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बात दिल को छूकर निकल जाएगी(गज़ल)

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बात दिल को छूकर निकल जाएगी बड़ा रोओगे जब मेरी याद आएगी  बात दिल को .....  1.मुझसे मिलना तेरा बेवजहा तो नहीं,  कुछ सबब है जो तुझको मिला ही नहीं  धड़कनों तक तेरी जब ये आह जाएगी  तेरी सांसों से मेरी सदा आएगी. बात दिल को छूकर...    2.हथेलियों पर रखे तेरे वादों से कम  ज़िन्दगी को जिया इन सांसों से कम  मुझको पाने की जब तुझमें चाह आएगी  उम्र तेरी मोहब्बत से बढ़ जाएगी .  बात दिल को ....   -Anshu Chauhan

"निन्दा घातक हैं "

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"निन्दक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाए   बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे सुभाए"  कबीर जी का ये दोहा आप सभी ने सुना होगा .क्या आप सहमत हैं इस बात से ?मेरा तो मानना है कि ये विचार  काफी हद तक सही नहीं हैं. दुनिया में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो अपनी निन्दा से प्रसन्न या उत्साहित होता होगा.निन्दा या आलोचना  व्यक्ति का मनोबल तोड़ देती है जबकि प्रोत्साहन और प्रशंसा ज़िन्दगी में उन्नति करने और आगे बढ़ने की प्रेरणा  देते हैं.सोचिए !अगर आलोचना से कोई प्रसन्न होता या अच्छे स्वभाव का होता तो किसी की आलोचना करने से  उसका  स्वभाव सही होता जबकि होता उल्टा हैं .आलोचना से परेशान व्यक्ति आत्महत्या की राह चुन लेता है . निन्दा से आहत व्यक्ति निराशावादी हो जाता है उसका विश्वास टूट जाता है.हर कार्य को करने से पहले घबराने   लगता है इसलिए निन्दा कभी भी लाभकारी नहीं  होती .निन्दा करने वाला व्यक्ति सभी की आँखों को  चुभता है,  शास्त्रों में निंदा करने वाले को पापी की श्रेणी में रखा गया है। कहा जाता है कि निंदा करने वाला व्यक्ति जिसकी  निंदा करता...

नारी हूँ मैं अबला नहीं( kavita)

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  चट्टानों से लिए हौसले, हर ग़म  से टकराऊँगी हूँ नारी पर कमज़ोर नहीं,हर विपदा को हराऊँगी   मुझमें विलय है साहस,शक्ति ,योद्धा जिसकी करते भक्ति, उदीयमान सूरज सी होकर अम्बर तक छा जाऊँगी . पतित -आचरण,दम्भी जन को शील-विनय सिखलाऊँगी . प्रेम , समर्पण दया भाव से जीवन को महकाऊँगी  स्वं से स्व का भाव भुलाकर परहित को मिट जाऊँगी. नव सृष्टि की बन सहयोगिनी नव सृजन मार्ग दिखलाऊँगी . नारी हूँ मैं अबला नहीं ये सबको बतलाऊँगी . -Anshu Chauhan

'फिर किसी बात पे नाराज़ है वो'(गज़ल)

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  फिर किसी बात पे नाराज़ है वो  मेरी खामोश निगाहों की आवाज़ है वो  फिर किसी बात पे नाराज़ है वो  1.ना ही मुझसे संभलता है उसकी बेरूखी का गम, ना ही मेरे  बिना भरता वो कदम ,   कई दिन से ताबियत नासाज़ है वो  फिर किसी बात पे नाराज है वो . 2.मुझपे इल्ज़ाम लगाकर,खुद को भगवान कहा करता है , मेरी मासूमियत से अंजान रहा करता है मुझको ठहरा गया गुनेहगार सा वो . - -अन्शु चौहान    

यूँही नहीं होती हैं रुसवाइयाँ ..(गज़ल )

