संदेश

जनवरी, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सुंदरता

चित्र
'सुंदरता 'एक ऐसा तत्व जो सभी को अपनी ओर आकर्षित करता है। सुंदरता की परिभाषा और इसके मापदंड सबके लिए अलग -अलग हो सकते हैं। किसी व्यक्ति की नज़रों में एक व्यक्ति सुन्दर हो सकता है परन्तु दूसरे की नज़र में कोई और। इसलिए सान्सारिक लोगों की सुंदरता के मायने अलग हैं। यहाँ कुछ लोगों की दृष्टि में बहुत गौरा ,लम्बा -चौड़ा (अध्यात्म रहित ,अक्खड़ स्वभाव का व्यक्ति सुन्दर हो सकता है। कुछ लिपि-पुती महिलाएँ सुन्दर हो सकती हैं।  कुछ की नज़रों में फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाला ,महंगी पोशाक में लिपटा ,चमकता हुआ  (क्रीम से पुता )व्यक्ति सुन्दर हो सकता है। लेकिन मेरी नज़रों में या यूँ कहें सुंदरता के वास्तविक नज़रिये से एक किसी कुटिया में रह रहा ,पवित्र आचरण वाला ,साधारण से लिबास में लिपटा  ,आध्यात्मिक आभा से युक्त व्यक्ति सर्वाधिक आकर्षक व सुन्दर है।  आचरण की पवित्रता ,अध्यात्म की चमक ही व्यक्ति की वास्तविक सुंदरता होती है मगर  इसे महसूस करने के लिए आँखों में वही पवित्रता होना भी ज़रूरी है।  इस भौतिक जगत के लोग चाहे कितने सौंदर्य प्रसाधन अपना लें ,चाहे कितनी नयी वेश-भूषायें आजमा ले...

'तुम्हारी याद'

चित्र
भूलना चाहता हूँ मगर तुम्हारी याद दिला देती है   तन्हाई अक्सर मेरे गम को बढ़ा देती है सिगरेट के धुएँ सा जलता है मेरा दिल  हर एक आह सीने की जलन बढ़ा देती है  गयी हो जब से तुम खाली सा हो गया हूँ  हर बात बीती हुई,उदास सी मेरी शाम बना देती है  ढूँढता हूँ घर के हर एक कोने में तुम्हें  बिखरी हुई हर चीज़ तेरे अवसान की तहरीर बता देती है  तुम थीं तो तुम्हारी क़द्र ना थी कभी  अधूरी हर चीज़ अब तेरी क़ीमत बता देती है।  -अंशु चौहान 

आसक्ति

चित्र
  इंसान की दुर्गति का सबसे बड़ा कारण हैं किसी भी व्यक्ति या वस्तु में आसक्ति।आसक्ति से ही अन्य तमाम विकार  पैदा होते हैं। गीता में कहा गया  है कि कोई भी कर्म हमे निरासक्त भाव से ही  करना चाहिए। किसी भी चीज़ में  आसक्ति का मतलब है कि हम उस वस्तु,व्यक्ति या कर्म-फल के प्रति इतने मोह ग्रसित हो जाते हैं कि उसके बिना  हम खुद के जीवन के मायने खोने लगते हैं। हम किसी भी क़ीमत पर उसे अर्जित करना चाहते हैं और नहीं मिलने  पर अवसाद ग्रसित होकर अपराध की राह पर चलने लगते हैं।  आसक्ति इसलिए अधिक घातक है क्योंकि वो इंसान के विवेक को नष्ट कर देती है,उसकी सहनशक्ति ख़त्म कर  देती है। उसे मानसिक रूप से पंगु बना देती है।  किसी के प्रति आपकी आसक्ति,आपकी भौतिक व नैतिक दोनों ही प्रकार की उन्नति अवरुद्ध कर देती है।  आसक्ति कर्म बंधन में फँसा देती है। अनेक इच्छाएँ ,लोभ व दुर्वृत्तियाँ पैदा कर देती है. अब यदि आपने अपनी विवेक शून्यता से आसक्ति पैदा कर ही ली है तो इसे दूर करने के लिए आपको उन विशेष  चीज़ों के प्रति अपना नज़रिया बदलना पड़ेगा। नज़रिया बदलेगा जब ईश्वर...