,दूज़ा प्राण हरण की ताकत रखते  हैं. निज संतान गुणों  का वर्णन  जहाँ सास मुक़्त कंठ से करती  हैं वहीँ  बहु की चुगली कर अक्सर , गुण ताक  में रखती है। बेटा मेरा समझदार है बहु  थोड़ी  नासमझ  सी  है जो भी हासिल है इस घर में ,मेरे पुत्र की उपलब्धि है। उसकी बहु  भर लाई गहने  मेरी तो रीती  सी है। पाली थी जो उम्मीदें रह गईं मन की  मन में क्या कहें जो हम पर बीती है। पहले तो शादी के लिए बेटे की, लड़की के टोटे पड़ते हैं बाद ब्याह के दे -दे ताने,  ऊँची -ऊँची फ़ेंका करते हैं। निज़ पुत्री ससुराल में जब ,दहेज़ यातना सहती है। तब इस माँ को अपनी  बहु की, पीर -वेदना दिखती है। बन बैठे असली माँ जो मन से, तब बहु  ना नज़र पराई आऐगी  अपनी माँ जैसा  अहसास ही बहु सासू -माँ  में पाऐगी।  गुण  देखो ,अवगुण न खोजो ...

प्यारे बुद्धा

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ज्ञान योग में डूबे बुद्धा ,महल -मोह से रिक्त ये बुद्धा विरक्ति की राह पे चलते ,जाने क्यों अच्छे लगते हैं।                                                            रास-रंग से विलग-थलग से ,ज्ञान-ललक में रमे -रचे से  सन्यासी के भाव-वेश में , जाने क्यों अच्छे लगते हैं।  मौन भाव से बैठे तप में ,मुक्त हुए से सब बंधन से  कुछ कहते से क्यों लगते हैं।  धीर -गंभीर ,मन मोहक से ,उजले -तन और उजले मन के  एक पवित्र ,दिव्य -प्रकाश की, ज्योति में निखरे जब  भी  मिलते हैं  परम -अलौकिक ,तत्व ज्ञान में लिप्त, मग्न से,  उच्च आकर्षण से ,वशीभूत करते लगते हैं।  -अंशु चौहान

म्याऊँ -म्याँऊ

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हिन्दू धर्म में बिल्ली को शुभ नहीं माना जाता है,इसके पीछे कोई तार्किक कारण शायद ही हो लेकिन अंध विश्वास निश्चित ही है। कितना अज़ीब है कि ईश्वर के बनाए हुए मासूम भोले जीवों को  भी शुभता और अशुभता से जोड़ दिया गया है। एक तरफ तो कहा जाता है कि प्रभु के बनाए हुए हर जीव में खुद प्रभु का वास होता है फिर ये भोले जीव कैसे अशुभ हो सकते हैं। मगर न चाहते हुए भी मन आशंकित हो जाता है जब इस तरह की मान्यताओं के वर्णन का दावा नारद पुराण अदि में होना बताया जाता है। नारद पुराण के अनुसार  यदि बिल्ली घर में बार -बार आने लगी है तो इसे अच्छा नहीं माना जाता है. कहा जाता है की ये पॉज़िटिव एनर्जी का नाश करती है और बीमारियाँ और अशुभता लाती है। दूसरी तरफ ये भी मान्यता है कि दीपावली के दिन अगर घर में बिल्ली आ जाए तो साक्षात् लक्ष्मी का घर में आगमन होता है।  ये कैसा विरोधाभास है अगर कोई चीज़ बाक़ी दिन में  अशुभ है तो एक विशेष दिन में शुभ कैसे  हो सकती है.आपकी स्वार्थी वृत्ति देखिए जिस दिन उससे आपका मतलब सिद्ध हुआ अर्थात जिस दिन वो धन देने वाली बनकर...

