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सोचना तो पड़ेगा

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  बड़ी पीड़ादायक बात है कि समाज में कुछ व्यक्ति मर्यादा और अनुशासन को बोझ मान कर मनमानी स्वतन्त्रता और  उद्दन्डता के पक्षधर होते  जा रहे  है.ऐसा कोई भी आचरण ज़िसमे आत्मानुशासित होना पड़े उनको कष्टप्रद लग  रहा है.मानसिक पवित्रता गायब सी होती जा रही है.ये लोग बस भोग-विलास के लिए प्रयासरत है.नैतिकता की बात  इनके लिए मज़ाक से ज़्यादा कुछ नहीं हैं.संस्कारो की बात पिछड़ापन हैं,अवैज्ञानिक हैं.भलाई की बात करने वाला  इनका सबसे बडा शत्रु है .आध्यात्मिक बातें करने वाला इनकी दृष्टि में  सबसे बड़ा मनोरोगी है . अब ऐसे में सब कुछ उसी के ( प्रभु के) हाथ में है,उस परम सत्ता के. वरना सच कहूँ  तो इस समय समाज में कुछ  चीज़ें, बड़ी ही घृणास्पद व असहनीय घट रही हैं।  लिवइन रिलेशनशिप,रेप,हत्या इनसे सम्बंधित समाचार ही प्रमुखता से सब जगह पढ़ने और सुनने को मिल रहे हैं. मर्यादा  में  रहना  ऐसे लोगों  के लिए इतना मुश्किल हो रहा है कि ये लोग इस पीड़ा से बचने हेतु विभिन्न प्रकार की   सुविधा और स्वतन्त्रता हेतु अपने दिमाग का दुरूपयोग कर रहे हैं. ...

'सत्य ज्ञान'

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  अगर भरपूर संपत्ति होते हुए भी आपके मन में अशांति है तो वास्त्विकता में आप बहुत बड़े गरीब हैं ,अगर उच्च शिक्षित होते हुए भी आपको आध्यात्मिकता का ग्यान नहीं है तो आप अशिक्षित हैं.मनुष्य होकर भी आप अगर अपने भौतिक शरीर हेतु ही सब प्रयास कर रहें हैं और आत्मा हेतु नहीं तो आपका जीवन पशु से कदापि  भिन्न नहीं हैं.इसलिए मनुष्य देह रहते इस जीवन को प्रभु भक्ति और आध्यात्म में लगा लीजिए। हर कर्म प्रभु की खुशी हेतु करे.अगर जिंदगी में असली खुशी और शांति चाहते हो तो प्रभु की तरफ भागो भौतिक चीजों की तरफ नहीं. ।अगर जॉब प्राप्ति वाला ज्ञान असली ज्ञान होता तो आज सभी लोग सुखी होते मगर आज लोग जितने ज्यादा शिक्षित हैं उतने ही दुखी और असंतोष से ग्रसित हैं .सच तो ये है कि ये सही ज्ञान नहीं है ज्ञान वो है जो हमारा आत्मिक उत्थान करता है।जो प्रभु से हमें जोड़ता है। जो मनुष्य जन्म की सार्थकता हेतू हमें तैयार करता है।आपके पास जो भी प्रतिभा या ज्ञान है उसको प्रभु सेवा हेतु सबके कल्याण में लगा दोजिए। ईश्वर आपके ज्ञान को आध्यात्मिक और कल्याणकारी बना देंगे।