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गलत सोच और कर्म पर नियंत्रण जरूरी

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जिंदगी में स्वतंत्रता जितनी जरूरी है उतना ही  नियंत्रण भी है।हर वक्त दी गई स्वतंत्रता घातक सिद्ध हो सकती है.भीतर और बाहर दोनो से नियंत्रण ज़रूरी है . आंत्रिक नियंत्रण (क्रोध ,द्वेष,अधीरता आदि पर) नहीं होगा तो बाहर की प्रतिक्रियाये दुर्घटना व विनाश का कारण बनेंगी. अजकल बढ़ रही सड़क दुर्घटनाएं भी इसी कारण से हो रही हैं कि लोग किसी को भी अपने से आगे निकलते हुए देखकर एकदम बौखला उठते हैं चाहे वो  सड़क पर गाड़ी चलाते हुये किसी का उससे   आगे निकल जाने की सामान्य सी बात क्यों ना हो . आजकल लोगों में अजीब सी अधीरता ,उतावलापन और  कुण्ठा पनप गई है. नैतिक और भावनात्मक  स्तर इतना गिर चुका है कि लोगो को ये ही समझ नही आ रहा कि किस बात पर नाराज होना चाहिये और किस पर नही . ऐसी छोटी छोटी बातों पर लोगो को आवेश में आते देखा है जो वास्तव में बहुत मामूली सी होती हैं. चेतना का गिरा हुआ स्तर ही ये सब करवाता है जब इंसान अपनी 'मै' से बाहर नही आ पाता .मेरा सम्मान ,मेरी पूजा ,सिर्फ मेरा अधिकार ,सब को खुद से नीचे देखने की तमन्ना ,किसी को सुख मे देखने से उत्पन्न दर्द और छटापटाहट...

पति-पत्नी का रिश्ता

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पति-पत्नी का रिश्ता कहते हैं दो आत्माओ का रिश्ता होता है। इस रिश्ते को अगर वफ़ा और निष्ठा के साथ निभाया जाए तो सबसे अच्छा रिश्ता है जो वृद्धावस्था में सबसे ज्यादा आत्मिक हो जाता है .भारतीय संस्कृति में तो पति को देवता माना जाता है .मगर ये ध्यान रखने योग्य बात है कि उसी पति को परमेश्वर माना जाता है जो चरित्र से अच्छा हो, व्यभिचारी को नहीं।एक पत्नी व्रती पति और पतिव्रता स्त्री का स्थान तो देवताओं की दृष्टि में भी उच्च होता है। भारतीय संस्कृति का सम्मान करने वाले तो इसे मानते भी हैं लेकिन आजकल पाश्चत्य सभ्यता से प्रभावित लोग इस रिश्ते की अहमियत भूल गए हैं, इसलिए छोटी-छोटी बातों में तलाक जैसी स्थिति आ जाती है दोनो ही पक्ष अगर प्यार और सम्मान की भावना रखते हुए रिश्ता निभाए तो इस रिश्ते की ऐसी दुर्दशा ना हो.आख़िर अन्य toxic रिश्ते भी तो हम निभाते ही हैं .पति-पत्नी के रिश्ते में तलाक का विकल्प होता है, इसलिए हम इस में सहनशीलता नहीं दिखाते। बस बात-बात में तलाक का विकल्प तलाशने लगते हैं.इसलीये अन्य रिश्तों की तरह इसे भी सही से निभाएं विकल्प ना ढूंढे।पति या पत्नी व्याभिचारी हो तो त्याग देना चाहि...

