सोचना तो पड़ेगा
बड़ी पीड़ादायक बात है कि समाज में कुछ व्यक्ति मर्यादा और अनुशासन को बोझ मान कर मनमानी स्वतन्त्रता और उद्दन्डता के पक्षधर होते जा रहे है.ऐसा कोई भी आचरण ज़िसमे आत्मानुशासित होना पड़े उनको कष्टप्रद लग रहा है.मानसिक पवित्रता गायब सी होती जा रही है.ये लोग बस भोग-विलास के लिए प्रयासरत है.नैतिकता की बात इनके लिए मज़ाक से ज़्यादा कुछ नहीं हैं.संस्कारो की बात पिछड़ापन हैं,अवैज्ञानिक हैं.भलाई की बात करने वाला इनका सबसे बडा शत्रु है .आध्यात्मिक बातें करने वाला इनकी दृष्टि में सबसे बड़ा मनोरोगी है . अब ऐसे में सब कुछ उसी के ( प्रभु के) हाथ में है,उस परम सत्ता के. वरना सच कहूँ तो इस समय समाज में कुछ चीज़ें, बड़ी ही घृणास्पद व असहनीय घट रही हैं। लिवइन रिलेशनशिप,रेप,हत्या इनसे सम्बंधित समाचार ही प्रमुखता से सब जगह पढ़ने और सुनने को मिल रहे हैं. मर्यादा में रहना ऐसे लोगों के लिए इतना मुश्किल हो रहा है कि ये लोग इस पीड़ा से बचने हेतु विभिन्न प्रकार की सुविधा और स्वतन्त्रता हेतु अपने दिमाग का दुरूपयोग कर रहे हैं. ...