'प्रदूषित सोच'
लिव इन रिलेशन-शिप,समलैंगिक विवाह जैसी बेहुदी धारणाओं को हम भारवर्ष के लोग आखिर इतनी आसानी से स्वीकार कैसे कर रहे हैं.क्या किसी को भी ये घ्रणित नहीं लगतीं ? क्यों और किसके दिमाग में पैदा हो रही है य़े गंदगी ?कहां से आ रही हैं ये धारणाएं. क्या अच्छे-बुरे का अंतर करने की क्षमता सभी की नष्ट हो चुकी है ? क्या पवित्र बुद्धि वाले, आध्यात्मिक लोग भी इन चीजों को सहजता से ले चुके हैं ,अगर नहीं तो क्यों इस तरह की चीजें खत्म नहीं हो रही बल्कि बढ़ती जा रही हैं.क्यों पहले से ही इनका विरोध नहीं किया जाता?क्यों नहीं अस्वीकार की जाती पहले से ही इस तरह की बाह्यात विचारधारायें? कितने अफ़सोस की बात है की 'लिट्रेचर फेस्टीवल' जैसी जगहों पर ऐसे हास्यास्पद विषयों की चर्चा बड़ी गंभीरता से और इस विषय के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हुये की जाती है. कितनी विचित्र बात है कि जो विषय भारत की संस्कृति में कभी स्वीकार्य ही नहीं होना चाहिए उसके पक्ष में चर्चा की जाती है.ये कल्युग का ही प्रभाव हो सकता है वरना इन विषयों का पक्षधर तो कोई होना ही नहीं चाहिये. कुछ तो पवित्र रहने दो इस सृष्टि में.घुटन मत पैदा करो...