सोच उपहार की

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शादी ,जन्म दिन आदि समारोह में जाने के लिए हर कोई लालायित रहता है परन्तु जब बात 'गिफ्ट ' चयन की आती है तो सबके दिमाग में ख़लबली मच जाती है।क्या दें ,क्या न दें लोग बस यही सोचते रहते हैं।   परिवार के सदस्यों से ,आस -पड़ौस के लोगों से सलाह ,मशवरा लिया जाता है। फिर कुछ विकल्प सामने आते हैं जिनकी उत्पत्ति निम्न विचारों  से होती है -1 -जिस व्यक्ति को गिफ्ट दिया जा रहा है उससे सम्बन्ध कितने प्रगाढ़ हैं। 2 . उसने हमारे जन्म दिन पर या घर के किसी शादी या सगाई समारोह में कितना खर्च किया था। 3 . अपने अनुमान के आधार पर -  शायद अमुक चीज़ उसे इन वजहों से पसंद आएगी। 4 .अंतिम विचार -जो उपलब्ध है उसे ही किसी न किसी तरह चेप दिया जाए। कुछ लोगों का तो इस बारे में अलग ही फंडा होता है. ये लोग अपने परिचित सभी जनों की जन्म-तिथि की लिस्ट बना लेते हैं और किसी ऐसे मार्केट से जहाँ सस्ते दामों पर चीज़े मिलती हैं वहाँ से थोक में कुछ उपहार की  चीज़े ख़रीद कर रख लेते हैं।  फिर जन्म तिथि  के अनुसार देते जाते हैं। कुछ इन चीजों में दिमाग लगाना शायद मूर्खता सम...

चाँद ,बारिश ,और चाँदनी

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गर्मी से परेशान चाँद भी ,बाट जोह रहा बादल की  शीतलता  को तभी बढ़ाऊँ ,मेहर हो जब कुछ सावन की।  गौरी के सुन्दर मुखड़े को मेरी उपमा, देते  रहे हैं सभी कविगण  गढ़ न पाएँगे कोई कविता ,हुई जो सूरत काजल सी। कुछ बूंदों का करूँ आचमन,तन पर रख लूँ चादर ठंडे बादल की हो मतवाला खेलूँ लुकाछुपी ,ढूँढे चाँदनी मतवाली सी। मेरी चाँदनी में प्रेमी -गण ,गढ़ें कहानी ख़्वाबों की दो पल उनके साथ रहूँ फिर ,दूँ थोड़ी तन्हाई भी। अपनी चाँदनी को लेकर मै जाऊँ ,ले कुछ बूँदे बारिश की उसे भिगो दूँ ,कह भी दूँ ये ,तुम धुली -खिली सी रूपमती इस पागल की। -

फ़ोबिया

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हर इंसान ज़िंदगी में किसी न किसी भय से पीड़ित होता है। कितनी मुश्किल हो जाती है ज़िंदगी जब एक अज़ीब सा डर हर वक़्त इंसान के पीछे -पीछे चलता है। ये डर किसी भी तरह का हो सकता है। इस डर को दुर्भीति या (फ़ोबिया  )  कहा जाता है। सामान्य डर और फ़ोबिया  में ये अंतर होता है कि सामान्य डर को समझा कर या तर्क से  दूर किया जा सकता है जबकि फ़ोबिया  में इंसान का दिमाग़ किसी तर्क को ग्रहण करने की स्थिति में नहीं होता। फ़ोबिया में इंसान को किसी भी तरह का डर हो सकता है -जैसे मृत्यु का भय ,किसी के खो जाने का भय ,भीड़ का भय ,ऊँचाई का भय ,गहरे पानी का भय ,छोटी या बंद जगह का भय  , किसी विशेष जंतु से भय  आदि। ये सभी मानसिक विकार की श्रेणी में आते हैं। लेकिन शायद अधिकतर लोग  ही इन विकारों की चपेट में हैं।  फ़ोबिआ में व्यक्ति को विशेष क्रियाओं या वस्तुओं से भय लगने लगता है। व्यक्ति को उन काल्पनिक चीज़ों से भी भय पैदा होने लगता है जो होती ही नहीं हैं। या फिर ऐसी सामान्य सी परिस्थिति भी उसे असहज बना देती है जो दूसरों के लिए सामान्य होती है।...
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क़िस्मत अगर अच्छी हों तो किसी भी योनि में जीव सुख भोग सकता है। अन्यथा इंसान होकर भी कुछ सुख या सम्मान अर्जित नहीं कर सकता।  एक तरफ़ ग़रीबी की मार सहते, बीमारी से ग्रसित मनुष्य और दूसरी तरफ़  अपने मालिक की गाड़ियों में सैर-सपाटा करते ,मन -पसंद खाना खाने वाले वो कुत्ते। ये सब किस्मत का ही तो फ़र्क है। क़िस्मत अच्छी हो तो सड़क के आवारा कुत्ते भी  एक अपनत्व भरा नाम पाकर सम्मानित व स्थापित बन जाते हैं । जयपुर के इस  आवारा कुत्ते की क़िस्मत उन कई कंगाल ,बदहाल इंसानों से  बहुत ज़्यादा अच्छी थी जिन्हे सड़को पर ,रेल की पटरियों पर कोई भी गाड़ी कुचल कर चली जाती है। जो भूख से तड़प कर या किसी बीमारी से परेशान होकर अपने प्राण त्याग देते हैं। जिन्हे संभालने वाला या सहारा देने वाला कोई हाथ आगे नहीं बढ़ता।  फ़्रांस की रिसर्च स्कॉलर मरियम ने जयपुर के आवारा कुत्ते की किस्मत को कुछ इस तरह सँवारा कि दिमाग ये सोचने को मज़बूर हो जाता है  कि इंसान की योनि कुत्ते की योनि से श्रेष्ठ कैसे है? फ़्रांस की मरियम ने इस कुत्ते के ईलाज़ पर 7 लाख रूप...

