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'मारसाहब'

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  हमारे बचपन में ,गुरु का मतलब होता था -मारसाहब। जी हाँ ये शब्द तो था 'मास्टर साहब 'मगर उस समय में हमारे ये गुरूजी (मारसाहब ) स्टूडेंट्स की इतनी पिटाई किया करते थे कि  इनका नाम करण ही मास्टर साहब से 'मारसाहब' हो गया था। गिनती न आने पर,सवाल न आने पर बेंत की एक लकड़ी मंगाई जाती थी,जिसे स्थानीय भाषा में (संटी ) कहा जाता था। इस लकड़ी से मास्टर जी विद्यार्थियों  के हाथ सूता करते थे। कई -कई शिक्षक तो  बिना सोचे समझे कनपटी पर इतनी तेज खींच कर चाटा मारा करते थे कि चक्कर आने लग जाते थे, बेचारे स्टूडेंट को।भगवान का शुक्र है कि आज के समय में कुछ एक अपवाद को छोड़कर सभी शिक्षक फ्रेंडली और कूल स्वभाव के होते हैं. क्या किसी को भय ग्रसित करके कुछ सिखाया जा सकता है ?शिक्षा तो विनम्रता ,सहनशीलता और स्नेह  से पूर्ण व्यक्ति ही दे सकता है। शिक्षा प्रदान करने वाला जब तक खुद मानवीय गुणों और मृदु व्यवहार से युक्त नहीं होगा तब तक न तो वह ख़ुद शिक्षा देने का अधिकारी है न ही विद्यार्थी उससे शिक्षा ग्रहण करने में रूचि रखने वाला होगा।  आज कानून  ने स्टूडेंट्स  को कुछ ...

'वास्त्विक सुरक्षा तो उसकी तरफ़ से'

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बीमा  पॉलिसीज़  के प्रति लोगों की बढ़ती रूचि का कारण भविष्य को सुरक्षित रखने की सकारात्मक सोच माना  जाए या जीवन की क्षण भंगुरता के अहसास से प्रेरित एक नकारात्मक सोच ? मुझे तो लगता है कि भविष्य की इस क़दर चिंता ने इंसान को इतना नेगेटिव बना दिया है कि हर वक़्त वह एक अनजाना सा भय लेकर बस किसी भी तरह भविष्य को सुरक्षित बनाने की ही सोचता रहता है | इस इंतज़ाम में वह अपने अमूल्य वर्तमान की इतनी ज़्यादा उपेक्षा कर रहा है कि भविष्य की सुरक्षा ही ख़तरे  में पड़ती जा रही है | इतना भय रखकर हम अपने  वर्तमान और भविष्य  दोनों को ही जीने लायक स्थिति में नहीं बचेंगे |जब वर्तमान पहले है तो इसे फ्यूचर के लिए क्यों कुर्बान कर दें और वैसे भी फ्यूचर किसने देखा है।  ज़िंदगी का तो किसी की भी  और कभी भी कुछ भरोसा नहीं है। माना के फ्यूचर की चिंता एक प्रैक्टिकल  और अच्छी सोच है लेकिन जीवन और ईश्वर के प्रति इतना अविश्वास भी तो अच्छा नहीं है। सबसे बड़ी और सुरक्षित पॉलिसी तो उसकी तरफ़ से होती है। उसकी पॉलिसी और सत्ता में जिस दिन गहन आस्था हो जाए...