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'समझ'

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दुनिया बड़ी विचित्र है यहां सब अपने को दूसरे से श्रेष्ठ मानते हैं और सबको ही एक दूसरे से शिकायत है।यहाँ कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसके सबके साथ संबंध अच्छे हों फिर भी दूसरे को खुद से निम्न और खुद को दूसरे से श्रेष्ठ मान कर चलते हैं. जरा विचार कीजिए अगर दोनों अच्छे होते तो ना एक दूसरे से दोनों को शिकायत होती न झगड़े.सारी समस्या का कारण है अपेक्षा, उम्मीद।अगर आप किसी से उम्मीद रखते हैं कि वो आपके अनुसार बने तो आपको भी उसके अनुसार बनना होगा।अन्यथा शिकायत करना बंद करे।जब आप खुद को बदलना नहीं चाहेंगे तो दूसरे से उम्मीद क्यों? इसलिए सुखी रहना है तो इच्छाओ पर नियन्त्रण रखें।दूसरो से सुख पाने की नहीं, सबको सुख देने की इच्छा रखें.जब तक स्वार्थी बने रहेंगे, सुख भोगने की इच्छा रखेंगे और दूसरे को अपने अनुकूल बनने की कोशिश करते रहेंगे तब तक दुख से नहीं बच पाओगे.और यहीं सारी उम्मीद क्लेश, द्वेष और विवाद उत्पन्न करती रहेंगी।जब तक मेरा - मेरा का भाव ख़तम नहीं होगा तब तक दूसरे के प्रति सहनुभूति और प्रेम का भाव नहीं होगा।और स्वार्थ और अपेक्षा ही दुख का मूल कारण है।उमर के अनुसार इच्छाएं और व्यवहार  पर...

कर्मा

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सृष्टि में जितने भी इंसान हैं सब प्रभु की मर्जी से प्रकट हुए हैं .लेकिन साथ ही सब अपना अपना प्रारब्ध, संचित कर्म लेकर चल रहे हैं।मनुष्य योनि सबसे श्रेष्ठ योनि मानी जाती है।अन्य सारी योनि तो भोग योनि है लेकिन मनुष्य योनि ही ऐसी योनि है जो अपने वर्तमान कर्मों के हिसाब से अच्छा या बुरा फल भोगती है और अच्छे कर्म करके ईश्वर की प्राप्ति भी कर सकती है इस योनि में जो भी कर्म करे बहुत सोच समझ कर करे। क्योंकि इस योनि में अगर आपने ईश्वर प्राप्ति नहीं की तो आपको अनेक योनियों में भटकना बढ़ेगा।मनुष्य शरीर पाकर इसलिए कोई भी गलत कर्म न करें.आप जिसके प्रति भी गलत कर्म करेंगे वो किसी ना किसी रूप में आपके सामने अगले जन्म में प्रकट होता रहेगा।इसलिए मोह का नाश करते हुए, विवेकशील बनते हुए हमें अध्यात्म और ईश्वर से जुड़कर अपनी जिंदगी सिर्फ कर्तव्य निर्वाह के लिए जीनी है.किसी की भी आत्मा को दुखाना या ईश्वर द्वार निर्मित इस दुनिया में किसी भी व्यक्ति की शारीरिक कमज़ोरी या मानसिक कमज़ोरी का उपहास करना, मज़ाक उड़ाना बहुत घातक हो सकता है  .यहां जिसको जो स्थिति मिली है सब अपने कर्मनुसर मिली है।इसलिए आप जिसका भ...