'विरक्ति'

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 महलों में रहने वाला एक सुविधा संपन्न व्यक्ति क्यों अचानक विरक्त हो जाता है ये मै अब  अच्छे से जान गई हूँ। आप समझ ही गए होंगे मै किस के बारे में बात कर रही हूँ जी हाँ उन्ही  'महात्मा बुद्ध' के बारे में जो सारी सुख -सुविधाएँ व अपने परिवार का मोह छोड़ कर  ईश्वर - ज्ञान प्राप्ति  हेतु विरक्ति के मार्ग पर चल पड़े थे। सच कहूँ तो विरक्ति  एक ऐसा भाव है जो इंसान के भीतर उतर कर उसे ये आभास करा देता है कि चिर स्थाई जैसा इस दुनिया में कुछ भी नहीं है। मै ये नहीं कहती कि अपने दायित्वों को छोड़ कर उनकी तरह हमें भी विरक्ति के मार्ग को अपनाकर अपना घर- वार छोड़ देना चाहिए। हाँ परन्तु इस संसार में रहते हुए भी मन को सांसारिक बंधनों से विलग रखना चाहिए। किसी भी चीज़ में आसक्ति हमेशा दुःख का कारण बनती है। इसलिए हर कर्म आसक्ति रहित होना चाहिए।    सांसारिक बंधन ,भौतिक चीज़े ये सब क्षणिक सुख दे सकते  हैं। वास्तविक सुख तो उस अलौकिक जगत में व्याप्त उस शाश्वत सत्ता में है जिसे लोग ईश्वर कहते हैं।  वो एक ऐसा स्थाई ,सुखद सत्य है ...

'प्रकृति के आग़ोश में '

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ये तुम्हारे आगोश में आने की छटपटाहट है जिसने मेरा सुकूँ छीना है मै तुम्हारी हर शय के मोह पाश में बंधी हूँ तुम्हारे ये निर्मल जल-धार वाले झरने निःस्वार्थ भाव से बहती ये चंचल नदी दृढ़ -भाव से खड़े शक्ति -संपन्न ये पहाड़ मुझे इतना लुभाते हैं कि मै समग्र समर्पण कर इनके सानिध्य में ही बस जाना चाहती हूँ वाहनों के तीखे स्वर ,विषैले धुँए की घुटन मुझे अब व्याकुल करते हैं वो पक्षिओं का कलरव ,पेड़ -पौधों की शीतल छाया फूलों की मंद-मंद मुस्कान ,मुझे अपना गुलाम बना रहे हैं बस तुम्ही तो हो जिसके आगे मै झुककर स्वं को गौरवान्वित महसूस करती हूँ तुम मेरे अंदर जो ऊर्जा का संचार करती हो उससे मेरी उदासी दूर हो जाती है और मै खिल उठती हूँ तुम्हारी गोद में एक नन्हें बच्चे की तरह तृप्त होकर।।

'योग' पहले भी आज भी

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आज के युग में 'योग' का कितना महत्व है ये समझाने की आवश्यकता नहीं है। अस्वस्थ खान-पान और ख़राब जीवन -शैली के प्रभाव से आज हर दूसरा - तीसरा व्यक्ति बीमारियों की चपेट में है। ऐसे में योग ही एक मात्र वो उपाय है जो हम सब को स्वस्थ बनाए रख सकता है। योग पद्दति की उपादेयता वैसे तो प्राचीन काल से ही रही है लेकिन आधुनिक युग में इसकी ज़रुरत अपरिहार्य है। योग - भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रहें है। 'योग' एक ऐसी पद्दति है जिसमे शरीर ,मन और आत्मा एक -साथ जुड़ जाते हैं। योग गुरु बाबा रामदेव जी ने आधुनिक युग में इसकी जो महत्ता प्रतिपादित की है वो सराहनीय है। आज भारत में ही नहीं वरन अन्य देशों में भी 'योग' का महत्वपूर्ण स्थान है। अन्य देश भी इसके माध्यम से उत्तम स्वास्थ्य का लाभ ले रहे हैं। प्रधान -मंत्री नरेंद्र मोदी जी  ने योग की महत्ता को स्वीकार करते हुए ही '21 जून' को योग दिवस के रूप में मनाए जाने का प्रस्ताव रखा था जो पारित भी हो चुका  है। अब ये दिन योग दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज यदि हर व्यक्ति स्वयं को  मानसिक और शारीरिक रूप से निरोगी रखना चाह...

