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'टोटके चौराहे के '

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  बीच चौराहे पर रखे हुये दिये,कुछ मिठाई,नीबू,मिर्च और भी न जाने क्या-क्या ऐसी ... ये किसी पंडित के  सुझाए कुछ नुस्ख़े हैं ,टोटके हैं विपदाओं से लड़ने के लिए जिन्हे अपनाकर हर कोई सुखी और सम्पन्न होना चाहता है. इसके  पीछे भावना है की मेरे ऊपर आई हर विपत्ति,हर बुरी नज़र इस चौराहे से गुज़र रहे व्यक्ति पर चली जाए।  कितनी घातक ,स्वार्थी और संकुचित सोच है इस कृत्य के पीछे। बस मेरा ही भला हो चाहे इसके लिए किसी की -भी ज़िंदगी दाव पर लग जाए। क्या ऐसे इंसान की वृत्ति ,उसकी भावना से ईश्वर अन्जान होंगे?  ये सब देखते  हुए भी क्या वो उस इंसान का हित करेंगे जो ऐसी कुत्सित मानसिकता रखता है। कदापि नहीं! ईश्वर ऐसे व्यक्ति की कभी नहीं सुनेंगे बल्कि एक और पाप -कर्म उसके खाते में जुड़ जाऐगा। हम इस हद तक स्वार्थी क्यों हो जाते हैं कि  दूसरे का अहित करते हुए भी हमारे हाथ नहीं काँपते, हमारी चेतना हमें धिक्कारती नहीं है ?माना के हर व्यक्ति सुखी रहना चाहता है। अपने परिवार को सुखी देखना चाहता है, उसके लिए उसे प्रयास भी करने चाहिए...

बेवज़ह

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कभी -कभी कुछ नहीं होता लिखने को जबकि मन भरा होता है न जाने कितने ही ख़यालों से कोई शब्द नहीं मिलता जबकि हज़ार शब्द होते हैं  शब्द -खाने में  बेकार की कोशिश में गुज़र जाता है दिन कोई नज़्म बनाने में  जबकि कोई लय ,कोई ताल नहीं मिलता  सुर सजाने  में।  गुज़रता जाता है वक़्त यूँही बेवजह ,बेलगाम,  रात भर जगती हूँ मै नींद को मनाने में।  ख़ाली पन्नों पर कुछ बिख़रे हुए अक्षर ,वक़्त  बड़ा लगता है  सबको ठिकाने लगाने में। बड़ी मुश्किल से कोई रचना गढ़ी जाती है और होश उड़ जाते हैं सब के ज़हन तक पहुँचाने में। -अंशु चौहान