उद्देश्य हीन मनुष्य

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कहते हैं ये मनुष्य जन्म इतना दुर्लभ है कि देवता भी इसके लिए तरसते हैं पर मनुष्य इतना मूर्ख है कि इसका महत्व ही नहीं समझ पा रहा है.ईश्वर प्राप्ति के लिए ही प्रभु मनुष्य योनि प्रदान करता है और मनुष्य पर माया का ऐसा जादू चढ़ता है कि प्रभु के अलावा सारी चीजों में उसकी रुचि होती है, सारे काम उसे ज्यादा जरूरी होते हैं प्रभु के अलावा. कोई विवेकशील व्यक्ति ही समझ पाता है उद्देश्य  को, जीवन के महत्व को.यहां लोग ऐसी व्यवस्था करने में लगे हैं जैसे यहीं स्थाई ठिकाना रहने वाला है .जबकी सब जानते हैं कि जगत में कोई स्थायी नहीं है। फ़िर भी लगे हुए हैं सोना-चाँदी एकत्र करने में,मकान पे मकान बनाने में।इच्छाए इतनी ज्यादा है कि कोई भी इंसान प्रभु से प्रभु को नहीं मांगता बल्की धन दौलत ही मांगता रहता है।इच्छा पूरी होते ही फूला नी समाता और कुछ इच्छा के विरुद्ध हो जाए तो गालियां देना शुरू कर देता है।   जीवन के प्रति तो इतना मोह है कि बुढ़ापे के चरम पर पहुंच कर भी पैसे के हिसाब -किताब में लगा रहता है.बच्चे,फिर बच्चों के बच्चे, फिर उनके भी बच्चों को देखने की तमन्ना मे ईश्वर से और अधिक उम्र की कामन...

भीतर की सुन्दर दुनिया में रहें'

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जिंदगी को हंस के जिओ. हर बात पे मुंह फुलाना या सीरियस होना जरूरी नहीं है मैं तो कहती हूं लड़ाई में भी हसी  खोजो.बीच में भाव बदल के चुटकुले सुनाने लगो.कह दो के लड़ने का मन नहीं है.कुछ और सुना... सब दिमाग का खेल है मनोवृत्ति का खेल है.आपके हाथ में है क्यों दूसरे के खोपड़े के हिसाब से चलना. बाकी आपकी मर्जी..उसे चढाने दो त्यौरियां .तुम्हें प्रभावित ही नहीं होना है .तुम्हें ऐसा बन जाना है मानो सामने एक नादान बालक खड़ा है . जब तक विषय कोई ज़्यादा गंभीर न हो ,जैसे देश ,धर्म और मर्यादा के ख़िलाफ़ कोइ बात ,तब तक किसी विषय पर ज़्यादा तमतमाने की ज़रूरत नहीं है .न्याय संगत बात के लिए,नैतिकता के लिए लड़ाई सही,बाकी सब व्यर्थ है.इसलिए मौन रहना सीखो,भीतर ही भीतर प्रभु का चिंतन कर प्रसन्न रहना सीखो.प्रभु प्रेम रस का पान करो फिर बाहर सब फीका और रस हीन लगेगा.भीतर की दुनिया में जीना सीखो।तब जान पाओगे बाहर कुछ भी नहीं है।कुछ भी सुंदर नहीं है।जहां आनंद खोज रहे हो है ही नहीं।शांत रहकर प्रभु में खोने का आनंद जिसने पाया उसे बाहर की चीज़ से कोई मतलब नहीं होता। इसलिये भीतर की सुन्दर दुनिया में रहें बाहर तो कुछ भ...

मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो

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   मृत्यु के भय से अगर सही को सही और गलत को गलत ना कह सको,तो सन्देह  करो अपने मनुष्य होने पर . शक्तिशाली हो कर अगर किसी निर्बल की शक्ति न बन सको,तो संदेह करो अपने शक्तिशाली होने पर. संपन्न हो कर अगर मदद ना कर सको किसी निर्धन की,तो सन्देह करो अपनी सम्पन्नता पर . पुरुष हो कर अगर किसी नारी के सम्मान की रक्षा न कर सको,तो संदेह करो अपने पौरुष पर। धार्मिक हो कर भी अगर धर्म की रक्षा न कर सको, तो धिक्कार तुम्हारे धार्मिक होने पर.  मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो इस धरा पर, सिर्फ देह मनुष्य की होना ही मनुष्यता नहीं, समझो इस ध्येय को तो इंसान हो तुम  ना समझो तो चारा चर रहो कही। -