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यूँही नहीं होती हैं रुसवाइयाँ दिल की,किसी   शख्स पर तो इल्ज़ाम होता होगा 1.भीड़ में भी तन्हा सा फिरता है आजकल वो , वक्त और हालात पर रोता है आजकल जो लड़खड़ाता हुआ उसका हर अल्फाज़ तो होगा . यूँही  नहीं होती हैं....... 2.रूह में सिमटी हुई यादों का बवंडर है ,प्यासी है  आरजू और दूर समन्दर है,बेबस सी हकीकत पर  सहमा सा हर जज़्बात तो होगा  यूँही नहीं होती है ... ..       -Anshu Chauhan                      

"उसे भी हक है "(कविता)

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 उसे भी हक है खुलकर खिलखिलाने का   के उसकी सांसे भी ग़मों से बोझिल होती हैं उसे भी हक़ है बिन बताए बाहर जाने का  के उसकी सीमायें भी विवशता से बंधी होती हैं उसे भी हक है सबसे पहले खाने का  के उसके साथ भी दवाईयों की पर्चियाँ जुड़ी होती है उसे भी हक है बारिश में नहाने का  के उसकी तमन्नाएं भी सावन से जुड़ी होती हैं  उसे भी हक है ज़ोर से बातें करने का के उसकी खामोशियां भी शोर से जुड़ी होती हैं उसे भी हक है आकाश में उड़ने का  के उसकी हिम्मतें भी परों से जुड़ी होती हैं उसे भी हक है नदियों सा गुंगुनाने का  के उसकी मन तरंगें भी लहरों से जुड़ी होती हैं उसे भी हक है बहुरूपी पोशाकों का के उसमें भी अल्लहड़ सी छवि छुपी होती है उसे भी हक है पुरूष से भिड़ जाने का  के उसमें भी 'दुर्गा' सी  शक्ति छुपी होती है उसे भी हक है विरोध हित डट जाने का  के उसकी स्वतन्त्रता भी अधिकारों से जुड़ी  होती है.    -अंशु चौहान                                     ...

'ना होती है तुमसे ..(स्वरचित गीत) )

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 (स्वरचित गीत ) ना होती है तुमसे मुलाकात तो ,दिल को आराम नहीं मिलता  हर पल ये ढूंढे नज़र बस तुझे,तेरा पता ही  नहीं  मिलता  1.मुझे तू संभाले ,तुझे मैं सँभालू   तेरे दिल में अपनी जगह मैं बना लूँ  बस जाए मेरी  धड़कनों में जो, ऐसा आगाज़ नहीं  मिलता. ना होती है.   .    . .     2. तसव्वुर  में मेरे  दिन - रात होकर  यादों में मेरी आँखें  भिगोकर चुरा ले जो मुझसे ,मेरी धड़कनों को ,ऐसा आराम  नहीं मिलता . -अंशु चौहान                         

"कुछ तो मतलब रखती हैं"(कविता)

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  मै कुछ बोलूँ पर तेरी  खामोशी, कुछ तो मतलब  रखती हैं. मेरे साथ में तेरी य़ादें ,कुछ तो मतलब रखती हैं.  पास रहुँ तो यहाँ- वहाँ पर नजरें,दूरी में मेरी ही बातें कुछ तो मतलब रखती हैं. बुझा-बुझा सा हाल हैं दिल का ,गरम तवे पर जली सी रोटी कुछ तो मतलब  रखती है. मेरे पास में घंटों रुकना ,गैरों संग चन्द लमहे सिरकत कुछ तो मतलब रखती है. देख के मुझ से मुँह यूँ  छुपाना,नज़र मिलाकर,नजर चुराना कुछ तो मतलब  रखती है. तन्हाई के दो पहलू हैं ,खुद ही खुद से बातें दिल की कुछ तो मतलब रखती हैं .  -अंशु चौहान      

'तलाश'