मुफ़लिसी

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मुफ़लिसी से परेशां मै भी हूँ तू भी है इन राहों पर क़दम तेरे भी है मेरे भी हैं   रख कर मेरे काँधे पर हाथ ,दोस्ती की क़सम ले ले  उस मंज़िल पर नज़र तेरी भी है मेरी भी है  चल आज अपने बस्तों में विश्वास की क़िताबें भर लें  बैग ख़ाली यूँ तो तेरा भी है मेरा भी है दोपहर के भोज की चिंता भी क्या करें हम ग़रीब  लंगर का ख़याल तुझे भी है मुझे  भी  है  ना तेरा कोई ठिकाना न मेरा कोई घर है  सड़कों के किनारे बिछौने की तलाश तुझे भी है मुझे भी है  उस 'रौशनी' में  रहने की तड़प कम नहीं होती ए दोस्त  इन अँधेरी गलियों से हैरान मै भी हूँ तू भी है।

'शिक्षण -संस्थाएँ और चिकत्सालय '

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शिक्षण -संस्थाएँ और चिकत्सालय दो ऐसी जगह हैं जहाँ से लोगों की उम्मीद ,उनका विश्वास और उनका भविष्य  जुड़ा होता है। ये वो जगह हैं जहाँ  किसी भी तरह का प्रलोभन या व्यक्तिगत स्वार्थ की वृत्ति यहाँ दाख़िल इंसान की  और उसके पूरे परिवार की ज़िंदगी को बर्वाद तक कर सकते हैं। शिक्षण संस्थाओं में अभिभावक अपने बच्चों को उज्ज्वल भविष्य हेतु प्रवेश दिलाते हैं।  अपने बच्चों के लिए सुनहरे सपने बुनते हैं।  इसके लिए वो कैसे भी करके इन स्कूलों की मोटी फीस भी चुकाते हैं। बच्चों की ख़ुशी के लिए वो अपने ख़र्चों में भी कमी कर देते हैं। ऐसे में इन संस्थाओं की ज़िम्मेदारी बनती है कि ये संस्थाएँ किसी भी प्रकार के प्रलोभन और स्वार्थ से ऊपर उठ कर अपने स्टूडेंट्स के भविष्य के बारे में सोचे। सभी विद्यार्थियों के प्रति निष्पक्ष रहें। स्कूल प्रशासन किसी भी तरह के लालच से ऊपर रहे। किसी भी तरह की  अनावश्यक शर्त  अपने विद्यार्थियों पर न थोपें।  ये संस्थाएँ  बच्चों के भविष्य पर फ़ोकस करें न कि अपनी संस्था के व्यावसायिक लाभ के प्रति।  यूनिफार्म या क़ित...

शाख़ से गिरे पत्ते

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वज़ूद पर मेरे उठने लगे हैं सवाल अब मै शाख़ पर जब तक था अच्छा था आतिशजनों ने समेट लिया ख़ाक में मिलाने के लिए मै बिखरा हुआ था जब बहुत अच्छा था  मुझ से ही इन शाख़ों की शान हुआ करती थी छाँव  में सभाएँ आम हुआ करती थीं सरे -राह भटक रहा हूँ जब से ज़र -ज़र हुआ मै पहले बहुत अच्छा था जब बच्चा था मन भी हरा-भरा था ,थी तन में संजीवनी हरियाली पीत -वर्ण हो झड़ रहा हूँ अब मै ख़ुश था जब शाख़ से टूटा नहीं था मिलने को हैं अब ख़ाक में मेरी सभी नेकियाँ देख कर हॅसने लगी हैं मुझको नई कोपलें मै ख़ुश था बहुत जब इन्होनें दंभ से मुझको देखा नहीं था।

