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"आयुर्वेद बनाम एलोपैथी "

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  किसी भी व्यक्ति में अगर कोई योग्यता है तो उसे बिना संकोच  स्वीकार करना चाहिए ,उसके गुणों को अपनाना चाहिए फिर चाहे वो आपका शत्रु या प्रतिस्पर्धी ही क्यों न हो.कोई दो शक्तिशाली,विद्वान पक्ष आपस में अगर  द्वेष - भाव छोड़ कर,विवाद छोड़कर अपनी -अपनी शक्ति को ,विद्वता को सही दिशा देकर देश  के ,मानव जाति के विकास और उसकी  उन्नति में  लगाएँ  तो उनकी योग्यता सार्थक है वरना दोनों  ही  शून्य हैं.विषय कोई भी  हो .विद्वान सफल व योग्य व्यक्ति वह है जो खुद को श्रेष्ठ घोषित करने की ज़ददोजहद  में  न पड़ कर कुशलता  पूर्वक अपना कर्म करता रहे व समय आते ही उसकी श्रेष्ठता स्वं  प्रमाणित हो जाए . प्रसंग चाहे आयुर्वेद को  श्रेष्ठ  प्रामाणित  करने का हो या एलोपैथी को . मेरी दृष्टि में दोनो ही  चिकित्सा पद्धति श्रेष्ठ हैं. आयुर्वेद जहाँ प्राचीन काल से चली अा रही एक सक्षम  ,सार्थक पद्धति है वहीं आधुनिक समय में  एलोपैथी चिकित्सा पद्धति की महत्ता को  नकारा नहीं जा सकता.योगा,आयुर्वेद,प्राकृतिक चिकित्सा ये सब आज ...

डरना नहीं बस सतर्कता,साहस ज़रूरी.

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  जब से कोरोना शुरू हुआ डर -डर के जी रही थी. हर वक्त मानसिक तनाव,खौफ,घबराहट .... किसी  तरह तनाव में first लॉक डाउन निकाला ही था कि  फिर से वैसे ही हालात बल्कि उससे कहीं और ज़्यादा ख़राब पैदा हो गए .मगर अब अति हो गई थी....दिमाग नकारात्मक चीजें सोच -सोच कर थक चुका था.फालतू चिंताएं कर- कर मैं दुखी हो गई थी.मैने दिमाग को आदेश दिया कि बस अब और नहीं..... मरना तो एक बार ही है ना, और वो भी निश्चित है कि कब और कैसे.मौत ज़िन्दगी का अटल  सत्य है, उसे कोई भी टाल नहीं सकता.फिर रोज- रोज क्यों मरना,  डर - डर के . जो अपने हाथ में नहीं उसे ईश्वर पर छोड़ कर मुक्त हो जाएं .मस्त हो जाएं .होनी हमारे हाथ में नहीं है लेकिन विश्वास और हौसला हमारे हाथ में है.हम किसी को नहीं बदल सकते,बस खुद को बदल सकते हैँ.समय हमारे वश में नहीं है लेकिन उसके प्रभाव में स्वं को  स्थिर और सबल बनाये रखना हमारे हाथ में है.इसलिए विचलित मत होइए.समय कभी एकसा नहीं रहता .ये बुरे दिन भी निकल जाएंगे.डरना नहीं बस सतर्कता और साहस ज़रूरी है.ईश्वर ने जितनी ज़िन्दगी दी है इसे भरपूर जिएँ , सार्थक कर जिएँ .  😊जय श्र...

"हौसला रखें "

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 आज हम सब परेशान हैं,चिंतित हैं,विचलित हैं  वजह सिर्फ एक है - 'महामारी '.इसने मृत्यु का एक खौफ हर व्यक्ति के मन में ऐसा भर दिया है कि ज़िन्दगी असहज लगने लगी है.ना मन स्वस्थ  है न तन.दिन -रात एक अज़ीब सा भय है मन मे.एक अनिश्चितता की स्थिति में आशंकित से हम सभी जिए तो जा रहे हैं पर ना खुद की सांसों पे भरोसा है ना औरों की सांसों पे.कल्पना से परे की किसी दुनिया को यथार्थ में  महसूस कर रहें हैं और खुद को इसमे अकेला,असहाय और भटका हुआ सा पा रहें हैं.तमाम समझाने की कोशिश करते हैं मन को, मगर वास्त्विकता ठुकरा देती है हर मानसिक तैयारी को .मन परेशान हो उठता है,मनोबल हार मानने लगता हैँ .तब वही(ईश्वर )संभालता  है,उसका ध्यान ही  भर देता है मन को एक सकारात्मकता से, जिसका अस्तित्व उतना ही वासत्विक और दृढ़  हो  सकता  है जितना की ईश्वर में हमारी आस्था  और उसके चमत्कारों में विश्वास.सच्चाई तो ये है कि ईश्वर में आस्था के बिना मेरे लिए तो जीवन की कल्पना ही असंभव है.कभी-कभी सोचती हूँ  कि नास्तिकता के साथ जीना भी कितना दूभर होता होगा .मुसीबत की स्थिति में...