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 उसमें सुलगती हूँ मैं ,मुझमें बुझता है वो . उसमे चलती हूँ मैं ,मुझमें थमता हैं वो  उसमे संवरती हूँ मैं,मुझमे बिखरता है वो  उसमे पहेली हूँ मैं,मुझमे सुलझा है वो    उसमे रोशनी हूँ मैं मुझमे अंधेरा हैं वो.  उसमे तलाश हूँ मैं,मुझमे लापता है वो . उसमे समन्दर हूँ मैं,मुझमे प्यासा हैं वो .     उसमें आशा हूँ मैं, मुझमें निराशा है वो उसमें ठहरी हूँ मैं मुझमें बीता है वो.        -अंशु चौहान    .             

"उम्र का ढलना "

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उम्र का ढलना कोई त्रासदी तो नहीं  जो हर शख्स चिंता जताता है कि उम्र बढ़ रही है  बच्चे से बड़े  होने  का जश्न हो तो , बड़े से बूढ़े होने का कैसा गम  बुढ़ापा तो कितना संपन्न होता है  बचपन ,जवानी के अनुभव लिए  आसक्ति से विरक्ति की ओर , बंधन से मुक्ति की ओर . फिर उसका शोक नहीं जश्न होना चाहिए . जीवन भार नहीं आभार होना चाहिए .  यात्रा का अंतिम चरण प्रथम से अहम् होना चाहिए . मोह रहित ,व्यसन रहित,प्रभु भक्ति में लीन  मगर  मन होना चाहिए.  - अंशु चौहान      

'मोह के वशीभूत न हों '

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 भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है कि मोह सब दुखों कारण है .मोह के वशीभूत होकर ही इंसान कई तरह के अपराध कर बैठता है .मोह ही इंसान को स्वार्थी और विवेक शून्य बना देता है .इसलिए तुम्हे कोई कितना भी प्रिय क्यों न हो उसके प्रति मोह ग्रसित नहीं होना है .प्रेम हो पर मोह न हो .अब प्रेम और मोह में अंतर समझिये.जब आप किसी का ख़याल रखते हैं तो इसे प्रेम कहते है लेकिन जब आप उस व्यक्ति विशेष का ही खयाल रखते हुए उसके लिए किसी दूसरे को हानि पहुंचाने से भी नहीं चूकते तो इसको मोहान्ध होना कहते हैं . मोह जितना उसके लिए हानिकारक है जिसके प्रति कि आप ये रखते हैं उतना ही स्वं आप के लिए भी है क्योंकि ये सही और गलत की समझ खो देता है .मोह से ग्रसित व्यक्ति की सोच विवेक रहित होती है इसलिए ये कई बार तुम्हारे अज़ीज़ का भविष्य ही ख़राब कर डालती है. इसलिए किसी के प्रति प्रेम भाव तो रखिए लेकिन मोह मत रखिए .मोह से ग्रसित मन न तो दूरदर्शी होता है न हितकारी .ये प्रत्यक्ष रूप से दूसरों का व अप्रत्यक्ष रूप से अपनों का भी दुश्मन होता है .सच तो ये है कि आप जिससे अधिक मोह रखते हैं वो भी आपके इस अति मोह से परेशान हो जाता ...

"आयुर्वेद बनाम एलोपैथी "

