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'प्रदूषित सोच'

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  लिव इन रिलेशन-शिप,समलैंगिक विवाह जैसी बेहुदी धारणाओं को हम भारवर्ष के लोग आखिर इतनी आसानी से स्वीकार कैसे कर रहे हैं.क्या किसी को भी ये घ्रणित नहीं लगतीं ? क्यों और किसके दिमाग में पैदा हो रही है य़े गंदगी ?कहां से आ रही हैं ये धारणाएं. क्या अच्छे-बुरे का अंतर करने की क्षमता सभी की नष्ट हो चुकी है ? क्या पवित्र बुद्धि वाले, आध्यात्मिक लोग भी इन चीजों को सहजता से ले चुके हैं ,अगर नहीं तो क्यों इस तरह की चीजें खत्म नहीं हो रही बल्कि बढ़ती जा रही हैं.क्यों पहले से ही इनका विरोध नहीं किया जाता?क्यों नहीं अस्वीकार की जाती पहले से ही इस तरह की बाह्यात विचारधारायें? कितने अफ़सोस की बात है की 'लिट्रेचर फेस्टीवल' जैसी जगहों पर ऐसे हास्यास्पद विषयों की चर्चा बड़ी गंभीरता से और इस विषय के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हुये की जाती है. कितनी विचित्र बात है कि जो विषय भारत की संस्कृति में कभी स्वीकार्य ही नहीं होना चाहिए उसके पक्ष में चर्चा की जाती है.ये कल्युग का ही प्रभाव हो सकता है वरना इन विषयों का पक्षधर तो कोई होना ही नहीं चाहिये. कुछ तो पवित्र रहने दो इस सृष्टि में.घुटन मत पैदा करो...

मर्द

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'मर्द 'एक ऐसा शब्द जिसको सुनते ही अक्सर लोग दिमाग में एक मुश्टण्डे,बात-बात पर मार काट पे उतारू होने  वाले,गाली गलौच करने वाले ,स्त्रियोँ को कमज़ोर समझ कर उन पर चिल्लाने वाले किसी शख्स का चित्र अपने  दिमाग में ले आते हैं और ऐसा होना स्वाभाविक भी है क्योंकि पुरुष प्रधान समाज में पुरुष को आक्रामक  ,मुँहफट,और शक्ति प्रदर्शन करने वाला ही दिखाया गया है।  समाज की इसी सोच का नतीज़ा ये रहा है कि हर पुरुष प्रजाति का प्राणी स्वं को इसी छवि में देखने लगा है और  अपना व्यक्तित्व भी ऐसा ही बनाने का प्रयास करने लगा है लेकिन ऐसा कम बुद्धि वाले,विवेक शून्य लोगों द्वारा ही  किया जाता रहा है। जो वास्तविक अर्थ में पुरुष होते हैं वो समझते हैं पुरुष होने का मतलब। अगर हम संस्कृत भाषा की दृष्टि से इसके अर्थ को देंखे तो वेदों और सांख्य शास्त्र में  पुरुष का अर्थ परमात्मा या जीवात्मा से लिया गया है जो इस शब्द की पवित्रता को स्पष्ट करता है। लेकिन मर्द एक उर्दू शब्द है तो इसका अर्थ भी निश्चित ही अलग भाव लिए तो होगा ही.....|   हर आदमी स्वं के लिए 'मर्द' शब्द का ही अधिक प्रय...