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मार्च, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
व्यथित  होती हूँ जब रिश्तों  की मर्यादा टूटती है मायूस  होती हूँ जब संबंधों से  आत्मीयता छूटती  है रुलाता  है ये आयातित परिवर्तन जो संस्कृति को छल रहा है कुछ ऐसा बदलाव जो अस्वीकार्य है मन को क्यों इस देश में पल रहा है विरोध के स्वर जब भी उठाने की कोशिश की वो तमाम ऑखें मुझे नापाक घूरती हैं भीख मांग रही नैतिकता स्व अस्तित्व की दर व दर अधर्म की हंसी बार-बार छूटती है ये कैसा कहर ,कैसा है मंजर निर्लज्जता यहाँ सरे आम  घूमती है copy right anshu@1994  
शब्द राग से निकले गीत हो गए कुछ सुर मिले आवाज से मीत हो गए खुशबू बिखेर कर चली वो ग़जल  इस तरहा गायक भी उसके आशिक मन प्रीत हो गए वीणा नुपुर पद ताल से संगीत यूं रिसने लगा मौन भी स्वर लहरों में कहीं खो गए अनकहे जुबां उस रात तो कई बात जैसे कह गई 'तानसेन'के गान से रोशन जब दीप हो गए बैठ कर सीप में मोती भी  अपने  जीवन पर रोने लगा मुझ से उन्मुक्त आज तो कविता छंद हो गए ।। 

'मयके की गलियाँ '

वो  गुजरा ज़माना वो मयके की गलियां माँ की जरा-जरा सी बात पर मेरा रूठ जाना अब बहुत याद आता है ।  बीते हरेक सायते की मेरे वर्तमान में दख़ल ये तो नहीं कि मुझे अजीयत  में डालती है , मगर अपनी नादानियों पर अब मलाल आता है । मेरी नानी जो लगती थी हुस्न परी सी कभी, उसके गालों की झुर्री और झुकी कमर देख जवानी का यूँही ख़याल आता है । कितनी ममता लुटाई थी उसने बचपन पे मेरे क़र्ज  कैसे चुकाऊँ जहन में बस ये  ही सवाल आता है.
हम  अपनी  भारतीय  संस्कृति पर बड़ा गर्व करते हैं और गर्व होना भी चाहिए क्योंकी भारतीय संस्कृति सदा से ही सम्माननीय रही है। इस देश ने हमेशा धार्मिक संस्कारों और,सामाजिक मर्यादाओं को महत्त्व दिया है । परन्तु आज हमारी इस संस्कृति ने अपना मूल स्वरुप खो दिया है क्योंकि इस पर पाश्चातीय  सभ्यता का जबरदस्त  असर हो रहा  है । आज भारतीय संस्कृति  से ''मर्यादा''शब्द बाहर  हो चुका है । हम पश्चिमी  देशों की नक़ल करते-करते इतने विवेक हीन हो गए हैं कि सही ग़लत का भेद भी  हमें अब समझ नहीं आता है ।इस विवेकहीनता का स्पष्टीकरण  इस  बात से  स्वतः हो जाता है कि सरकार यहाँ ''संबंधों की उम्र निर्धारित कर रही है । गौर करने लायक पहलू ये नहीं है -कि क्या उम्र निर्धारित कर रही है बल्कि ये है कि भारत जैसे पवित्र देश में इस तरह की गंदगी के बारे में विचार क्यों किया जा रहा है । इस तरह के  कदम से सिर्फ  नैतिकता की  हत्या होगी । समाज में गंदगी  फैलेगी और आने वाले समय में देश की जो तस्वीर सामने आयेगी उस पर हम आंसू बहाने के अतिरिक्त ...

एक दीप अपनी चाहत का

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एक  दीप अपनी  चाहत  का इस सूनेपन  में  जला  दो मेरी खोई  हुई मुस्कान मेरे होठों  पे  सजा दो । बस तुम्हारी ही दिलकश नज़र ने इस दिल को चुराया है प्रियतम :अपनी सांसों की खुशबू  से मेरा जीवन महका दो । टूटी हुई उम्मीदें ,रूठे हुए अरमां है साथ देकर अपना मुझे  जीना सिखा दो । हर पल घुटती  सिसकती  हूँ  मै खो  न दूं होश अपने तड़प कर इस तरहा आकर अब ये बेखुदी मिटा दो । -तस्वीर साभार गूगल