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  किसी भी व्यक्ति में अगर कोई योग्यता है तो उसे बिना संकोच  स्वीकार करना चाहिए ,उसके गुणों को अपनाना चाहिए फिर चाहे वो आपका शत्रु या प्रतिस्पर्धी ही क्यों न हो.कोई दो शक्तिशाली,विद्वान पक्ष आपस में अगर  द्वेष - भाव छोड़ कर,विवाद छोड़कर अपनी -अपनी शक्ति को ,विद्वता को सही दिशा देकर देश  के ,मानव जाति के विकास और उसकी  उन्नति में  लगाएँ  तो उनकी योग्यता सार्थक है वरना दोनों  ही  शून्य हैं.विषय कोई भी  हो .विद्वान सफल व योग्य व्यक्ति वह है जो खुद को श्रेष्ठ घोषित करने की ज़ददोजहद  में  न पड़ कर कुशलता  पूर्वक अपना कर्म करता रहे व समय आते ही उसकी श्रेष्ठता स्वं  प्रमाणित हो जाए . प्रसंग चाहे आयुर्वेद को  श्रेष्ठ  प्रामाणित  करने का हो या एलोपैथी को . मेरी दृष्टि में दोनो ही  चिकित्सा पद्धति श्रेष्ठ हैं. आयुर्वेद जहाँ प्राचीन काल से चली अा रही एक सक्षम  ,सार्थक पद्धति है वहीं आधुनिक समय में  एलोपैथी चिकित्सा पद्धति की महत्ता को  नकारा नहीं जा सकता.योगा,आयुर्वेद,प्राकृतिक चिकित्सा ये सब आज ...

डरना नहीं बस सतर्कता,साहस ज़रूरी.

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  जब से कोरोना शुरू हुआ डर -डर के जी रही थी. हर वक्त मानसिक तनाव,खौफ,घबराहट .... किसी  तरह तनाव में first लॉक डाउन निकाला ही था कि  फिर से वैसे ही हालात बल्कि उससे कहीं और ज़्यादा ख़राब पैदा हो गए .मगर अब अति हो गई थी....दिमाग नकारात्मक चीजें सोच -सोच कर थक चुका था.फालतू चिंताएं कर- कर मैं दुखी हो गई थी.मैने दिमाग को आदेश दिया कि बस अब और नहीं..... मरना तो एक बार ही है ना, और वो भी निश्चित है कि कब और कैसे.मौत ज़िन्दगी का अटल  सत्य है, उसे कोई भी टाल नहीं सकता.फिर रोज- रोज क्यों मरना,  डर - डर के . जो अपने हाथ में नहीं उसे ईश्वर पर छोड़ कर मुक्त हो जाएं .मस्त हो जाएं .होनी हमारे हाथ में नहीं है लेकिन विश्वास और हौसला हमारे हाथ में है.हम किसी को नहीं बदल सकते,बस खुद को बदल सकते हैँ.समय हमारे वश में नहीं है लेकिन उसके प्रभाव में स्वं को  स्थिर और सबल बनाये रखना हमारे हाथ में है.इसलिए विचलित मत होइए.समय कभी एकसा नहीं रहता .ये बुरे दिन भी निकल जाएंगे.डरना नहीं बस सतर्कता और साहस ज़रूरी है.ईश्वर ने जितनी ज़िन्दगी दी है इसे भरपूर जिएँ , सार्थक कर जिएँ .  😊जय श्र...

"हौसला रखें "

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 आज हम सब परेशान हैं,चिंतित हैं,विचलित हैं  वजह सिर्फ एक है - 'महामारी '.इसने मृत्यु का एक खौफ हर व्यक्ति के मन में ऐसा भर दिया है कि ज़िन्दगी असहज लगने लगी है.ना मन स्वस्थ  है न तन.दिन -रात एक अज़ीब सा भय है मन मे.एक अनिश्चितता की स्थिति में आशंकित से हम सभी जिए तो जा रहे हैं पर ना खुद की सांसों पे भरोसा है ना औरों की सांसों पे.कल्पना से परे की किसी दुनिया को यथार्थ में  महसूस कर रहें हैं और खुद को इसमे अकेला,असहाय और भटका हुआ सा पा रहें हैं.तमाम समझाने की कोशिश करते हैं मन को, मगर वास्त्विकता ठुकरा देती है हर मानसिक तैयारी को .मन परेशान हो उठता है,मनोबल हार मानने लगता हैँ .तब वही(ईश्वर )संभालता  है,उसका ध्यान ही  भर देता है मन को एक सकारात्मकता से, जिसका अस्तित्व उतना ही वासत्विक और दृढ़  हो  सकता  है जितना की ईश्वर में हमारी आस्था  और उसके चमत्कारों में विश्वास.सच्चाई तो ये है कि ईश्वर में आस्था के बिना मेरे लिए तो जीवन की कल्पना ही असंभव है.कभी-कभी सोचती हूँ  कि नास्तिकता के साथ जीना भी कितना दूभर होता होगा .मुसीबत की स्थिति में...

