संदेश

मार्च, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
आलोचनाओं और गालियों के प्रभाव से यदि आप बचना चाहते हैं तो इन्हें स्वीकार करना बंद कर दें ,क्योंकि हम किसी चीज़ से प्रभावित तभी होते हैं जब हम उसे स्वीकार(  एक्सेप्ट ) कर लेते हैं । आप किसी गाली को स्वीकार तभी कर सकते हैं जब आप स्वयं को उसके लायक मान लेते हैं । 
एक आलोचक जब किसी की आलोचना करने पर उतारू  होता है तो इतनी तल्लीनता से करता है कि गैस पर रखा दूध कब मावे में तब्दील हो जाता है, उसे खबर ही नहीं लगती । 
हमे अपने सिद्धांत किसी डर या दूसरे के निर्णय से बदलने नहीं चाहिए ,हम मे  सही को सही व गलत को ग़लत कहने की   शक्ति होनी चाहिए । 
जो इंसान अपनी ग़लतियों को सहजता से स्वीकार कर लेता है वह महान होता है 
विनम्रता से झुका व्यक्ति, दंभ से  तन कर चलने वाले से कहीं ज्यादा आकर्षक लगता है। 
स्कूलों में  सूर्य पूजा व योग  की  अनिवार्यता  के ख़िलाफ़  उठने वाली आवाजों का कोई तार्किक कारण ही समझ  नहीं आ रहा है।   कैसी अज़ीब बात है कि लोग भगवान सूर्य देव को भी किसी धर्म विशेष से जोड़कर  देख रहें हैं । भगवान सूर्य देव किसी धर्म या व्यक्ति विशेष  के संरक्षक नहीं हैं ,वो  सभी को समान रौशनी  देते हैं । क्या कभी उन्होंने हिन्दू ,मुस्लिम ,सिख,ईसाई या अन्य किसी धर्म को  कम या  ज्यादा प्रकाश दिया है ? ऐसे ही योग ,यह तो एक प्राकृतिक व्यायाम है । शरीर को स्वस्थ रखने  का एक अध्यात्मिक उपाय है इससे किसी का कुछ बुरा नहीं वरन अच्छा ही होगा । कम  से कम सूर्य, चन्द्रमा ,तारों और आकाश को तो धर्म की सीमा से मुक्त रखें देशवासियों !जब किसी  भी धर्म के व्यक्ति के साथ  दुर्घटना होती है और खून की जरूरत होती है तब क्या ब्लड बैंक से ब्लड लेते वक्त बोतल के लेबल पर धर्म विशेष की जाँच  करके ही खून लिया जाता  है  ?।नहीं ! तब तो हमारा उद्देश्य व्यक्ति की जिंदगी को बचाना होता है...

लक्ष्य की प्राप्ति में साधन की पवित्रता का होना बहुत अहम है

चित्र
हर इंसान की ज़िन्दगी में कुछ तम्मनायें ,कुछ ख़्वाहिशें होती  हैं  जिनको पूरा करने के लिए वह हर संभव प्रयास करता है । कुछ लोग अपने लक्ष्य को पाने के लिए उचित व न्यायोचित मार्ग अपनाते हैं जबकि कुछ इसके लिए अपने धर्म ,मर्यादा व मानवीय मूल्यों को दाव पर लगा देते हैं । ऐसे लोगों पर मुझे तरस भी आता है और क्रोध भी। माना के  प्रसिद्धि पाना हर  इंसान का सपना होता है परन्तु इसके लिए अनुचित साधन अपनाना  एकदम ग़लत है । एक ग़रीब व्यक्ति यदि ख़ुद को अमीर बनाने के लिए चोरी  ,हत्या आदि घिनौने कृत्य   करता है तो वह अपना अगला जन्म  भी निष्चित रूप से ख़राब  करने जा रहा  है । इसके विपरीत  यदि वह परिश्रम कर ,ईमानदारी से थोड़ा -थोड़ा अर्जित करके जिंदगी में आगे बढ़ता है तो वह उस अमीर से कई गुना श्रेष्ठ है जो चोरी ,हिंसा आदि का सहारा लेकर एक उच्च पद पर आसीन  है । अर्थात लक्ष्य की प्राप्ति में साधन की पवित्रता  का होना  बहुत अहम  है ।  ऐसे अपराधी तत्त्व जो अपनी ख़ुशियों के लिए किसी  का  भी  अहित ...