बुढ़ापा

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उम्र के इस पड़ाव पर जिन्दगी थमी सी लगे है रिश्तों में मिठास की कमी सी लगे है  तमाम उम्र त्याग  किया जिनके लिए  आज उनसे ही आँखों में नमी सी लगे है  गुज़र गए जो पल आज के इंतज़ार में  आज उन्ही को पाने की मर्ज़ी सी लगे है  खत्म हो गयी है यूँ तो हर ख्वाहिश दिल की   ज़िन्दगी फिर भी तमन्नाओँ  की अर्ज़ी सी लगे है  किसी से कुछ कहने की ज़ुर्रत भी नहीं होती  इस ख़याल में ही जाने क्यों खुदगर्ज़ी सी लगे है  दिखाने को तो मीठा बोल लेते हैं लोग  दिल में मग़र सबके बेदर्दी सी लगे है  ये बुढ़ापा भी सचमुच सताता है कितना  आ जाए तो बस बेक़द्री सी लगे है ।

हसरतें

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                            हसरतें कब ज़मी पे पैर रख कर चला करती हैं कब अनजान राह पर चल कर सही मंज़िल मिला करती है करे तो करे जहाँ लाख सितम उन पर वक़्त आने पर सज़ा सबको मिला करती है मुद्द्तों से  नज़रे  उसके दीदार को तरसती थीं झुक जाती हैं अब शर्म से जब भी मिला करती है एक तेरी मोहब्बत की ख़ुशी क्या कम है कब ज़माने में सभी की मोहब्बत मिला करती है सहम जाते हैं  अक्सर जुदाई के डर से बड़ी मुश्किल से मिलन की रातें  मिला करती हैं ।

जीव हत्या

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एक निरीह ,बेज़ुबान पशु जो न किसी चीज़ का प्रतिरोध कर सकता है, न अपनी पीड़ा किसी को बता सकता है । जो न चाहते हुए भी अपनी गर्दन पर चाकू का बार झेलता है ,जो आंसू में न जाने कैसे इतना दर्द छुपाकर खुद को स्वयं पर बार करने वाले के सामने समर्पित कर देता है, कैसे रोक लूँ खुद को उसकी शहादत पर अश्क बहाने से । इन निरीह जानवरों का दर्द व आंसू मेरी आत्मा को कचौटते हैं  ,मुझे चैन से सोने नहीं देते ।   मैं तड़प उठती हूँ कहीं कटने के लिए जा रहे निःशब्द ,मासूम से पशुओं को देखकर । जी होता है कि किसी भी तरह इन्हें बचा लूँ और अभय दान देकर इनकी पीड़ा दूर कर दूं । कभी मन करता है कि ईश्वर काश मुझे ऐसी कुछ अद्भुत शक्तियां दे दे कि मैं इन भोले -भाले  जानवरो की किसी भी स्थान पर तुरंत मदद कर सकूँ। मुझे पता है ये असंभव है और इसके बिना मैं  कुछ कर भी नहीं सकती क्योंकि किसी भी गलत चीज़ को ग़लत साबित करना और उसका विरोध करना इस कलयुग में इतना आसान नहीं है।  आशा कि एक किरण दिखाई दी जब एक अख़बार में मैंने पढ़ा कि जोधपुर में एक ऐसी जगह (मोकलवास ) है जहाँ बकरों के लिए अद्भुत शरणगाह...

गिरिजा देवी मंदिर (उत्तराखंड)

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गिरिजा देवी मंदिर  ये है गिरिजा देवी  मंदिर। उत्तराखंड राज्य के बहुत ही  सुन्दर ,शांतिमय और मनोहारी वातावरण युक्त स्थान में ये मंदिर स्थापित है। ये मंदिर कोशी नदी के तट पर स्थित है। रामनगर  से 10 -15 किo मीo दूर ढिकाला मार्ग पर इस मंदिर की प्राकृतिक छटा अत्यंत मनमोहक है। जी चाहता है कि यहीँ बस जाओ। माँ गिरिजा देवी के इस मंदिर में लोगों की असीम आस्था है। माँ गिरिजा (गर्जिया )देवी गिरिराज हिमालय की पुत्री हैं और शिव भगवान की पत्नीहैं। कहा जाता है कि घने जंगलों से घिरा होने के कारण इस क्षेत्र में अक़्सर शेर या अन्य वन प्राणियों की दहाड़ ही सुनाई देती थी।  लेकिन मंदिर स्थापना के बाद अब लोग बड़ी श्रद्धा से और निर्भीक भाव से यहाँ दर्शन को आते हैं। एक बार कोशी नदी की बाढ़ में ऊपरी क्षेत्र से एक टीला और उसके साथ माँ की एक मूर्ति बह कर आ रही थी.टीले के साथ माँ की मूर्ति के करीब आते ही स्थानीय वन कर्मियों ने पाया कि उस मूर्ति में  एक शक्ति एक  सकारात्मक ऊर्जा थी।  अत: उन्होंने यहाँ एक मंदिर की स्थापना क...