'खलिश'

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 साँसें लूँ तो धुँआं सा उठता है दिल जाने क्यों सुलगा सा अंगार रहता है   बेखयाली सी रहती है निगाहों में अक्सर  नींद ना आए तो आँखों को मलाल रहता है   . हर प्रहर में ज़िक्र उठा लेती हूँ तेरा   भूल जाऊँ तो दिल को आराम रहता है  खाली है वो शहर भी तेरे अहसासों से अब  मेरी यादों में ही बस वो आबाद रहता है इस दर्द की दवा भी बना ना सका कोई  इश्क का मारा  ताउम्र बीमार रहता है . -अंशु चौहान     

'समस्या क्या है '?

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  समस्या क्या है ? समस्या एक  मानसिक  स्थिति ,मन का एक भाव है .वास्तव में किसी भी परस्थिति की गंभीरता,उसकी सहजता ,उसका प्रतिकूल और अनूकूल होने  का निर्धारण हमारा मन,हमारा मस्तिष्क ही तो करता है तभी तो आपने देखा होगा कि एक सी ही प्रस्थिति में दो अलग-अलग व्यक्ति, अलग- अलग व्यवहार करते हैं. उदाहरण के लिए किसी एक परीक्षा में असफल होने वाले दो व्यक्तियों का नज़रिया एकदम विपरीत हो  सकता है.एक के लिए ये बड़ी ही सामान्य घटना हो सकती है जबकि अन्य के लिए असहनीय वेदना देने वाली  हो  सकती  है,ज़िन्दगी  की सभी उम्मीद मिटा  देने वाली  हो  सकती  है. एक और उदाहरण के अनुसार किसी का अपने अजीज़ को खो देना स्वं की भी   ज़िन्दगी का अंत करने को प्रेरित करने वाला हो सकता है  जबकि अन्य के लिए ये जीवन के अंतिम सत्य को क्षणिक दुख व्यक्त कर, संभल जाने जैसा होगा . किसी भी चीज़ को हम जितनी गहराई से महसूस करते हैं उतनी ही वह हमें महसूस होती है. अतः परस्थिति से विचलित  न  होना ,उसमे स्थिर बने रहना हमारे मन,हमारे मानसिक बल पर निर्भर करता...

'कुछ इस तरह'

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वैसेै से तो ग़म और ख़ुशी की हर वक्त कोई वजह ज़रूर होती है लेकिन ख़ुशी बेवजहा भी हो तो उसे संभाल कर रखना चाहिए.सच्चाई तो ये है कि स्वस्थ,सुखी और सफल जीवन के लिए मन से खुश रहना बहुत ज़रूरी है इसलिए जो चीज़  दुखी करें उनसे दूरी और जो ख़ुशी दे उसको अर्ज़ित करने का  प्रयास चाहिए ,वशर्ते वह नैतिक और ज़ायज हो .कुछ ऐसे सोच और फिर  देख-  "कुछ इस तरहा से जी ज़िन्दगी को, कि  हर वक्त जीने की वजहा नई मिले " "कभी  खाली -खाली सा हो दिल तो यूँ नजरिया रहे ,भरने के बाद ही होता है बिखरना भी अक्सर."  "खुद से भी पूछा कर कुछ सवाल कभी -कभी  ज़माने की तोहमतों से ,सिहरता क्यों  है " -अंशु  चौहान